ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी- पेंडुलम

एक वर्ग विभाजित समाज में शोषण सभी वर्गों का होता है और शोषणा करने वाला होता है-शासक वर्ग। अर्थव्यवस्था, रोज़गार, व्यापार, राजनीति, धर्मनीति, आचार-संहिता सब कुछ शासक वर्ग के नियंत्रण में होता है और वही तय भी करता है! दुखदाई बात यह होती है कि शासित-शोषित वर्ग अपनी पिछड़ी-चेतना के कारण इस तथ्य की पहचान नहीं कर पाते हैं इसलिए आपस में संगठित नहीं हो पाते हैं। नतीजतन संयुक्त-संघर्ष नहीं कर पाते हैं? इसलिए उनके शोषण, दमन और उत्पीड़न का सिलसिला लगातार चलता रहता है। वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की यहां प्रस्तुत कहानी ‘पेंडुलम’ हमारे सामने कुछ ऐसी ही यथार्थ तस्वीर पेश करती है : संपादक।

कहानी

पेंडुलम

ओमसिंह अशफ़ाक

पैंतालीस डिग्री के कोण पर सधा बारह फुट लम्बा लकड़ी का फट्टा ‘लछमन झूला’ सा लरज रहा था। फिर भी क्विंटल-भर की बोरी पीठ पर लेकर पल्लेदार धम्म्-धम्म् फट्टे पर चढ़ रहे थे-अवाध और अविरल गति से। ज्यों-ज्यों उनके पैर ऊँचाई की तरफ़ बढ़ते जाते, त्यों-त्यों उनकी पिण्डलियों की माँसपेशियाँ तनती- उभरती-सिकुड़ती सारा वजन अपने ऊपर सह लेने की होड़-सी करने लगतीं। कभी-कभी वे ऐसी लगती मानों बाढ़ आयी नदी में गट्टे-भर मोटी मछलियाँ आपस में उलझ पुलझ कर लड़ रही हों।

पल्लेदार पसीने से सराबोर थे। बनियान और कच्छा तो घण्टा-भर पहले ही तर हो चुके थे- अब तो लूंगी और कमर पर लगा पीठिया भी भीग रहा था। पसीने की नमकीन धारा जब माथे के ऊपर से बहकर आँखों में घुसने लगती तो सिर पर बँधी साफी या गमछे के छोर से, फट्टे पर चढ़ते-उतरते हुए ही वे उसे पोंछ डालते। कभी-कभी यह धारा इतनी तेजी से निकल बहती कि गमछे-साफी तक हाथ ले जाने का मौका न होता। तब दायें हाथ की चारों उँगलियाँ कतार-बद्ध होकर बायीं कनपटी को छूतीं और सपाक-से पसीना पोंछती हुई दायीं तरफ बढ़ जातीं। अब दायें हाथ को बेतरह झटक दिया जाता और असंख्य बूंदों का गुच्छा टप-टप-टप फट्टे के बाजू में फर्श पर फैल जाता। फट्टे के दोनों तरफ-निचले छोर से चठ्ठे तक-समानान्तर, दो गीले कंगूरेदार फट्टों के अक्स उभर आये थे। बनवारिया ने सुरीली तान में राजस्थानी गीत छेड़ रक्ख़ा थाः

काक्का पा‌ट्टी बस्तो ल्यादे रै- ल्यादे रै,

मैं पढ़वा जासूं रै ।

बेट्टा पढ़वा में के काढ़ै रै-काढै़ रै ।

दो बैल्लां की जोड़ी पिच्छै चोक्खो लागै रै ।

बाकी पल्लेदार भी गाने में बनवारिया का साथ दे रहे थे लेकिन जब पीठ पर लदी बोरी इधर-उधर पटकनी होती तो बोलचाल के व्यवधान से गीत की लय भी थम जाती और खण्ड-काव्य के रूप में कुछ क्षणों बाद गीत पुनः वहीं से शुरू हो जाता, जहाँ छोड़ा गया था। अब तक एक सौ बीस-बीस बोरियों से लदे आठ ट्रक उतर चुके थे। 11+7×6×18=1944 बोरियों की स्टैक-प्लान वाला चठ्ठा 960बोरियों को अपने गर्भ में समेटता हुआ, नौ बौरियों की ऊँचाई तक उठ चुका था। अभी भी इसको 18 बोरियों की ऊंचाई तक लेकर जाना था।

मुझे उस दिन की याद आयी जब मेरी नियुक्ति बतौर गोदाम-सहायक इसी सैंटर पर हुई थी। इण्टरव्यू लैटर देखकर ही एक बार तो मैं हतप्रभ रह गया था। उससे पहले तो मैं खाद्य निगम के नाम और काम से भी परिचित नहीं था। मुझे अच्छी तरह याद है, जब ड्यूटी ज्वाइन करने आया तो उस वक्त पाँच हजार मीट्रिक टन की भण्डारण क्षमता का यह शैड तैयार हो चुका था और उसी सीजन में पहले-पहल इसमें गेंहू का भंडारण हुआ था। दूसरे शैड का निर्माण कार्य भी पूरा होने को था; शायद कंकरीट की सतह पर सीमेंट का फर्श और प्लेटफार्म पर ‘ऐंगल-आयरन’ लगाना ही बाकी था। 18 की ऊँचाई तक चठ्ठे में लगी गेहूँ की बोरियों को देखकर में बौरा गया था। आखि़र डिपो इन्चार्ज से पूछ ही लिया, “क्या बोरियां क्रेन से चढ़ाई जाती हैं?” उनके चेहरे पर कटाक्षपूर्ण मुस्कान उभर आयी थी। फिर चश्मे के भीतर से व्यंग्यभरी दृष्टि फेंकते हुए उन्होंने कहा था. “थोड़े दिनों में खुद ही देख लोगे बोरियाँ क्रेन चढ़ाती हैं या पल्लेदार।”

अभी आठ और ट्रकों की बोरियाँ इसी चठ्ठे में समा जानी बाकी थीं। तथी कंधे पर पीपा उठाये माड़िया आ पहुँचा। पीपे में रोटियों की थई लगी थी। माड़िया खुद ही बनाकर लाता है। वह इस पल्लेदार टोली का रसोइया है। वजूद में औरों की अपेक्षा कुछ दुबला है वह। बताते हैं, बचपन से ही ऐसा है। यथा नाम तथा गुण: इसीलिए बापू ने उसका नाम माड़ूराम रख छोड़ा था, जो बाद में बोल-चाल की सुविधा के कारण माड़िया हो गया। माड़िया से टोली सिर्फ़ रसोई बनाने का काम लेती है। उसे पीठ पर बोरियाँ नहीं उठानी पड़तीं। फिर भी, पत्ती सबके बराबर ही दी जाती है, उसे भी। ‘चूल्हे की साह्मी (सामने) बैठकर आग से तपना कौन आसान काम है बाबू ?’ बनवारिया ने एक दिन मुझे बताया था, ‘फिर टोली का यो ही तो सुख छैः के कमजोर-अपाज़ माणस बी निभ जाछै ।’

“ओरै फूलियो ? अणै श्यारा नै बोल ले कलेवो कर लेंगा…बठै चट्ठा पै हड़ुमान अर रूड़ीयो हैं: बो नै बी कहदे कलेवो आर्यो छः… माड़िया ने आवाज दी तो नौवाँ ट्रक भी खाली हो चुका था। हनुमान और रूड़मल चठ्ठे के ऊपर से उतर आये। सभी ने हाथ धोये। पसीने से चिप-चिप थे, एक बाल्टी तो हाथ धोने में ही खाली हो गयी। खाली बाल्टी उठाकर यादराम पास के कुएँ पर दौड़ा और झट से भर लाया। झुण्ड की शक्ल में बैठे पल्लेदार मोटी-मोटी दो-दो रोटियाँ हाथ पर रखकर लाल मिर्च की चटनी के साथ खा रहे थे। मैं उन्हें गौर से देखने लगा। रोटी खाकर रामौतार ने बगल में पड़े कुरते की जेब से टेलीफोन छाप बीड़ी का बण्डल निकाल लिया। पहली बीड़ी थोथी निकली तो वापिस बण्डल में ठूंस दी। फिर खुद ही मेरी तरफ़ मुस्करा कर जैसे स्पष्टीकरण देने लगा, “ये बीड़ी तबी पी जांछैः बाबू, जब बण्डल खतम होण लगछः…।”

मैं कहीं गहन विचारों में खो गया: ये रूखी-सूखी रोटियाँ खाकर कहाँ से इतनी ताकत आती है इनमें। सुबह से लेकर रात तक बोरियाँ ढोते रहते हैं। रात में चन्द घण्टों की नींद और अगली सुबह फिर वही सिलसिला। अगर इन्हें पूरी खुराक मिल जाये तो ये अधनंगे दानव पहाड़ को भी उलट सकते हैं ? लेकिन इन्हें पूरी खुराक़ मिलती क्यों नहीं ? बस, मेरा विचारसूत्र इसी सवाल पर आकर उलझ गया। सोचते-सोचते मैं अपनी अल्हड़ आयु की स्मृतियों में पहुँच गया। मेरे स्मृति-पटल पर आज तक भी हू-ब-हू अंकित है; जब घर में कोई मेहमान आया करता, माँ तभी गेहूँ की रोटियाँ पकाया करती थी। सिर्फ मेहमान के लिए ही। कुणबे के साथ-साथ मुझे भी रोज बाजरे की रोटी मिलती, पर मेहमान आने पर जरूर एक शकुन हासिल होता था। मैं हठ कर बैठता। माँ, धमकाती-समझाती पर मैं नहीं मानता। मेहमान के सामने घर की हालत का रहस्य उघड़ने का ख़तरा पैदा हो जाता तो मजबूरन माँ मुझे भी गेहूं की आधी रोटी दे देती। फिर जाड़ भींचकर, थप्पड़ उठाकर, चूल्हे में गर्म हुआ चिमटा दिखाकर दबी-दबी आवाज़ में रसोई के भीतर ही माँ मुझे खूब डाँटती, “मरजाणा… हटील्ला… मेहमान के आगे ही हट करेगा ?… तेरी नाड़ तोड़ दूँगी…?” लेकिन थोड़ी देर बाद माँ का गुस्सा स्वतः ही ठण्डा पड़ जाता और मैं खा-पीकर फुर्र-से गली में भाग जाता। दिन भर बच्चों के साथ धूल-माट्टी में खेलता रहता। घर तभी लौटता, जब भूख पेट को कुरेदने लगती।

आठ साल का होते-होते बापू को मेरा ख्याल आया। पता नहीं खुद इलहाम हुआ अथवा किसी ने सलाह दी या दूसरों की देखमदेख। एक दिन सुबह-सबेरे नींद से जागते-न-जागते मुझे दबोच लिया और पकड़कर स्कूल ले गये। अटकते हुए से बताया था- नाम अणिल, उमर आठ साल। मास्टर साहब चौंक-से गये थे। उस पिछड़े देहाती माहौल में यह चौंकाने वाली बात थी भी।

‘अनिल ?’ मास्टर जी ने शुद्ध उच्चारण दोहराते हुए पूछा था, ‘यह नाम किसने रक्खा इसका ?’ मुझे उस दिन पता चला था कि मेरे नामकरण के पीछे भी एक इतिहास है, जो प्रगति का सूचक है। मुझे यह नाम बुआ जी ने दिया था। बुआ जी का सौभाग्य था कि उनका विवाह एक पढ़े-लिखे व्यक्ति के साथ हुआ था और मेरे पैदा होने से दो साल पहले ही फूफा जी अध्यापक हो गये थे। उन्हीं के सानिध्य में रहकर बुआ जी के पास सुन्दर-सुन्दर आधुनिक नामों की एक लिस्ट बन गयी थी जिसमें दसियों नाम थे। लेकिन बुआ जी भी मुझे सुन्दर नाम के अलावा और कुछ नहीं दे सकी थीं। नाम को छोड़कर मेरे और परिवेश के दूसरे बच्चों में कोई फर्क था भी नहीं। वही मोटे गाढ़े का कुरता- घुटनों तक लटकता हुआ। कच्छी-निक्कर कहाँ मयस्सर थीं? कुरता न सिर्फ़ निक्कर का भी काम सारता बल्कि ओढ़नी और रूमाल का भी। सभी का विकल्प कुरता था। माघ-पूस की ठण्डी हवा बहती तो बच्चों की नाक भी बहने लगती। अब कुरते की दायीं बाजू ही काम आतो थी। लगातार प्रयोग से कुहनी से नीचे वह चमड़े-सी चिक्कट और काली हो जाती। इस कसूर पर कई बार मास्टर जी पिटाई तो करते, पर समस्या का हल उनके पास भी नहीं था। बच्चे, उकड़ू बैठकर मुड़े हुए घुटने जब कुरते में फँसा लेते तो जीती-जागती गठरी-सी बन जाते थे। छाती से सटे घुटने थोड़ो देर बाद ही गरमाई का आभास करा देते थे। कितनी ठण्ड पड़ती थी उन दिनों ?- सोचकर आज भी कंपकपी छूटने को हो जाती है। मुझे याद है, कालिज में दाखिल हो जाने के बाद ही पहली बार मुझे जूते पहनाये गये थे। कपड़े के पी० टी० शू। हालाँकि उस समय तक मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं रह गयी थी क्योंकि मेरे तलवों की खाल जूतों के सोल से भी अधिक सख्त हो चुकी थी।

ज्योंही मैंने बी०ए० पास किया, बापू ने खटिया पकड़ ली थी। गठिया ने जकड़ लिया था उन्हें। बूढ़े माँ-बाप और छोटे बहन-भाइयों का पेट पालने के लिए अब मुझे नौकरी चाहिए थी। नौकरी मेरा शौक नहीं, जरूरत थी। जरूरत भी ऐसी जिसे टाला न जा सके; यानी भूख यानी रोटी, मतलब ज़िन्दगी। एम०ए० पास करके हिन्दी साहित्य में अनुसन्धान करने का सपना धरा रह गया था और मैं गोदाम की नौकरी में जुट गया था।

“ट्रक सम्भालो !… धांग गिन लो बाबू…!!” बनवारी ने आवाज दी तो मेरे अचेतन मन में सिहरन-सी दौड़ गयी थी। मैं हड़बड़ाकर उठा, अँगड़ाई लेकर बनवारी की तरफ देखा तो उसके चेहरे पर अभूतपूर्व खुशी की मुस्कान बिखर गयी थी। तभी बनवारी ने ठट्ठा कर लिया, ‘ब्याह-शादी का सपना तो नहीं देख रहे थे बाबू ?…शरमावण की कोई बात नहीं, ये उमर ऐसी ही हौवे छैः।’

मुझे अपने तथा बनवारी, माड़िया, फूलियो, हनुमान और यादराम आदि नाम के पल्लेदारों के बीच एक अदृश्य रिश्ता महसूस हुआ। मुझे लगा कि ये सभी लोग मेरे बचपन के सहपाठी हैं जो पढ़ने की आकांक्षा आज तक भी अपने दिलों में संजोये हुए हैं। अनायास ही मेरे होंठ उनके गीत की पंक्तियाँ बुदबुदाने लगे :

काक्का पाट्टी-बस्तो ल्यादै रै- ल्यादै रै।

मैं पढ़वा जासूं रै…।

मैंने एहसास किया कि उनमें तथा मुझमें केवल नाम की ही भिन्नता है। उसी नाम की जो बुआ जी ने मुझे दिया था।

उस दिन के बाद मैं आत्मीय स्तर पर पल्लेदारों के साथ घुल-मिल गया था। कभी-कभार मैं उनकी रोटी से टुकड़ा तोड़कर खा लेता तो पल्लेदारों के हृदय में खुशियों के तार झनझना उठते। कितना चाहने लगे थे वे मुझे ? कोई सम्भावित खतरा न होते हुए भी, वे मुझे आँख की पुतली की तरह सुरक्षित रखना चाहते थे।

तभी एक दिन एक अजीब घटना घट गयी थी। डिपो इन्चार्ज बंसल साहब ने माड़िया को गेहूँ से भरा पीपा चुराते पकड़ लिया था। इन्चार्ज साहब अपने थुलथुल शरीर को ठीक से सम्भाल भी नहीं पा रहे थे, फिर भी माड़िया के मुँह पर तड़ातड़ थप्पड़ जड़ रहे थे, “स्साले चोर…! हरामखोर…! तुम्हारी पीढ़ियाँ ही चोरी करते बीत गयीं। मैंने कहा था न, मीणे और गुज्जर पैदाइशी चोर होते हैं…।”

पल्लेदारों की आँखों में खून छितर आया था। हाथों में कुण्डियाँ- लिये पल्लेदारों ने उनका घेरा डाल लिया था। एक गोलाकार अभेद्य दीवार के बीच वह बुत बना खड़ा था। उसकी टाँगें थर-थर काँप रही थीं। “पुरखों को गाली न दीजिये ! कोई भी जनम त चोर नई होवै हैं… मज़बूरी ई इण्साण न चोर बणा दे हैं… हरामखोर वे हैं: जो मुफ़्त का खावें हैं… थारी ठेकेदार तै मिलीभगत छी तबी वो म्हारी रकम मार कै भाग्या छः…आज डेरे में कील्लो-भर आट्टो बी ना रह्यो तो हम के खावैं ? थम भरा ट्रक डकार गये थे तो कुछ ना होयो, माहनै दस कील्लो दाणे वास्ते पुलिस की धमकी दे छः ?” बनवारिया की इस बात से वे सहम गये थे। मन-ही-मन पश्चाताप करने लगे कि पुलिस का नाम लेकर नाहक अपनी पोल खुलवा ली है। झेंप मिटाने के लिए एक पीपा गेहूँ की चोरी का मामला उन्होंने स्टाफ के सामने रखाः

अचानक मेरा माथा चकरा गया। कनपटी की नसें फड़कने लगीं। सारे शरीर में बिजली-सी काँध गयी ।… यह क्या हो गया है? मैं क्या सुन रहा हूँ? कहीं यह स्वप्न तो नहीं है? यह तो मैक्सिम गोर्की की आवाज़ है-हू-ब-हू वही शब्द। कह रहे हैं, “भूख, कटुता और उदासी के समय मैं अनुभव करता कि ‘निजी सम्पत्ति का पवित्र नियम’ भंग करने का अपराध ही नहीं, कोई भी अपराध कर सकता हूँ।” मैं चाहकर भी गोर्की के शब्दों को वाणी नहीं दे पाता। हालाँकि पल्लेदारों की दरिद्रता और आत्मीयता मुझे कहने को प्रेरित कर रही है। लेकिन मुझे डर है कि इन्चार्ज साहिब नाराज न हो जाए। अभी नयी-नयी नौकरी लगी है। प्रोबेशन भी पूरा नहीं हुआ है। नौकरी के मोह को मैं एक पल के लिए भी झटक नहीं पाता हूँ। नौकरी के रहते मेरी बाबूगिरी कायम है। नौकरी चली गयी तो मेरे और पल्लेदारों के दरम्यान का अवास्तविक फासला मिट जायेगा। मैं वास्तविकता से रू-ब-रू नहीं होना चाहता। नहीं, मैं यह रिस्क नहीं ले सकता! नौकरी की कीमत पर मैं हर स्थिति से समझौता कर सकता हूँ, ऐडजस्टमेंट का तरीका ढूँढ़ सकता हूँ। यह ठीक है कि मैंने जीवन को ध्येय मान कर नौकरी शुरू की थी, लेकिन अब नौकरी मेरा ध्येय बन गयी है- अराध्य हो गयी है! दफ्तर की लंगड़ी मेज पर मैंने टूटे हुए शीशे के नीचे, शिवजी, हनुमान और दुर्गा माँ की तस्वीरें भी लगा ली हैं। शाम को दफ़्तर छोड़ते समय दो मिनट के लिए बिना नागा प्रार्थना करता हूँ कि कल दस बजे जब मैं गोदाम आऊँ तो लंगड़ी मेज़ सुरक्षित मिले- मेरी नौकरी बरकरार रहे ? अब मैं जीने के लिए नौकरी नहीं करता बल्कि नौकरी के लिए जीता हूँ।

मेरे अन्तर्मन में द्वन्द्व मचा है। कभी मैं जुल्म के खिलाफ लड़ने का इरादा करता हूँ; गैर-इन्साफ़ी का विरोध करना चाहता हूँ, स्वाभिमान को जिन्दा रखना चाहता हूँ। लेकिन दूसरे ही क्षण मैं आत्मसमपर्ण कर देता हूँ। नौकरी द्वारा हासिल सुविधाओं के सामने घुटने टिका देता हूँ। मेरे मध्यवर्गीय संस्कार मुझे जकड़ लेते हैं। इन्चार्ज साहब की आर्थिक स्थिति के समकक्ष मैं पहुँच नहीं सकता और पल्लेदारों के साथ खुद को जोड़ नहीं पाता हूँ। मैं इन दो ध्रुवों के बीच असहाय झूल रहा हूँ-घड़ी के पेंडुलम की तरह ।

नयी पहचान’ 1982
(हरियाणा साहित्य अकादमी प्रकाशन)

One thought on “ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी- पेंडुलम

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    लेखक के व्हाट्सएप पर अंग्रेजी के वरिष्ठ आलोचक एवं लेखक डॉ. एन के नागपाल की निम्नलिखित टिप्पणी प्राप्त हुई है:
    “Pendulum’ is a story penned by a senior story writer Ashfak ji.Exploiters and exploited have been in every society since ages.It will remain.Even then our efforts should continue to bridge the gap to the maximum. Many of the Indian people are honest as long as they don’t get a chance to steal.Thiefs are everywhere in society.one is a big thief another is a small thief.Most of us lack morals.We see many go scotfree even after very big thefts while on the other hand small fish get trapped.Emloyees with half – baked morals remain trapped in between.”
    Dr N k Nagpal, formarly principal & professor at IGN college, Ladwa, kurukshetra,(Haryana) India.

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