फिल्म- मैं वापस आऊंगा
78 साल के प्रेम की दास्ताँ..166 मिनट बंधे रखती है..
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इम्तियाज अली की फ़िल्मों में हमेशा से एक बेचैन आत्मा दिखाई देती है..
अरुण खामख्वाह
ऐसा इंसान जो बाहर की दुनिया से ज़्यादा अपने भीतर की उलझनों से जूझ रहा होता है.
उसे कोई अंतिम उत्तर नहीं मिलता, लेकिन इश्क़ के रास्ते चलते हुए वह अपने होने का कोई अर्थ, कोई सुकून तलाश लेता है.
यही वजह है कि उनकी फ़िल्मों में एक ख़ास तरह का सूफ़ियाना रंग दिखाई देता है। हर फ़िल्म प्रेम की ही बात करती है, लेकिन हर बार उसका स्वर, उसका दर्द और उसकी मंज़िल अलग होती है.
‘मैं वापस आऊँगा’ भी उसी परंपरा की फ़िल्म है. सतह पर यह एक अधूरी प्रेम कहानी है, लेकिन भीतर से यह बिछोह, स्मृति, उम्र, वादे और बंटवारे के घावों की कहानी है.
फ़िल्म कहीं भी ज़ोर देकर कुछ समझाने की कोशिश नहीं करती… शायद इसी कारण इसका असर फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी देर तक बना रहता है.
नसीरुद्दीन शाह का ईशर सिंह केवल एक प्रेमी नहीं, बल्कि वह पूरी पीढ़ी है जिसने बंटवारा देखा, अपने हिस्से के सपने खोए और फिर भी जीवन को किसी तरह आगे बढ़ाया.
फ़िल्म का सबसे मज़बूत पक्ष यही है कि वह बुढ़ापे की स्मृतियों और प्रेम की प्रतीक्षा को बहुत मानवीय ढंग से पकड़ती है
जिसने कभी किसी बुज़ुर्ग को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अतीत में लौटते देखा हो, वह इन दृश्यों से गहरे जुड़ जाता है.
इम्तियाज़ का निर्देशन हमेशा की तरह संवेदनशील है दृश्य सुंदर हैं, संगीत भावनाओं को सहारा देता है और प्रेम की तपिश पूरे कथानक में बनी रहती है
लेकिन इसके बावजूद फ़िल्म एक मुकम्मल अनुभव बनने से कहीं-कहीं चूक जाती है.
समस्या यह नहीं कि कहानी धीमी है या भावुक है. असल समस्या यह है कि फ़िल्म जिस भावनात्मक शिखर की तैयारी करती है, वहाँ पहुँचकर पूरी तरह ठहर नहीं पाती.
दर्शक लगभग पूरी फ़िल्म एक वादे, एक मुलाक़ात, एक भावनात्मक विस्फोट की प्रतीक्षा में रहता है.
अंत उसे चौंकाता तो है, लेकिन भीतर जो रिक्त स्थान भर जाना चाहिए था, वह थोड़ा-सा खाली रह जाता है.
शायद यही “मिसिंग फ़ैक्टर” है—भावनात्मक परितृप्ति
फ़िल्म स्मृतियों और प्रतीकों के सहारे बहुत कुछ कहती है, लेकिन जिन भावनाओं को उसने दो घंटे तक सींचा होता है, उनके साथ दर्शक को कुछ और देर अकेला नहीं छोड़ती.
जैसे कोई ख़ूबसूरत ग़ज़ल आख़िरी शेर से ठीक पहले ख़त्म हो जाए.
बात पूरी हो जाती है, असर भी रहता है, मगर दिल को लगता है कि अभी कुछ और सुनना था.
एक और बात खटकती है….. फ़िल्म प्रेम और बंटवारे के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है, लेकिन कहीं-कहीं बंटवारे का ऐतिहासिक दर्द प्रेम कहानी की निजी मार्मिकता पर भारी पड़ता दिखाई देता है.
कुछ दृश्य कथानक को विस्तार तो देते हैं, पर भावनात्मक एकाग्रता को थोड़ा भंग भी करते हैं…परिणाम यह होता है कि दर्शक प्रेम कहानी के साथ जितनी गहराई से डूबना चाहता है, उतना डूब नहीं पाता.
फिर भी, तमाम कमियों के बावजूद यह एक ज़रूरी फ़िल्म है. ऐसे समय में जब शोर, हिंसा और तमाशा अक्सर सिनेमाघरों पर हावी रहते हैं, प्रेम, स्मृति और इंतज़ार जैसी नाज़ुक भावनाओं पर बनी फ़िल्मों का होना अपने आप में महत्वपूर्ण है.
मौ डरता है कि 70 करोड़ की लागत से बनी फिल्म अब तक अगर 20 करोड़ ही कमा पाई है तो ये इस बात का सबूत है कि हम अब मुहब्बत से दूर होते जा रहे हैं– गदर, धुरंधर, एनिमल जैसी धूम -धड़ाका, नफ़रत , हिंसा वाली फिल्मों के दौर में ये एक बेहद ज़रूरी फ़िल्म है.
अगर आपने जीवन में कभी किसी से सच्ची मुहब्बत की है, किसी का इंतज़ार किया है, या किसी अधूरी बात को बरसों अपने भीतर सँजोकर रखा है, तो यह फ़िल्म आपको छुए बिना नहीं लौटेगी.
नम आँखों से वापस अगर आप आते है,तो समझिये कि आप ने प्रेम किया है.
