जब एल्गोरिदम ने ईर्ष्या को व्यापार बना दिया

जब एल्गोरिदम ने ईर्ष्या को व्यापार बना दिया

  • ईर्ष्या अब भावना नहीं रही, डिजिटल बाज़ार की सबसे बिकाऊ वस्तु बन गई है

 

आज का समय बड़ा विचित्र है। मनुष्य ने तकनीक से आसमान छू लिया है, लेकिन मन की शांति कहीं पीछे छूटती जा रही है। पहले ईर्ष्या का दायरा छोटा था। पड़ोसी की नई कार, रिश्तेदार का बड़ा घर, सहकर्मी का प्रमोशन या किसी मित्र की सफलता देखकर मन में हल्की-सी कसक उठती थी। वह ईर्ष्या थोड़ी देर रहती थी और फिर जीवन अपनी सामान्य गति से आगे बढ़ जाता था।

लेकिन आज वही ईर्ष्या मोबाइल की स्क्रीन पर बैठकर चौबीसों घंटे हमारे सामने घूम रही है।

अब इंसान केवल अपने आसपास वालों से तुलना नहीं करता। वह किसी अनजान व्यक्ति की विदेश यात्रा, किसी इंफ्लुएंसर की चमकदार जिंदगी, किसी दोस्त की नई कार, किसी सहकर्मी की नई नौकरी और किसी अजनबी की मुस्कुराती तस्वीर देखकर अपने जीवन को अधूरा मानने लगता है। यहीं से शुरू होता है ईर्ष्या का नया बाज़ार।

इस बाज़ार में सबसे बड़ा व्यापारी है – एल्गोरिदम।

एल्गोरिदम कोई इंसान नहीं, फिर भी वह हमें हमसे अधिक जानने लगा है। हम किस तस्वीर पर रुकते हैं, किस वीडियो को बार-बार देखते हैं, किस पोस्ट से हमारे मन में हलचल होती है, किस जीवनशैली को देखकर हमें अपनी कमी महसूस होती है – यह सब वह चुपचाप दर्ज करता रहता है। फिर वही चीज़ें हमारी स्क्रीन पर बार-बार सजाकर रख दी जाती हैं।

एक दिन किसी ने इंस्टाग्राम पर अपने मित्र की तस्वीर देखी। मित्र समुद्र किनारे खड़ा था। पीछे सूर्यास्त था। चेहरे पर मुस्कान थी और कैप्शन लिखा था – “लिविंग माय बेस्ट लाइफ।”

तस्वीर देखकर वह चुप हो गया। उसे लगा, “सब लोग जीवन जी रहे हैं, बस मैं ही पीछे रह गया हूँ।”

पर वह यह नहीं देख पाया कि उस मुस्कान के पीछे कितनी थकान, कितनी चिंता, कितनी ईएमआई, कितने झगड़े या कितनी अधूरी बातें छिपी होंगी। स्क्रीन ने उसे केवल चमक दिखाई, सच्चाई नहीं।

यही डिजिटल दुनिया का खेल है। यहाँ लोग अपनी जिंदगी नहीं दिखाते, अपनी जिंदगी के चुने हुए पल दिखाते हैं। कोई अपनी हार नहीं दिखाता, केवल जीत दिखाता है। कोई अपनी उलझन नहीं दिखाता, केवल मुस्कान दिखाता है। कोई अपने आँसू नहीं दिखाता, केवल छुट्टियों की तस्वीर दिखाता है। और हम दूसरों की चुनी हुई तस्वीरों की तुलना अपनी पूरी जिंदगी से करने लगते हैं।

धीरे-धीरे संतोष कम होने लगता है।

यदि किसी को सुंदरता को लेकर असुरक्षा है तो उसे और सुंदर चेहरे दिखाए जाते हैं। यदि किसी को कमाई की चिंता है, तो उसे महंगी गाड़ियाँ और बड़े घर दिखाए जाते हैं। यदि कोई अपने करियर से परेशान है तो उसे लगातार दूसरों की सफलता की कहानियाँ दिखाई जाती हैं। एल्गोरिदम हमारी कमजोरी पहचानकर उसी को व्यापार में बदल देता है।

यहीं ईर्ष्या भावना नहीं रहती, उत्पाद बन जाती है।

*किसी को लगता है, “मैं कम सुंदर हूँ” – तो ब्यूटी फिल्टर और कॉस्मेटिक उत्पाद बिकते हैं।*

*किसी को लगता है, “मैं पीछे रह गया हूँ” – तो महंगे कोर्स और सफलता के शॉर्टकट बिकते हैं।*

*किसी को लगता है, “मेरे पास वह जीवन नहीं है” – तो यात्रा, फैशन, गैजेट और दिखावे की चीज़ें बिकती हैं।*

बाज़ार को हमारे संतोष से लाभ नहीं होता। उसे हमारी कमी के अहसास से लाभ होता है।

आज तुलना केवल इंसानों से नहीं, कृत्रिम चेहरों और AI से बने जीवन से भी होने लगी है। कई चेहरे असली नहीं होते, कई दृश्य वास्तविक नहीं होते, कई सफलताएँ सजाई हुई होती हैं और कई मुस्कानें फिल्टर से बनी होती हैं। लेकिन उनसे पैदा होने वाली ईर्ष्या बिल्कुल असली होती है।

यह आधुनिक समय की सबसे बड़ी विडंबना है – नकली दुनिया असली बेचैनी पैदा कर रही है।

एक कलाकार वर्षों की मेहनत से चित्र बनाता है। कोई तुरंत कह देता है – “यह तो AI से बना होगा।”

एक लेखक मन से लेख लिखता है। कोई कह देता है – “यह तो मशीन ने लिख दिया होगा।”

एक विद्यार्थी मेहनत से प्रोजेक्ट बनाता है। कोई शक कर लेता है – “AI की मदद ली होगी।”

पहले लोग दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते थे। अब लोग दूसरों की मेहनत पर भी शक करने लगे हैं। ईर्ष्या ने केवल तुलना नहीं बढ़ाई, उसने विश्वास भी कम कर दिया है।

लेकिन यहाँ एक बात समझनी जरूरी है। AI या तकनीक अपने आप में बुरी नहीं है। वही तकनीक किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति को पढ़ने, चलने और दुनिया पहचानने में मदद करती है तो वह वरदान बन जाती है। वही AI डॉक्टर की सहायता करता है, शिक्षा को आसान बनाता है, भाषा की बाधाएँ कम करता है और किसी असमर्थ व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है तो वह मानवता की सेवा करता है।

समस्या तकनीक में नहीं, उसके उपयोग और हमारे दृष्टिकोण में है।

यदि एल्गोरिदम हमें दूसरों से ईर्ष्या करना सिखाए तो वह खतरनाक है। यदि वही तकनीक हमें सीखने, समझने और बेहतर बनने की प्रेरणा दे तो वह उपयोगी है। साधन वही है, परिणाम हमारी चेतना तय करती है।

जीवन का बड़ा सत्य यही है कि हर चमक सफलता नहीं होती और हर साधारण जीवन असफलता नहीं होता। सोशल मीडिया पर दिखने वाली दुनिया अक्सर पूरी नहीं, चुनी हुई होती है। किसी की मुस्कुराती तस्वीर उसके पूरे जीवन का प्रमाण नहीं होती। किसी की उपलब्धि आपकी कमी का सबूत नहीं होती।

ईर्ष्या का इलाज तुलना नहीं, कृतज्ञता है। असंतोष का इलाज दिखावा नहीं, आत्मस्वीकृति है और तकनीक का सही उपयोग तभी है जब वह हमें बेहतर इंसान बनाए, बेचैन उपभोक्ता नहीं।

इसलिए कभी-कभी स्क्रीन से नज़र हटाइए। अपने घर को देखिए। अपने रिश्तों को देखिए। अपनी मेहनत को देखिए। अपने छोटे-छोटे सुखों को पहचानिए। हो सकता है जो जीवन आपको साधारण लग रहा है, वही किसी और का सपना हो।

दुनिया को एल्गोरिदम की बनाई तुलना से नहीं, अपने मन की सच्चाई से देखना सीखिए।

क्योंकि जीवन की सुंदरता दूसरों से आगे निकलने में नहीं, अपने भीतर संतोष, करुणा और सच्चाई बचाए रखने में है। तकनीक हाथ में रहे तो साधन है, सिर पर चढ़ जाए तो संकट। चुनाव हमारे हाथ में है – हम एल्गोरिदम के उपभोक्ता बने रहेंगे या अपनी चेतना के स्वामी बनेंगे

लेखिका सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल हैं 

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