अब गांधीजी का रिकॉर्ड तोड़ने की धुन!

राजनैतिक व्यंग्य-समागम- 1

अब गांधीजी का रिकॉर्ड तोड़ने की धुन!

विष्णु नागर

इंदिरा गांधी से भी अधिक समय तक लगातार प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड मोदी जी तोड़ चुके हैं। दावा उनका यह भी है कि उन्होंने इस रेस में जवाहरलाल नेहरू को भी पीछे छोड़ दिया है और 9 जून के बाद से हर दिन उन्हें पीछे छोड़ते जा रहे हैं। वैसे मोदी जी नेहरू जी से आशंकित रहते हैं। पीछे मुड़कर बार-बार देखते हैं कि कहीं चाचा नेहरू उनसे आगे निकलने का षड़यंत्र तो नहीं कर रहे हैं, मगर जब दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता, तो मोदी जी दस कदम आगे बढ़ते हैं। ग्यारहवें कदम पर फिर पीछे मुड़कर देखते हैं, फिर दस कदम आगे बढ़ते हैं। उन्हें यह वाक्य हमेशा याद रहता है कि सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी!

नेहरू को तो इस प्रकार वह संघ प्रदत्त ‘चाल, चेहरे और चरित्र’ के दम पर निबटा चुके हैं। अब उनका नेक्स्ट टारगेट महात्मा गांधी हैं। उन्हें निबटाना उनकी उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उनका रिकॉर्ड मोदी जी को तोड़ना है, क्योंकि उनका रिकार्ड नहीं तोड़ा, तो फिर क्या तोड़ा! हथौड़े से नहीं टूटा, तो योगी जी के बुलडोजर से तोड़ेंगे। उससे भी नहीं टूटा, तो विस्फोटक लगाकर फोड़ देंगे, मगर तोड़ेंगे जरूर और तोड़े बिना मानेंगे नहीं। यह उनका अपने आप से वायदा है, इसलिए महात्मा गांधी भी अब उनसे बच नहीं पाएंगे। गांधी जी जितनी भी कोशिश करना चाहें, कर लें। कोशिश करने पर कोई रोक नहीं है, मगर उनका रिकार्ड तो तोड़ेगा मोदी ही। इसे तोड़ने की ए टू जेड प्लानिंग हो चुकी है। ‘महात्मा गांधी रिकार्ड तोड़ समिति’ का गठन किया जा चुका है। गृहमंत्री इसके अध्यक्ष हैं। सूत्रों की मानें, तो इसकी एक से अधिक बैठकें हो चुकी हैं।

समिति के सामने फिलहाल समस्या यह है कि गांधी जी का रिकॉर्ड मोदी जी तोड़ें, तो तोड़ें कैसे? सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि गांधी जी प्रधानमंत्री नहीं बने। बन गए होते, तो फट से उनका रिकार्ड तोड़-ताड़ कर वह फेंक देते। अमित शाह जी ने ठीक पहचाना कि गांधी जी ‘चतुर बनिया’ थे। ‘चतुर बनिया’ थे, इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बने। यहां तक कि सरदार पटेल को भी नहीं बनने दिया। जवाहरलाल नेहरू को फंसा दिया कि तुम बनो प्रधानमंत्री! कसम से, अगर गांधी जी प्रधानमंत्री बने होते तो मोदी जी वो दांव खेलते कि अब तक गांधी जी का नाम दुनिया से गायब हो चुका होता!

संयोग से दोनों गुजराती हैं। गांधी जी के पिता पोरबंदर के दीवान थे। मोदी जी के सामने जन्म लेने से पहले यह च्वाइस थी कि वे किसी दीवान के घर जन्म लें, मगर उन्हें मुख्यमंत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री भी बनना था। उनकी प्लानिंग अलग थी। उन्हें चुनाव लड़ना और जीतना था। किसी दीवान के घर वे जन्म लेते, तो उन्हें राजनीतिक घाटा हो सकता था। प्रधानमंत्री बनने में यह पृष्ठभूमि बाधक बन सकती थी। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने चायवाले के रूप में भारत-भू पर अवतार लेना उचित समझा!

फिर भी एक ग़लती उनसे हो गई कि उन्होंने किसी तरह एम ए तो ‘एंटायर पोलिटिकल साइंस’ में कर लिया, मगर जल्दबाजी में ‘एंटायर’ वाली एल एल बी करना भूल गए! अगर वह कर लेते, तो गांधी जी से कंपीट करना उनके लिए आसान हो जाता। आजकल कौन ससुरा गांधी जी की तरह वकालत करने के लिए इंग्लैंड जाकर बैरिस्टरी करता है!
संभव है कि तब तक मोदी जी ने सोचा नहीं होगा कि एक दिन उन्हें महात्मा गांधी को भी निबटाना है। तब तक उनकी नज़र नेहरू जी से आगे नहीं बढ़ पाई होगी।

एक ग़लती उनसे और हुई कि एक दिन के लिए भी वे जेल नहीं गये, जबकि गांधी जी लगभग सात बरस तक विभिन्न जेलों में रहे। एक दिन के लिए तो छोड़ो, मोदी जी आठ घंटे के लिए भी जेल नहीं गए।
थाने में चार घंटे बैठकर थानेदार के साथ चाय पीते हुए गपशप तक नहीं की। इतना कर लिया होता, तो मां कसम एंटायर पोलिटिकल साइंस से प्राप्त ज्ञान के आधार पर वह गांधी जी से अधिक समय तक जेल में रहने का रिकॉर्ड तैयार करवा लेते! गांधी जी को मात दे देते!
इमरजेंसी में जेल जाने का सुनहरा मौका उन्हें घर बैठे मिला था, मगर

जेल‌ के नाम से उन्हें आज भी इतना डर लगता है कि उस अवसर का लाभ उन्होंने नहीं उठाया। छुप-छुप कर, बच-बचकर रहे। सत्याग्रह कभी किया नहीं। जब भी किया दुराग्रह ही किया।

सच कभी बोला नहीं। अहिंसा में उनका विश्वास कभी रहा नहीं। सारी दुनिया 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस के रूप में मनाती है, मोदी जी इसे स्वच्छता दिवस के रूप में मनवाते हैं। साफ जगह पर कचरा डलवाकर सफाई का रिकॉर्ड बनाते हैं। गांधी जी की तरह एक सफ़ेद धोती से पूरा शरीर ढंकना उनकी कल्पना की कल्पना से भी परे है।

रेलवे के थर्ड क्लास तो क्या, किसी भी क्लास में सफ़र करने के नाम से उन्हें कंपकंपी छूट जाती है। लाठी कभी छुई नहीं। बकरी का दूध कभी पिया नहीं। दो अक्टूबर को फोटो खिंचवाने के अलावा चरखे को कभी हाथ लगाया नहीं। हिंदू-मुस्लिम एकता से उन्हें इतना परहेज है जितना कि कुछ लोगों को बैंगन या करेले खाने से होता है।

इसके बाद एक ही तरीका बचता है कि महात्मा गांधी से बड़े बनने का कि उनसे ज्यादा दिन जिंदा रहकर बताएं। यह काम वह आसानी से कर सकते हैं। मोदी जी सितंबर में जीवन के 76 वर्ष पूरे कर लेंगे। गांधी जी ने कुल 78 वर्ष का जीवन पाया था। दो वर्ष और कुछ दिन की और बात है बस। गांधी जी कुल 28608 दिन जीवित रहे थे। जिस दिन साहेब इससे एक दिन अधिक जी लेंगे, मतलब जिस दिन वह 28609 वें दिन में प्रवेश कर लेंगे, उसी दिन, उसी क्षण से वह गांधी जी से आटोमेटिकली बड़े हो जाएंगे।

मोदी जी के अनुसार, गांधी जी को तो दुनिया उस दिन से जानने लगी थी ,जब रिचर्ड एटनबरो ने गांधी जी पर 1982 में फिल्म बनाई थी। मोदी जी अपने जीवन काल में इसके केवल बीस साल बाद वर्ल्ड फेमस हो गए, जब उनकी उम्र महज़ 52 साल थी। इतनी कम उम्र में उनके नेतृत्व और निर्देशन में गुजरात में जो 2002 हुआ, उसके कारण उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि अमेरिका तक उनके कारनामों से दंग रह गया।उसने इन्हें किसी भी तरह का वीज़ा देने से मना कर दिया।

इस तरह गांधी जी को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मरने के बाद मिली , जबकि मोदी जी को गुजरात की सत्ता मिलते ही कुख्याति मिल गई। इस तरह मोदी जी लगभग दो साल बाद गांधी जी से न केवल बड़े हो जानेवाले हैं और महान तो वह आज से चौबीस वर्ष पहले 2002 में ही हो चुके थे!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं

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