साहित्य में व्यंग्य की शुरुआत प्राचीन यूनानी और संस्कृत साहित्य से मानी जाती है। भारत में मध्यकाल में कबीर ने व्यंग्य के जरिए सामाजिक बुराइयों, जातिगत भेदभाव और धार्मिक पाखंडों पर खूब चोट की है और समाज सुधार के गहन प्रयास किए हैं। आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों और निबंधों में व्यंग्य विधा का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। हिंदी में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, मुद्राराक्षस, विष्णु नागर, केपी सक्सेना ने व्यंग्य को खूब स्थापित किया है। यहां प्रस्तुत वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी ‘छोटे बाबू’ पाठकों को कुछ देर के लिए व्यंग्य की दुनिया की सैर कराती है : संपादक।
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कहानी
छोटे बाबू
ओमसिंह अशफ़ाक
रेलवे के बड़े दफ्तर (हेड ऑफिस) के छोटे बाबू धनीराम तेजी से सीढ़ियां उतरे और झट से बनारसी पनवाड़ी की दुकान पर जाकर बोले- मुबारक सेठ बनारसी ! जल्दी से स्पेशल पान लगा और एक ‘फोर स्क्वेयर’ पिला। पान मेरी तरफ से और सिगरेट तेरी तरफ से। धनीराम ने जान-बूझकर बनारसी को ‘सेठ’ कहा था। हालांकि दोनों को ही यह सच्चाई अच्छी तरह से मालूम है कि बनारसी भी छोटे बाबू की तरह ही छोटा-सा टटपूंजिया खोखे-वाला पनवाड़ी ही है।
लेकिन इस तरह की चुहलबाजी से गरीबी की गिरफ्त़ में फंसे निम्न मध्यम वर्ग के प्राणी भी कभी-कभी अपने सोए हुए या कहिए कि खोए हुए सपनों को जगा लिया करते हैं और क्षणभर के लिए ही सही शेखचिल्ली की तरह ख्वाबों की दुनिया में पहुंच जाया करते हैं। खैर..।
बनारसी पनवाड़ी हैरान। आज अपने धनीराम बाबू को हो क्या गया है? बड़ी मसखरी सूझ रही है। ज़रूर कोई खास बात है।… किस बात की मुबारकबाद दे रहे हो बाबूजी, मैं तो कुछ समझा नहीं।
अरे, तेरा ‘डी.ए.’ जो बढ़ गया है बनारसी ! वही, जिसे लोग महंगाई भत्ता कहते हैं। अब तो समझ गया न ! है न मुबारकबाद की बात! अब तो सिगरेट तेरी तरफ़ से ही चलेगी न !
अरे, सिगरेट तो पीलो बाबजूी, पर सच पूछो तो हमारे पल्ले तो आपकी बात पड़ी नहीं है। हम पनवाड़ियों का भत्ता-वत्ता तो सरकार ने आज तक कभी बांधा नहीं है। आप पता नहीं क्या-क्या कहे जा रहे हैं।
अरे, क्यूं भोला बनता है सेठ ! क्या तुम नहीं जानते कि हम तो सरकार और दुकानदार के बीच की पाईप लाइन हैं। या कहो कि बस एक पुल हैं।
जिस पर चढ़कर सरकार तुम्हारे द्वारे पहुंचती है। और तुम सरकार की अगवानी करने इसी पुल पर चढ़कर जाते हो। अब देख न उधर सरकार ने डी.ए. बढ़ाया और इधर हम तेरी दुकान पर हाज़िर हुए। महीना भर इसी तरह राशन वाले, सब्जी वाले, गैस वाले, किताब- कापियों वाले और कभी-कभी कपड़े वाले और जूते वाले की दुकान पर हाज़िरी लगानी होती है। उधर दफ़्तर से लेना और इधर दुकान पर देना ! अपने तो साले यही एड़ी-घिसे सैंडल और कालर-उधड़ी बुशर्ट। साला दो फर्लांग से बिना शक्ल दिखे ही पता चल जाता है कि वो आ रहा है रेलवे का “फटीचर बाबू।” और सर्दियों में यह नीला कोट दूर से ही मुनादी कर देता है कि वो आया धनीराम। अब तू ही बता-सरकार अब तक तिरतालीस परसेंट डी.ए. बढ़ा चुकी है। पर क्या अपनी बुशर्ट, सैंडल या कोट बदला गया है? नहीं न ? इसीलिए कहता हूं सेठ कि खुशी मनाओ-पीओ नाचो गाओ-पांच परसेंट और बढ़ गया है..।
क्या कहा, दफ्तर में बड़ी ऐश हैं? अरे, भईया बनारसी वहां की कुछ न पूछ। न हम कारकून रहे न अफ़सर बन सके! हमसे तो चपरासी भी अच्छा है। बकौल चौधरी देवीलाल चपरासी तो उप-प्रधानमंत्री से भी अच्छा है। अपने जगमाल चपरासी के ठाठ देखे हैं? सबसे बाद में दफ़्तर आयेगा और सबसे पहले फूट लेगा। मजाल है नया साहब भी उसे कुछ कह दे। पांच मिनट में अफ़सरी जमीन पर झाड़ देने की धमकी दे डाली थी। लेकिन नये साहब समझदार आदमी हैं। पंगा ही नहीं लिया। हमने सोचा काफ़ी ‘एडजस्टेबल’ व्यक्ति है। एक ही धमकी में इशारा समझ गया है। जगमाल एक दफे पानी का जग और गिलास केबिन में रख देता था फिर छुट्टी-अरे खुद उठाकर पीने से कोई साहब के हाथ थोड़े ही घिस जायेंगे? अपने घर में ये अफ़सर लोग भीगी बिल्ली बनकर रहते हैं। और यहां शेर बनते हैं।…
हमने देखा कि जगमाल के पहले दिन के भाषण का ही पूरा असर हुआ था। बाबू लोग तो साहब से भी पहले जगमाल का इशारा समझ गये थे। अब जगमाल ग्यारह बजे हाल के बीच में खड़ा होकर ऐलान कर देता था-सब बाबू लोग एक बार ध्यान से सुन लें। हम पानी लेने जा रहे हैं। किसी को प्यास हो तो अभी बोल दे…फिर तीन बजे लायेंगे। बीच में हमकू कोई परेशान न करें, अभी बता देत हैं…।
और हम बाबुओं में भी कितना महान अनुशासन है। कितनी कर्मठता और सहनशीलता है। जगमाल के आदेश का सभी निर्विघ्न पालन करते हैं। मजाल है किसी को ग्यारह और तीन बजे के दरम्यान प्यास लग जाये। यदि गलती से कोई अपने घर से नाश्ते में आलू का परांठा खा आया तो समझिए कि उस दिन बाबू के घुटनों की शामत आ गई है। खुद ही दूसरी मंजिल के कूलर का पानी पीकर आयेगा और तीसरी व दूसरी मंजिल के बीच की सीढ़ियों पर शाम तक कदमताल करता फिरेगा।
अरे, तुम्हें किस्सा क्या सुनाऊं बनारसी कि एक दिन हम घर से लंचबाक्स में सब्जी नहीं ला सके। लाते भी कैसे, सब्जी घर में थी ही नहीं। चार सूखी रोटियों की ‘फाइल-सी मोड़ी’ और डब्बा काँख में दबाकर हम किसी तरह दफ़्तर पहुंचे। आखिर लंचटाइम हुआ तो हमने जगमाल को पुकारा और रेहड़ी वाले से एक रुपये के छोले लाने की रिक्वैस्ट की।
पहले तो जगमाल ने हमें सिर से पांव तक ऐसे देखा जैसे कोई कसाई जिबह करने से पहले बकरे का गोश्त आंकता है। खैर, स्थिति की गम्भीरता भांपकर हमने खुद ही अपनी गाड़ी की लाइन का “कांटा” बदल लिया और चमचागिरी के अचूक अस्त्र से अपना बचाव किया- भईया जगमाल, सुना है अपनी जवानी के शुरुआती दिनों में आप नामी-गिरामी पहलवान रहे हैं। अपने से तीन गुना तकड़े पठ्ठे की अखाड़े में चरखी घुमा दिया करते थे। वैसे अच्छे-अच्छे पहलवानों से तो अब भी आप इक्कीस पड़ते हैं।
शुक्र है भगवान का, जगमाल ने हम पर तरस खाया और पैसे के लिए अपना हाथ हमारी तरफ़ बढ़ा दिया। लेकिन जैसे ही हमने एक रुपये का सिक्का उसकी हथेली पर रखा, उसका पारा थर्मामीटर को तोड़कर ऊपर जा पहुंचा? उसने सिक्के को क्रिकेट के टॉस की तरह हवा में उछाल दिया। जो अगले ही क्षण छत से टकराकर ‘स्काइलैब’ की गति से वापिस आया और हमारी नाक से जा टकराया।
… एक रुपल्ली देकर आप हमारी तौहीन करना चाहते हैं? हम कभी भी दो रुपइया से कमती लेकर रेहड़ी पर नहीं गये। छोले मंगाना है तो तीन रुपइये निकालो-एक रुपइया हमारी बीड़ी-माचिस के लिए और दो रुपिइये छोले वास्ते..।
तीन रुपये जगमाल को सौंपते हुए हमें बड़ी कोफ्त हुई। हमें खुद अपने आप पर गुस्सा आया कि कल शाम तीन रुपये की लौकी सब्जी वाले की दुकान से खरीदकर ले जाते तो पूरे परिवार का काम चल गया होता..।
सो भईया, ऐसा माहौल है हमारे दफ़्तर का। दूर के ढोल सभी को सुहावने लगते हैं। लेकिन पिछले हफ़्ते हमारे दफ़्तर के शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के वातावरण में खलल पड़ गयी। ऐसा भूचाल आया कि उसके झटके अभी तक नहीं थमे हैं। हुआ यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुयी और साहब ने जगमाल के खिलाफ़ “मिसबीहेव तथा मिसकन्डक्ट” की रिपोर्ट ऊपर भेज दी थी। नतीजतन ऊपर से जगमाल को “मेजर पनिशमेंट” की चार्जशीट और साथ में “सस्पेंशन आर्डर” थमा दिये गये। जगमाल का सारा नशा हिरण हो गया। हम बाबू लोग तो अभी तक तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस घटना पर रोष प्रकट करें याकि खुशी मनायें?
और अब सुनले बनारसी हमारे एकाउन्टेंट की बात। अब्बल तो बिल पास ही नहीं करेगा। और यदि गलती से महीने के चौथे हफ़्ते में कभी भूला-भटका पचास सौ रुपये का कोई क्लेम ऊपर से आ भी गया तो समझो हमारी खैर नहीं। दफ़्तर में बाबुओं की बिरादरी अपने ख़ुफ़िया सूत्रों के जरिये हमसे भी पहले उस पेमैंट की भनक भगा लेती है। यहां तक कि पेमेंट की पूरी डिटेल्स की मौखिक जानकारी उनके पास होती है… अमा यार, धनीराम की तो आज लाटरी निकली है।… हमने पूछा, कैसे? अबे साले पच्चीस तारीख में सत्तर रुपये का टी.ए.बिल बैठे बिठाए आ गया, यह लाटरी नहीं तो और क्या है? अरे, जोरू के गुलाम इन्हें तो खा-खर्च ले वरना कल तुझे तो दो रुपये ही जेब खर्ची मिलनी है।
अब सत्तर रुपये में से बीस-पच्चीस रुपये जब तक दफ़्तर की कैन्टीन में जाकर न पुजवा लें भाई लोगों को चैन कहां? ऐसे चिपक जाते हैं जैसे बरसाती-गुड़ पर मक्खियाँ। भईया, बकरे की माँ कब तक खैर मनाये, आखिर तो कटना ही पड़ता है।… और अब तुम देख रहे हो सेठ बनारसी। हमारी सैंडल और शर्ट फिर वही-की-वही रह गई है। हां, एक बात जरूर है कि महीने के पहले हफ़्ते में बाबू लोग मिज़ाज तन पूंजीपति होते हैं तो दूसरे हफ़्ते में समाजवादी हो जाते हैं। तीसरे हफ्ते में कम्युनिस्ट और चौथे हफ्ते में नक्सलाईट बन जाते हैं…
तभी पांच बजे वाली शटल ने आउटर सिग्नल पर व्हिसल मारी और धनीराम स्टीम इंजन की तरह सिगरेट का धुंआ उगलता हुआ प्लेटफार्म की तरफ बढ़ रही बाबुओं की भीड़ में गायब हो गया।
(जन संदेश, 9 दिसंबर 1990)
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