कैसे टूटेगी जाति?

हम देखेंगे समूह द्वारा ‘रूप बदलती जाति व्यवस्था और जाति उन्मूलन की जरूरत’ विषय पर आयोजित जन संवाद की रिपोर्ट

कैसे टूटेगी जाति?

 

दिल्ली की फुँफकारती हुई गर्मी में पश्चिमी विक्षोभ के नाते थोड़ी राहत थी. सौ से अधिक यार-दोस्त-कार्यकर्ता दिल्ली के कनॉट प्लेस के आंबेडकर सभागार पहुँचे। मौका था उस किताब के सहारे आज के हालात-ए-हाज़िरा पर चर्चा का, जिसने आधुनिक भारत को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई — डॉ. आंबेडकर की किताब ‘जाति का उन्मूलन’!

कार्यक्रम ‘हम देखेंगे’ संगठन-समूह का था। विषय था — ‘रूप बदलती जाति व्यवस्था और जाति उन्मूलन की जरूरत’। वक्ता थे जेएनयू के चर्चित प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह जोधका, जिनका भारत में जाति और कृषि के सवाल पर दशकों से गहरा हस्तक्षेप रहा है।

कार्यक्रम की शुरुआत हालाँकि एक छोटी सी फिल्म ‘दलित किड्स’ दिखाने और फिल्म के निर्देशक अप्पू सोमन की बातचीत से होनी थी, पर तकनीकी मुश्किलों के चलते यह संभव न हो सका। खैर, कार्यक्रम की शुरुआत का एक और हिस्सा बहुत सुंदर साबित हुआ — इप्टा की मालंचा चक्रवर्ती और साथियों का गायन। तीन गीतों के सहारे उन्होंने जातिवर्चस्व के दमन के इतिहास और वर्तमान को उघाड़ कर रख दिया। खासकर बंगाली निर्गुणिया लालन फकीर के गीत ‘जात गेलो , जात गेलो…’ ने वह जमीन मुहैया कराई, जिस पर आगे की बातचीत चली।

जाति बनाम नागरिकता

इस संवाद का संचालन कर रहे रामायन राम ने चर्चा की भूमिका बताते हुए किताब के लिखे जाने की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि आज से नब्बे साल पहले, ब्रिटिश हिंदुस्तान के शहर लाहौर में आर्य समाजियों के जाति-पात तोड़क मंडल ने डॉ. आंबेडकर को भाषण देने के लिए बुलाया था। डॉ. आंबेडकर ने तैयारी के साथ पर्चा लिखा, लेकिन जाति-पात तोड़क मंडल को पर्चे का तीखापन सहन नहीं हुआ। उन्होंने डॉ. आंबेडकर से कहा कि कम से कम वेदों की आलोचना करने से परहेज करना चाहिए। आंबेडकर ने पर्चा बदलना स्वीकार नहीं किया और अंततः आर्य समाजियों ने कार्यक्रम ही रद्द कर दिया। फिर वही भाषण डॉ. आंबेडकर ने अलग से छपवाया, जिसका प्रथम प्रकाशन 15 मई 1936 को हुआ।

मुख्य वक्ता सुरेंद्र सिंह जोधका जी ने बात यहीं से उठाई। उन्होंने ‘जाति का उन्मूलन’ किताब के इतिहास पर बात करते हुए इसे भारत की सामाजिक कल्पना से जोड़ा। 1930 के दशक के पंजाब में जाति के सवाल पर उठ रही बेचैनियों का जिक्र करते हुए उन्होंने उस दौर के भारत में आर्य समाज, मुस्लिम सुधार और आदिधर्म जैसी परिघटनाओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आंबेडकर ने उसे समय तक उपलब्ध शोध को आगे बढ़ाते हुए जाति और इसके उन्मूलन की वैज्ञानिक सैद्धांतिकी विकसित की। वे पहले ऐसे महत्वपूर्ण चिंतक थे जिन्होंने जाति के समग्र उन्मूलन को राष्ट्रीय एजेंडे पर स्थापित किया। उन्होंने जातियों से बंधी हुई भारतीय मनुष्य की पहचान को मिटाकर उसे एक ऐसे आधुनिक नागरिक की पहचान देने का उद्यम किया, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों में यकीन रखता हो।

इस तरह उन्होंने घृणा पर आधारित जाति व्यवस्था को बंधुत्व यानी मानव प्रेम पर आधारित नागरिकता से विस्थापित करने की कोशिश की।

प्रोफेसर जोधका ने डॉ. आंबेडकर को श्रमण परंपराओं, निर्गुणियों और सूफियों की परंपरा के विकास के रूप में देखने का प्रस्ताव रखा । इन परंपराओं में इश्क़ को राजनैतिक-सामाजिक विचार की तरह देखा गया, न कि रूमानी तत्व की तरह। जोधका जी का मानना था कि इस विशाल विविध परंपरा में ही डॉ. आंबेडकर को रखा जाना चाहिए। उनका ‘बंधुत्व’ आधुनिक राष्ट्रराज्य के उभार के दौर में उसी सामाजिक भौतिकता को हासिल करने की राह है, जिसे रैदास ‘बेगमपुरा’ के रास्ते हासिल करना चाहते थे। यही रास्ता है, जिस पर चलकर सिर्फ राजनैतिक जीवन में नहीं, बल्कि सामाजिक से लेकर पारिवारिक जीवन तक लोकतंत्र कायम किया जा सकता है।

लेकिन यह केवल आदर्शवादी बातों और भावनात्मक अपील से नहीं हो सकता। जाति के उन्मूलन के लिए उसके आधारों को ध्वस्त करना जरूरी है। ये आधार दो तरह के हैं – धार्मिक और भौतिक। हिंदुओं के अधिकतर धर्मग्रंथ जाति की रक्षा के सिद्धांत पर टिके हुए हैं। एक तरफ इन ग्रंथों की वैधता को चुनौती देने की जरूरत है तो दूसरी तरफ जाति के आर्थिक और राजनीतिक आधारों को भी बदलने की आवश्यकता है।

जोधका जी का मानना था कि जाति, वर्ण और ब्राह्मणवाद को आज हम जिस रूप में देखते हैं, वह सनातन बिल्कुल नहीं है। ब्राह्मणवादी हिंदू भारत और ब्राह्मणवाद का वर्तमान स्वरूप 18वीं सदी के प्राच्यवादियों और ब्राह्मण धर्माचार्यों के सहयोग से बना है। भारत में जाति व्यवस्था को चुनौती देने वाली परंपराएं लगातार उभरती रही हैं। खुद जाति व्यवस्था का स्वरूप बहुत अधिक जटिल, परिवर्तनशील और स्थानबद्ध रहा है।

जाति को एक जड़ीभूत, सर्वव्यापी और सनातन व्यवस्था के रूप में स्थापित करना एक ब्राह्मणवादी परियोजना रही है। मनुस्मृति इसी परियोजना के तहत लिखी गई थी। वह अपने समय के सामाजिक यथार्थ को नहीं, उसकी ब्राह्मण परिकल्पना को प्रस्तुत करती है। आधुनिक काल में मनुस्मृति को हिंदुओं के शीर्ष आचार ग्रंथ के रूप में स्थापित करना इसी परियोजना की अगली कड़ी था।

जाति व्यवस्था बनाम जाति की विचारधारा

आंबेडकर की क्रांति को इस दौर के लिए खोलते हुए जोधका जी ने जाति व्यवस्था और जाति की विचारधारा के बीच अंतर को समझने पर जोर दिया। जाति का व्यवस्थागत स्वरूप बदलता रहा है और आज भी बदल रहा है। व्यवस्था पहले से कमजोर हो रही है लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में जाति की ऊंच नीच आधारित विचारधारा अपने को और अधिक ताकत से स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

आँकड़ों के आधार पर उन्होंने साबित किया कि नवउदारवाद के बाद जाति व्यवस्था की संरचनाएँ पूरी तरह ध्वस्त भले न हुई हों, पहले से कमजोर हुई हैं और बदली हैं। गांवों में भारी बदलाव हुआ है। पुराने संबंध बदल गए हैं। दलित समाज अपने नागरिक अधिकारों को लेकर सचेत हुआ है।

90 के दशक के बाद कांशीराम की अगुवाई में उभरा सत्ता में हिस्सेदारी का आंदोलन जाति आधारित विषमता को खत्म करने के अंबेडकर के सपने को जमीन पर उतारने का एक नया प्रयोग था।

कांशीराम ने जातिवादी विचारधारा को चुनौती देने के लिए एक नई भाषा ईजाद की। उन्होंने ‘दलित’ को ‘बहुजन ‘से बदलकर सवर्ण सत्ता के विरुद्ध एक व्यापक सामाजिक मोर्चाबंदी बनाने की कोशिश की।

इस प्रयोग की सीमित राजनीतिक सफलता के बावजूद इससे दलितों का आत्मविश्वास मजबूत हुआ। लेकिन सत्ता बनाए रखने के लिए प्रभु वर्गों का समर्थन हासिल करने की मजबूरी जाति की आधारभूत भौतिक संरचनाएं नहीं बदली जा सकीं।

चुनावों के कारण अलग-अलग जातीय समूहों के बीच बातचीत लगातार बढ़ी है। इसी के साथ तनाव भी बढ़े हैं और प्रतिक्रियात्मक हिंसा भी।

आगे जाति-विरोधी आंदोलन अस्मिता के गोल चक्कर में फँस गया। दलित और पिछड़ी जातियों के विभिन्न समूहों के बीच के अन्तर्विरोध तीखे हो चले।

इससे जाहिर हुआ कि उन्मूलन का लक्ष्य सिर्फ पहचान की गोलबंदी और सत्ता में हिस्सेदारी के रास्ते हासिल नहीं किया जा सकता।

प्रोफेसर जोधका ने कहा कि इतिहास में जब जब किसानों और कामगारों ने जाति व्यवस्था को चुनौती दी, तब तक इसके खिलाफ एक प्रतिक्रान्ति भी उठ खड़ी हुई। ऐसा बुद्ध के समय हुआ, भक्ति काल में हुआ और हमारे अपने समय में भी हो रहा है। जाति में आ रहे बदलावों को समझने के लिए हमेशा हमें इस द्वंद्वात्मक गति को ध्यान में रखना चाहिए।

सवाल-जवाब और समापन

यह विचारोत्तेजक चर्चा बाद में सवाल-जवाब के रूप में फूट पड़ी। उपस्थित नौजवान कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों, कवियों, पत्रकारों और लेखकों ने चर्चा को वर्ग-जाति की आपसदारी, आधुनिकता-दमन के संबंध, राष्ट्र-अस्मिता के रिश्ते, हिस्सेदारी की परिणति, सौंदर्यशास्त्र और अनुभव जैसे विषयों की ओर मोड़ दिया।

‘समय संज्ञान’ पत्रिका के संपादक वेद प्रकाश ने जाति उन्मूलन के आर्थिक पहलू पर सवाल उठाया। वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण, सरिता संधू, कवि पूनम तुषामड़, देवी प्रसाद मिश्र, पत्रकार शालिनी बाजपेई और अन्य विद्यार्थियों ने भी तीखे सवाल पूछे।

जोधका जी ने इन सवालों के स्पष्ट और सुचिंतित उत्तर दिए। उन्होंने कहा कि यह सवाल खुला हुआ सवाल है। किसी अकेले के पास कोई हल नहीं है। नए दौर में, जब अस्मिता की राजनीति का एक चरण पूरा हो चुका है, जाति उन्मूलन का सवाल नए सिरे से हमारे सामने है। यह एक बेहद जरूरी मिशन है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि और शिल्पकार, दलित लेखक संघ के अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘Annihilation of Caste’ के हवाले से हिंदू धर्म ग्रंथों को डाइनामाइट से नष्ट करने बात को स्वीकार किया और कहा कि ये समाज में मानसिक ग़ुलामी को स्थापित करने का काम करते हैं और समाज में बराबरी के बदलाव को रोकते हैं। उन्होंने जातियों को मजबूत बनाने की जगह जाति के खात्मे हेतु राजनीति से पहले सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श निर्मित करने का आह्वान किया।

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आलोचना पत्रिका के संपादक आशुतोष कुमार ने कहा कि जाति उन्मूलन के लिए सांस्कृतिक क्रांति के साथ-साथ आर्थिक राजनीतिक क्रांति की भी उतनी ही जरूरत है। इस समझदारी ने समय बीतने के साथ अंबेडकरवादी और मार्क्सवादी धाराओं के बीच की दूरियों को कम किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह समझना ठीक नहीं है कि वर्तमान समय में दक्षिणपंथी ब्राह्मणवादी विचारधारा का वर्चस्व दलित और वाम आंदोलन की कमजोरी के कारण कायम हुआ। इसके उलट यह उनकी बढ़ती ताकत के खिलाफ प्रभु वर्गों की नियोजित और संगठित प्रतिक्रिया का परिणाम है। रेडिकल अंबेडकरवादी धाराएं और वाम ही उसके निशाने पर हैं और इन दोनों की एकता ही उसका मुकाबला कर सकती है।

इस कार्यक्रम में वरिष्ठ नाटककार राजेश कुमार, संजय जोशी, पद्म प्रतीक, प्रेम तिवारी, अभय शुक्ल, भीम भारत भूषण, मनीष श्रीवास्तव, हरमीत सिंह, आशीष मिश्र, अनुपम, माया हंसराज, मृत्युंजय, तूलिका अस्थाना, प्रो. सूर्यनारायण, पंकज श्रीवास्तव, मनीषा श्रीवास्तव, वंदना सिंह, अंशु चौधरी, अभिनंदन, प्रसेनजीत और अजीत यादव समेत अनेक लेखक, साहित्यकार और बुद्धिजीवी मौजूद रहे।

डॉ. आंबेडकर की कालजयी कृति Annihilation of Caste पर केंद्रित यह कार्यक्रम अब एक सालाना आयोजन की तरह आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगा, इस संकल्प के साथ यह आयोजन संपन्न हुआ।

प्रस्तुति – मृत्युंजय, रामायन राम

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