दिनेश बंसल की एक ग़ज़ल
बस उन्हें हम-सफ़र बनाने की
मुझ को हसरत थी घर बसाने की
एक पल में ही मान जाऊँगा
कर तो कोशिश मुझे मनाने की
मुझ को दाता पे है यक़ीन हुज़ूर
फ़िक्र कैसी फिर आब-ओ-दाने की
पीने वाले नरक में जाएंगे
कोई हद भी तो हो फ़साने की
क्यों गिला मैं करूं पिछड़ने का
तेज़ रफ़्तार है ज़माने की
शायरी वायरी कहाँ साहिब
एक बस ज़िद है तुक मिलाने की
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आब-ओ-दाना = रोज़गार ; गिला = शिकायत
