ईमानदार लेखक हमेशा आम आदमी या अंतिम आदमी के साथ खड़ा मिलेगा : बल्ली सिंह चीमा

मजदूर दिवस पर साहित्यिक आयोजन

ईमानदार लेखक हमेशा आम आदमी या अंतिम आदमी के साथ खड़ा मिलेगा : बल्ली सिंह चीमा

अंबाला में ‘मिलिए अपने लेखक से’ कार्यक्रम के तहत क्रांतिकारी जनकवि बल्ली सिंह चीमा से  संवाद

अंबाला । ‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के’- जैसा प्रसिद्ध क्रांतिकारी गीत लिखने वाले जन-कवि बल्ली सिंह चीमा का आज मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में ट्रिब्यून कालोनी स्थित प्रो. रतन सिंह ढिल्लों के निवास स्थान पर भव्य स्वागत किया गया। ‘मिलिए अपने लेखक से’ कार्यक्रम के तहत उनसे विस्तृत संवाद किया गया और सवाल जवाब भी किए गए। यह कार्यक्रम प्रगतिशील लेखक संघ अंबाला ने आयोजित किया था। इस आयोजन में जनवादी लेखक संघ अंबाला की विशेष भूमिका रही l

अंबाला के सुप्रसिद्ध कवि एडवोकेट कृष्ण अवतार सूरी की अध्यक्षता में आयोजित इस साहित्यिक-संवाद में  बल्ली सिंह चीमा मुख्य मेहमान और विशिष्ट अतिथि प्रो. इकबाल सिंह चौहान थे । कार्यक्रम का संचालन जनवादी लेखक संघ हरियाणा के अध्यक्ष  जयपाल और प्रो.गुरुदेव सिंह ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित रचनाकारों ने अपनी कविताएँ सुनाकर इस आयोजन को सफल बनाया।

देश भर के किसान आंदोलनों और मजदूर आंदोलनों के लिए गीत लिखने वाले जनकवि बल्ली सिंह चीमा स्वयं भी किसानों/मजदूरों के मंचों पर जाकर अपने गीत गाते रहे हैं l दिल्ली बॉर्डर पर किसान आंदोलन में वे लगभग एक वर्ष तक शामिल रहे। उनका मानना है कि हर लेखक को एक एक्टिविस्ट भी होना चाहिए तभी उसकी रचना में समाज का वास्तविक दर्द आ पाएगा। हर रचनाकार का समाज के संघर्ष में शामिल होना इसलिए जरूरी है कि वह स्वयं समाज के बीच में जाकर समाज के यथार्थ को समझ सके और समाज में अपनी भूमिका तय कर सके। अपनी एक कविता में वे कहते हैं-

तय करो किस ओर हो 

आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो

अब तक उनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें उनके क्रांति-गीतों के लिए उत्तराखण्ड सरकार,राजस्थान सरकार और राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है। उनके गीत फ़िल्मों में भी शामिल किए गए हैं। उनका मानना है कि छंदों में लिखी गई गेय रचना लोगों की जुबान पर चढ़ जाती है।

इस संदर्भ में उन्होंने त्रिलोचन,बाबा नागार्जुन, दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी का उदाहरण भी दिया। उनके गीत, ग़ज़ल और कविताओं के आधार पर उन्हें प्रतिरोध और विद्रोह का कवि कहा जा सकता है। हालांकि उनका कहना था कि प्रतिरोध के साथ-साथ प्रेम भी उतना ही जरूरी है और उन्होंने कुछ प्रेम कविताएं भी लिखी है। वे बाबा नागार्जुन को अपना आदर्श मानते हैं।

बाबा नागार्जुन ने उन्हें कहा था कि कविता आम बोलचाल की भाषा में लिखी जानी चाहिए लेकिन उसमें गहराई का होना जरूरी है। कविता किसी की प्रशंसा या निंदा में नहीं लिखी जा सकती, उसमें आलोचनात्मक दृष्टि रहनी चाहिए। इसलिए लेखक स्वाभाविक प्रतिपक्ष होता है । किसी सरकार का चाटुकार कभी अच्छा लेखक नहीं हो सकता। एक ईमानदार लेखक हमेशा आम आदमी या अंतिम आदमी के साथ खड़ा मिलेगा।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने स्वयं को मार्क्सवादी बताते हुए कहा कि मार्क्सवाद दुनिया की सर्वश्रेष्ठ विचार धारा है जो मनुष्य की बराबरी और शोषण मुक्त समाज की बात करती है। इस विमर्श में डॉ ढिल्लों, डॉ राजिंदर सिंह, डॉ इकबाल सिंह, मनीषा नारायण भसीन, सुनील अरोड़ा, गुरमीत सिंह, आत्मा सिंह, राजिंदर कौर, दिलीप मेहता, गुरनाम बावा, हरबंस सिंह आदि ने सक्रिय भाग लिया । नामी शायर अक़ीमुद्दीन अक़ीम मंडावरी, मनीषा नारायण भसीन, राजिंदर कौर और यादविन्दर सिंह कलौली ने मजदूर को समर्पित कविताएं पेश की।

अध्यक्षीय भाषण में एडवोकेट कृष्ण अवतार सूरी ने कहा कि हमें लिखने के साथ-साथ गरीब मजदूरों के लिए कुछ जमीनी काम भी करना चाहिए तभी हमारा लेखन सार्थक होगा। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि वे जरूरतमंद गरीब मजदूरों के केस बिना किसी फीस के लड़ेंगे। उनकी इस घोषणा का सबने स्वागत किया।

अपने समापन वक्तव्य में आलोचक और कवि डॉ ढिल्लों ने कहा कि हमें कविता में शब्दों का इस्तेमाल सोच समझ कर करना चाहिए और किसी के दबाव में शब्द बदलने भी नहीं चाहिए। लेखक को भाषा के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने उपस्थित हुए रचनाकारों/बुद्धजीवियों का धन्यवाद किया और आज के कार्यक्रम को सफल एक आयोजन बताया। उन्होंने कहा प्रगतिशील लेखक संघ आगे भी इस प्रकार के कार्यक्रम करता रहेगा।