कुछ विद्वानों की राय है कि हमारा देश शुरू से ही कथा प्रेमी देश रहा है। इसलिए हमारे यहां इतने सारे पुराणों, उपनिषदों,शास्त्रों की रचना हुई है जिनमें मुख्य तौर पर कथाओं और कर्मकांड के विस्तृत विवरण हैं। इसके अलावा हजारों अलिखित कथाएं भी लोक में प्रचलित हैं। पुराण कथाओं में देवताओं और दैत्यों की कथाएं प्रमुख हैं। हमारी कथाओं की एक विशेषता यह भी है कि उनमें विभिन्न देवता भी हिंसक और अहिंसक पशुओं के रूप में आते रहे हैं। वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की यहां प्रस्तुत कहानी ‘अथ नव दैत्य कथा’ भी पुराण कथाओं की शैली को आधार बनाकर लिखी गई है परंतु उसकी विषय वस्तु पौराणिक नहीं आधुनिक है। संपादक
कहानी
अथ नव दैत्य कथा
ओमसिंह अशफ़ाक
बीते ज़माने की बात है। पूरब-मुल्क में एक प्रतापी राजा राज करता था। छोटी-बड़ी रियासतों में उसके सूबेदारों की तूती बोलती थी। राजा और सुबेदारों को कोई विशेष कष्ट न था। हाँ. कभी-कभार खाँसी-जुकाम वगैरा ज़रूर चलता रहता था। फिर भी राजा और उसके सभी सूबेदार प्रसन्न थे।
उनके भंडार धन-धान्य से भरे रहते थे। उस मुल्क की प्रजा भी खूब कमाऊ थी। दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करने की अभ्यस्त थी। जो कुछ मिल जाता, उसी से संतोष कर लेती थी। ‘गोधन, गजधन, बाजधन और रतनधन को धूल के समान’ समझती थी। उसकी नजरों में संतोषधन ही सबसे बड़ा धन था। ऐसे समय गुजर रहा था। तभी एक दिन एक अनहोनी घटना घट गयी।
प्रतापी राजा की पाताल लोक के चक्रवर्ती राजा से घनिष्ट मित्रता थी। पाताल लोक का राजा बहुत दौलतमंद और ऐश्वर्यशाली था। उसके पास भांति-भांति के अग्निबाण थे। पुष्पक विमान और गगनभेदी गोले़ थे। सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात का वार-पार न था। वहां की प्रजा भी बहुत खुशहाल थी। उसके राज्य में कई अमीरजादे पैदा हो गये थे। पाताल लोक के एक अमीरजादे ने दैत्य को वश में करने की कला सीख रखी थी।
उस दैत्य के अन्दर यह हुनर था कि अमीरजादा जितनी दौलत चाहे, वह दैत्य बना देता था। परन्तु पाताल लोक की प्रजा उस दैत्य के उत्पातों से आजिज आ गयी थी। उसने अपने राजा से गुहार करके अमीरजादे के दैत्य को बेड़ियों में जकड़वा दिया था। अब अमीरजादा बेहद परेशान था। दौलत की पैदावार और ऐय्याशी उसके प्रिय शौंक थे। पर दौलत तो अब उगनी बन्द हो गयी थी।
अमीरजादे को एक दिन एक युक्ति सूझी। वह पूरब मुल्क के राजा के पास आया। और उसे अपने हुनरबाज दैत्य का रहस्य बताया। साथ ही यह प्रस्ताव भी रखा कि वह दैत्य के जरिये इस मुल्क में जो भी दौलत पैदा करेगा, उसमें से कुछ हिस्सा राजा और उसके सूबेदारों के कल्याण कार्यों पर ज़रूर खर्च करेगा। खैर, पूरब मुल्क के राजा ने अमीरजादे के दैत्य को अपने मुल्क की एक गरीब रियासत में आबाद करने की इजाजत दे दी।
दैत्य रियासत में आबाद हो गया। रियासत की रियाया ने पहले तो उसे कौतूहलवश दूर से देखा। फिर उसके चारों ओर घूमकर-छूकर भी देखा। उसे वह दैत्य अजीब सा लगा लेकिन उसकी कारस्तानियों के बारे में रियाया को कुछ पता नहीं था। कई बरस अमीरजादे ने भी अतिरिक्त चौकसी बरती और दैत्य फलता-फूलता रहा। रियाया भी दैत्य को वराह का अवतार समझकर उसकी सेवा शुश्रूषा में लग गयी।
अब अमीरजादा बेफिक्र हो गया। उसने दैत्य की सुध-बुध लेनी ही छोड़ दी। दैत्य धड़ाधड़ दौलत पैदा करता और अमीरजादे के कारिन्दे उसे जहाजों में लादकर पाताल लोक उतार आते। दैत्य के खतरनाक इरादों और संभावित उत्पातों की वहां किसी को फ़िक्र न रह गई थी। पर दैत्य तो आखिर दैत्य था। वह अपना स्वभाव कैसे छोड़ सकता था?
एक मनहूस रात दैत्य उखड़ गया। उसने जोर से दो-तीन डरावनी हुंकार भरी और काला-काला ज़हर उगलना शुरू कर दिया। जितना ज्यादा जोर से वह फुफकारता उतनी ही अधिक दूर तक ज़हर की फुहार हवा को
सोखती हुई नागिन की तरह वातावरण में पैठ जाती थी। लिहाज़ा वह जहरीली फुहारें चारों ओर बस्ती में सोए हुए नर-नारियों, बच्चों-बूढ़ों-जवानों- सबके नथुनों में घुस गई। और लोगों पर चिरबेहोशी छा गई। लेकिन ताज़्जुब की बात यह थी कि उस रियासत के सूबेदार पर ज़हरीली फुहार का कुछ भी असर नहीं पड़ा। दूर-दराज की रियाया के कुछ सिरफिरों ने इल्ज़ाम लगाया कि हादसे की रात सूबेदार तो अपनी रियाया को मौत के मुंह में निहत्थी और निराश्रित छोड़कर भाग खड़ा हुआ था। इसीलिए वह जिन्दा बच गया। सुबेदार ने खम्ब ठोककर दावा किया कि उसके भाग खड़े होने का आरोप
बेबुनियाद है। उस रात वह रियासत की राजधानी में दैत्य की फुफकार की जद में ही डटा हुआ था, जो लोग उसके भाग जाने की अफ़वाह उड़ा रहे हैं, दरअसल वे खुद रियाया और मुल्क के दुश्मन हैं।
इस हादसे से महीना भर पहले पूरब मुल्क के राजा का दुखद देहावसान हो गया था। विदित हो कि वहां के मंत्री और संतरी बड़े स्वामीभक्त और नमकहलाल थे। प्रजा तो उदारमना थी ही। उनसे दिवंगत राजा के इकलौते और अल्पायु राजकुमार का दुख न देखा गया।
राजा की मृत्यु उपरान्त उसके कुछ एक स्वामीभक्त वजीरों में छीना-झपटी और आपसी कलह जरूर नजर आयी पर थोड़ी थुक्का-फजीहत के बाद अनुभवहीन राजकुमार के सिर पर ही राजमुकुट धर दिया गया। सुदर्शन राजकुमार पितृशोक से उबरा भी न था कि यह दैत्य वाली विपत्ति आन पड़ी।
इसी दाम्यान कुछ बेअक्ल लोग राजकुमार की ताजपौशी के औचित्य पर ही उंगली उठाने लगे थे। सो, राजकुमार ने प्रजा से अपनी गद्दीनशीनी का फतवा तेना जरूरी समझा। उसने जनमत-संग्रह का ऐलान कर दिया। जनमत-संग्रह के दौरान हुए इस हादसे से एक बार तो राजकुमार भी विचलित-सा होने लगा था। लेकिन किसी तरह संभल गया। वह विमान द्वारा दौड़ा-दौड़ा रियासत में आया। मरे हुओं के दुख को अपने दुख में शामिल करके अत्यन्त दुखी हुआ। रियासत के सूबेदार और कारकूनों को घायलों की दवा-दारू करने की हिदायत दी और राजधानी लौट गया।
रियासत के सूबेदार और कारकूनों को तो ज़हरीली फुहार की काट मालूम न थी। सो वे सब बडी उलझन में पड़ गये। अब क्या किया जाये ? नवनियुक्त राजकुमार का हुक्म मोड़ना संभव न था। अपनी अल्पज्ञता ज़ाहिर करने का अर्थ उससे भी ज्यादा नुकसानदेह हो सकता था। आखिर उन्होंने एक तरकीब निकाली।
पाताल लोक के अमीरजादे के फेमिली डाक्टर को टेलिफोन मिलाया। डाक्टर ने फौरी तौर पर सलाह दी कि जो चले गये, उन्हें भूल जाओ। और जो फिलहाल घायल हैं. उन्हें ‘सोडियम थायोसल्फेट’ की सुइयां लगाकर उपचार किया जाये। अस्तु, अमीरजादे को पूरे मामले की सुबह खबर दी गई तो वह डाक्टर की बेवकूफी पर सबसे ज्यादा क्रोधित हुआ। उसका कहना था (और जो वाजिब ही था) कि इस मूर्खता से तो दैत्य द्वारा दौलत की पैदावार का गुप्त रहस्य उजागर हो जायेगा। इसलिए तुरन्त ही भूलसुधार करके सुइयों का इस्तेमाल बन्द करवाया गया। फलस्वरूप घायलों को भी सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिल गई।
परन्तु नाशुक्रे कहां नहीं होते ? उन्हें इस प्राकृतिक विपदा में भी राजनीति नज़र आयी। उन्होंने अन्दर-बाहर हल्ला मचाना शुरू कर दिया। पाताल लोक के युवा राजा को भी भनक लगी। उसने अमीरजादे की पीठ थपथपाई और अमीरजादा शर्माता-इठलाता रियासत में पहुंचा। वहां की रियाया को अमीरजादे के हंसमुख स्वभाव से भी गैरवाजिब झुंझलाहट हुई।
लेकिन समझदार सूबेदार ने तुरन्त ही दुष्टों द्वारा किसी अनिष्ट की आशंका को भाँप लिया। उसने फौरन अमीरजादे की गिरफ्तारी का ऐलान कर दिया। सूबेदार ने अमीरजादे को पुष्पक विमान में बिठाया और पुरब-मुल्क की राजधानी की मार्फत सकुशल पाताल लोक वापिस भेज दिया।
कुछ दिनों बाद सूबेदार और राजकुमार ने हिसाब जोड़ा तो मालूम हुआ कि सिर्फ ढाई-हजार मरे हैं और केवल पचासेक हजार अधमरे हुए हैं। कुछ शरारती तत्व यूं ही हो-हल्ला मचा रहे थे। राजकुमार का जनमत-संग्रह अभियान भी बेखटके अभूतपूर्व विजय को प्राप्त हुआ। कुछ भी अड़चन नहीं आई।
इतनी कथा सुनाकर सुकदेव जी बहुत प्रसन्न हुए। पूरी तरह दाहिनी तरफ़ झुककर बायें घुटने को आसन से उखाड़ा और अशुद्ध वायु ख़ारिज करके राजा की जयजयकार करने लगे! उदारमना प्रजा की भी प्रशंसा की। सुकदेव जी बोले- हे भक्तो! जिस देश का राजा इतना कृपालु और प्रजा इतनी उदारमना हो, मृत्यु उस देश का कुछ बिगाड़ नहीं सकती।
सुदर्शन राजकुमार, रियासत का सूबेदार और अन्य कारकूनों का स्वास्थ्य अब कैसा है ? और वे किन-किन पदों को सुशोभित कर रहे हैं ?-भक्तजन जानने को आतुर थे, तभी गुरुजी ने शेषकथा एकादशी-प्रवचन के लिए स्थगित कर दी। और भक्तजन अपने गुरभाइयों को बधाई देते हुए अपने-अपने घरों को प्रस्थान कर गये।
(जतन, जनवरी-मार्च 1993)
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नोट : पाठक समझ ही गए होंगे कि उपरोक्त कहानी 1984 में, दो-तीन दिसंबर की रात को, मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कारखाने में जहरीली गैस रिसाव कांड पर केंद्रित है। जिसमें 3,787 लोग तुरंत मर गए थे और 15 से 25 हजार लोग जहरीली गैस से प्रभावित होकर बाद में लाइलाज बीमारी के शिकार होकर मरे। जहरील गैस से प्रभावित हुए कुल लोगों की संख्या तो लाखों में है। वह भयंकर मानव निर्मित दुर्घटना इतिहास में ‘भोपाल गैस कांड’ (Bhopal Gas tragedy) के नाम से दर्ज हुई है।

प्रतिबिंब मीडिया के नियमित संजीदा पाठक श्री सुरेंद्र पाल तोमर की यह टिप्पणी कहानीकार के व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई है:
“यूनियन कार्बइड कम्पनी के मालिक वारेन एंड्रसन पर भारत मे ही मुकदमा चलना चाहिए था परन्तु इतनी भयंकर दुर्घटना के बाद भी तत्कालीन प्रधान मंत्री ने उसे भागने से रोकने का आदेश जारी नहीं किया था और एंड्रसन उड़ गया. पीड़ित जनता बीसियों वर्षो तक मुवावजा व आर्थिक सहायता के लिए भटकती रही थी. भारत देश महान है??? बहुत सही सही लिखा है आपने.”
-सुरेंद्र पाल तोमर,
भारतीय सेना का पूर्व सैनिक,
बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।
वरिष्ठ जनवादी कवि और जनवादी लेखक संघ, हरियाणा के अध्यक्ष जयपाल जी की यह टिप्पणी कहानीकार के व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई है;
“भोपाल गैस त्रासदी और सरकार का इस त्रासदी के प्रति असंवेदनाशील व्यवहार तो था ही..इसके साथ ही मुख्य अपराधियों को बचाकर उसने बेहद क्रूरता का परिचय दिया..देश की जनता ने भी प्रजा का धर्म निभाया..
पौराणिक कथा परंपरा शैली में लिखी गई सशक्त व्यंग्य कथा है।
बधाई।”
-जयपाल, अंबाला (हरियाणा)