राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं.

राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं.

1.

एक ओस-कण है आदमी

 

दूसरों को अज्ञानी समझते हुए

ख़ुद को चरम ऋषि समझ रहा है आदमी

चोर क्या देखे,मोर क्या देखे,नाचे-नाचे

मोर-चोर ख़ुद ही बन गया है आदमी

धूप-धूप खेलते हुए,झोंकता है धूल

ऑंखें अपनी ही खो रहा है आदमी

खोटी अठन्नी-चवन्नी दिखा-दिखाकर

सिक्के सोने के हड़प रहा है आदमी

समझ-समझ के फेर में,है समझ का फेर

समझ के फेर में उलझ रहा है आदमी

पत्थर पूजकर देवता बना रहा है आदमी

और पत्थर से बद्तर हो रहा है आदमी

राख,धूल,मिट्टी है,सब जानता है आदमी

राख,धूल,मिट्टी से कम हो रहा है आदमी

हर आदमी के भीतर छुपा है ये आदमी

इसी आदमी से लड़ रहा है ये आदमी

आदमी है अच्छा कि है शैतान का बच्चा

आदमी को ही नोंच खा रहा है आदमी

हरे पत्ते पर एक ओस-कण है ये आदमी

सुबह होते ही सो जाएगा ये आदमी.

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2

गहरी नींद है मृत्यु

 

गहरी नींद है मृत्यु की मानिंद

जागता रहा हूॅं कि हुईं हैं शताब्दियाॅं

शायद किसी एक खिड़की के इंतज़ार में

कहीं कोई एक दस्तक सुनाई देगी धीरे से

सिर मेरा ही टकराएगा मेरी ही दीवारों से

कोई पुकारेगा उधर से बार-बार एक दिन

इधर घन-घनाती रहेगी फ़ोन की घंटी

शोर होता रहेगा,बाॅंसुरी बजती रहेगी

महुआ बीनती रहेंगी आदिवासी औरतें

परचून पर बिकता रहेगा मिर्च-मसाला

चूल्हे में राख होती रहेंगी सूखी लकड़ियाॅं

सूना-सूना,वीराना सब लिखते रहेंगे कवि

फिर-फिर खिलते रहेंगे फूल जॅंगल-जॅंगल

शेष जो रहेंगे,सुनेंगे क़िस्से-कहानियाॅं

ग़र याद रहे.

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