दीपक वोहरा की कविता- तेजतर्रार महबूबा  

 कविता

तेजतर्रार महबूबा

दीपक वोहरा

 

दुर्दिन आते नहीं अकेले

जैसे गरीबी में आटा गीला

गरीबों का दुःख

एक खूबसूरत बला है

 

चालाक महबूबा है

दरवाज़े पर दस्तक भी नहीं देती

चोर दरवाज़े से

चोरों की तरह

घुस जाती है

गरीबों के घरों में

डाल देती है डेरा

 

पीछा नहीं छोड़ती

पीढ़ी दर पीढ़ी

और जवान होती रहती है

 

डेरा डाल लेती है

उन घरों में

जहाँ रोटियों के भी लाले हों

और सीलन की तरह

दरो-दीवार पर फैलती जाती है

गरीबी की शानो शौकत बढ़ाती है

अमरबेल की तरह

कर्ज़ बढ़ता जाता है

 

ग़रीब हँसते हँसते

इससे लड़ता है

जैसे वर्षों पुराना

इससे कोई नाता है।

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