मंजुल भारद्वाज की कविता- बौद्धिक कौम!

कविता

बौद्धिक कौम!

मंजुल भारद्वाज

 

भारत की बौद्धिक कौम असहाय है

भौंचक यह कौम अधर मैं लटकी है

ये कौम यह समझ नहीं पा रही है

शिक्षा के निजीकरण ने

कब एक विचार शून्य

लेकिन किसी भी कीमत पर

सफ़लता हासिल करने वाली

हुनरमंद पीढ़ी तैयार कर दी

खरीद और बेच को

जीवन की युक्ति समझने वाली

यह पीढ़ी

ना सफ़लता का अर्थ जानती है

ना जीवन का

विचार शून्य पीढ़ी समाज नहीं

भेड़ होती है

जो सवाल नहीं पूछती

जयकारा लगाती है

देश की बौद्धिक कौम

ना विचार प्रकिया को आगे बढ़ा पा रही है

ना जमीन से जुड़ पा रही है

दरअसल यह कौम कायर है

विचार,विश्लेष्ण का आडम्बर करती है

साहस नहीं है भेड़ को भेड़ बोलने का

भेड़ो के जयकारे को वो जनमत

लोकतंत्र में जनता की आवाज़ बता रही है

इनकी बात सुनकर भेड़ें गदगद हैं

बौद्धिक कौम निष्क्रियता की

जुगाली कर रही है

भेड़िये इनकी आड़ में

संविधान को सलीब पर

लटकाने चल पड़े हैं….!