कुछ निजी प्रसंग-3
आज का समय और कविता की ताकत-3
ओमसिंह अशफ़ाक
यह तीसरी घटना कैथल शहर की है।
जनवरी 2007 में जन-कविता की मेरी एक पुस्तक ‘जब इंसाफ कहीं न होता हो।’ (उप शीर्षक: अन्याय गाथा) तब छप कर आई थी।
कुछ समय बाद डॉ० राजबीर पराशर कुरुक्षेत्र आए थे और वह मुझसे ‘अन्याय गाथा’ की’ 20 प्रतियां ले गए थे।
उन्होंने कैथल में अपने घर के निकट एक छोटे हाल में उस पुस्तिका पर एक विचार-गोष्ठी आयोजित करवाई थी।
उस विचार-गोष्ठी में कैथल के अनेक कवि-लेखक शामिल हुए थे।
‘साहित्य सभा कैथल’ के अध्यक्ष प्रो. अमृत लाल मदान कहीं बाहर गए थे हुए थे।
लेकिन साहित्य सभा के सचिव श्री कमलेश शर्मा अंत तक गोष्ठी में मौजूद रहे।
कुछ औपचारिकताओं के बाद मुझे निर्देश हुआ कि ‘अन्याय गाथा’ की कुछ कविताएं मैं अपनी आवाज़ में पढ़कर सुनाऊं।
मैंने पूरी ‘अन्याय गाथा’ (जिसमें 45 बन्द हैं) उस विचार-गोष्ठी में सुना दी।
सबने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी जोकि मेरे लिए बहुत उपयोगी, महत्वपूर्ण और कुछेक तो बहुत उत्साहवर्धक भी थीं।
साहित्य सभा कैथल के सचिव कमलेश शर्मा (जोकि स्वयं एक कवि एवं लघु कथाकार हैं) ने एक बहुत रोचक और उपयोगी टिप्पणी की थी।
उनकी टिप्पणी से एक शब्द-चित्र भी बनता है।
कमलेश शर्मा ने कहा- जब हम कविता सुन रहे थे तो एक रोचक-दृश्य बन रहा था।
जैसे कोई जोगी या सूफ़ी अपनी तुम्बी छाती से सटाकर कोई गीत गाता जा रहा हो और हम सब मंत्रमुग्ध हो उसके पीछे-पीछे गली-गली घूम रहे हों….’
उसी कविता के कुछ बन्द यहां पाठकों के लिए भी प्रस्तुत हैं:
1.
जब लोग भूख से मरते हों!
घर शासक अपना भरते हों!
सरमाया (इ)कट्ठा करते हों!
ना नीत भले पर धरते हों!
बच्चे भी बिलखते-डरते हों!
क्यूं? पूरे ही कुनबे मरते हों!
बुड्ढे भी आहें भरते हों!
कुछ कहते हुए भी डरते हों!
भई,दिन बरजण के आन पड़े!
2.
जब देश में गांव बिकाऊ हो!
बेशक बहोत कमाऊ हो!
ना पैदा काम चलाओ हो!
न्यूं खेत्ती ख़सम ने खाऊ हो!
ना समझै चाचा-ताऊ हो!
या नीति आग-लगाऊ हो!
और भाषण लोग रिझाऊ हो!
यूं राजनीति भड़काऊ हो!
भई,दिन बरजण के आन पड़े!
3.
जब कर्ज़ में खेती मरती हो!
पाले़ में चिट्टी धरती हो!
ना सारा श्रम उजरती हो!
ये हमला गैर-कुदरती हो!
न्यूं मरे बिना ना सरती हो!
भई,दिन बरजण के आन पड़े!
4.
जब बाबाओं के भी डेरे हों?
बीघे लाखों धरती घेरे हों?
और जाल में फंसे कमेरे हों!
फिर बुरे दिनों के फेरे हों!
वहां छिपते क़ातिल तेरे हों!
और नेता चार-चफेरे हों!
यूं करतब और भतेरे हों!
फिर उज़ले कैसे चेहरे हों?
भई,दिन बरजण के आन पड़े।
5
जब गुरुओं के दरबार सजें!
चेल्ले-चपटे सब नाम भजें!
सिर पे उनके व्यौपार तिरें!
फिर नगर-नगर वे रोज फिरें!
अरे,सहस्र-कुंडी यज्ञ करें!
और शहर को सारे हग भरें!
गुरुओं का जितना भार बढ़े!
उतना ही धर्म का सार घटे!
भई,दिन बरजण के आन पड़े!
6.
जब जटा-जूट लंगार फिरें!
भ्रामक सब प्रचार करें!
यूं जनता की वे मति हरें!
क्यूं जीते-जी ना गति करें?
ये ठग्गी की ही युक्ति हो-
कि मरे बाद ही मुक्ति हो!
पर्दे में भाग्य के लूट ढकें!
और चौबीस घंटे कुफ़र बकें!
फिर तीनों टेम वे माल छकें!
भई,दिन बरजण के आन पड़े!
———————–
कुछ शब्दार्थ: पाठक की सुविधा के लिए;
1. बरजण यानी रोकना,वरजना, मना करना, वर्जित करना, वर्जना।
2. गांव बिकाऊ यानी नीलामी के लिए तैयार। पंजाब महाराष्ट्र की घटनाएं। जिला भटिंडा में गांव के बाहर नीलामी-बोर्ड लगा दिए गए थे।
3. चिट्टी धरती यानी सफ़ेद जमीन,धौली़, व्हाइट मिट्टी ऊपरी।आज का समय और कविता की ताकत-3

लेखक के व्हाट्सएप पर एक और टिप्पणी प्राप्त हुई है:
“आजकल आप बहुत अच्छा और सारगर्भित लिख रहे हैं। बहुत बधाई।”
-डॉ बृजेश कृष्ण ‘कठिल’
प्रोफेसर (सेवानिवृत्त)
प्राचीन इतिहास विभाग,
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र
(हरियाणा) भारत।
ओमसिंह अशफाक जी आप वास्तव में एक लोककवि या लोकगीतकार हो। आपकी इस कविता में माटी की सौंधी सौंधी गंध है। कविता में गतिशीलता के साथ साथ लय, ध्वनि और संगीत भी है।
लेखक के व्हाट्सएप पर एक और टिप्पणी प्राप्त हुई है:
“It is true that the profiteers exploit the adverse situation inthe country to amass more and more money.The life of the poor and the downtrodden is becoming hell. The politicians, babas, profiteers and corrupt officers are responsible for the plight and sufferings of the masses. Who will stop it ? Today is the Avtaar divas of Bhagwan Narsingh( a lion among humans). Some such great man will emerge from the masses to end their sufferings.
Very good attempt to stir and awaken our sleeping and lazy spirit.”
-Dr. NK Nagpal,
Principal (retired)
IGN college, Ladwa KKR,
(Haryana) Bharat.
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प्रिय नागपाल सर,
आपकी महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
दरअसल मानवता के कष्ट निवारण हेतु इतिहास में भी कभी कोई मसीहा नहीं आया है। दास प्रथा के युग में भी गुलामी की बेड़ियां शोषित-पीड़ित गुलाम समाज को संगठित होकर खुद ही तोड़नी पड़ी थी।
जब उपयुक्त समय आता है तो इसी शोषित-पीड़ित जनता के बीच में से एक सुयोग्य नेतृत्व भी उभरकर आता है। बस,जरूरत तो इस शोषित-पीड़ित जनता को जाग्रत करने की है।
और जागृति का यह काम पढ़े-लिखे जागरूक इंसानों की नैतिक जिम्मेदारी है।उन्हीं के द्वारा यह काम संपन्न किया जा सकता है।
-ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र।