फलाणे की बहू बहोत नेक सै भाई

व्यंग्य

फलाणे की बहू बहोत नेक सै भाई

रणबीर सिंह दहिया

म्हारे हरियाणा मैं घूंघट बिना बहू की मूर्त पूरी कोण्या मानी जान्दी। पुराणे बख्तां मैं घूंघट की जकड़ बहोतै कसूती थी। यो घूंघट कद सुरू हुया, क्यों सुरू हुया इन बातां पर भी बिचार करण की जरूरत सै। मेरे हिसाब तै लुगाई नै काबू मैं राखण खातर घूंघट का सांग रच्या गया। औरत नै अपणे परिवार, अपणे गाम अर अपणे देस की तरक्की मैं फैसले करण तै रोकण खातर घूंघट का हथियार बणाया गया।
1893 मैं एक अंग्रेज नै लिख्या सै अक इस इलाके मैं घूंघट ना करण का मतलब सै अक वा औरत बदकार है, वा नैतिकता की सीमा पार करगी ज्यां करकै इसनै घर तै बाहर कर द्यो। नैतिकता मैं लपेट कै घूंघट पहरा दिया म्हारे बड़े बडेरयां नै।
आज इसी बात तो कोण्या रही पर ईब बी बिना घूंघट आली बहू का नाम नंगी काढ़ दिया जा सै। बिना घूंघट अर बेसरम औरत मैं कोए फरक नहीं रैहन्ता। कई माणस तो उसनै बदमास बी समझण लागज्यां सैं। उसपै न्यों बोल मारैंगे अक रै फलान्यां की बहू तै छाती दिखान्ती हांडै सै।
जै कोए औरत हिम्मत सी करकै पर्दा हटाणा बी चाहवै तै मर्द माणस छोह मैं आज्यां अर जै वा जिद करले तै उसकी पिटाई बी जम कै होज्या। बालकां अर माणसां की मौजूदगी मैं अपणे पति तै घूंघट करना, रिस्ते मैं अर उमर मैं गाम के बड्डे ठेर्यां तै घूंघट करना अर कुछ बुजरग औरतां तै घूंघट करना जरूरी मान्या जाया करदा ।
हरियाणे मैं घर की कलह की जड़ बहू मानी जावै थी अर सै अर कै पूरी इस लुगाई जात कै यो दोष लाया जा सै। न्यों मानकै चाल्या जा सै अक इस कलह पै काबू राखण खातर बी यो घूंघट जरूरी है।
एक सर्वे के हिसाब तै हरियाणा की 72. 61 प्रतिशत महिला घूंघट की सिकार सैं। कमाल की बात सै अक हरियाणा मैं ना तै आर्य समाज नै अर ना पढ़े लिखे बुद्धिजीवियां नै अर ना दूसरे समाज सेवियां नै बड्डे पैमाने पै घूंघट कै खिलाफ जन अभियान चलाया। घूंघट छोटा होग्या, घूंघट ऊपर नै सरकग्या फेर घूंघट आज बी खत्म नहीं हो लिया।
इस बात का किसे के पास जवाब नहीं कि यो घूंघट ईसा लाजमी तो फेर पंजाब मैं क्यों नहीं घूंघट का रिवाज?
घूंघट हरियाणा मैं आज्ञाकारिता का, सुद्ध चरित्र का, औरत की पवित्रता का, उसकी सालीनता का एक सामाजिक पैमाना बणा कै उढ़ा दिया गया। लुगाइयां कै बी इसकी चतुराई अर इसका काइयांपन समझ मैं नहीं आया। लुगाइयां भी घूंघट के ये हे मतलब मान बैठी अर पल्ले कै गांठ मारली।
पढ़ी लिखी औरत बी गाम मैं जावैंगी तो पर्दा करैंगी अक सासू उसकी बड़ाई करै अक देख इतना पढ़ लिख कै बी पर्दा करै। जिब सुसरा, ज्येठ के और कोए गाम का माणस सहर मैं आज्या तै भी पर्दा करै। जो पर्दा करैगी उसने गाम आले कैहंगे – फलाणे की बहू बहोत नेक सै भाई। गाम मैं रैहवण आली इसी औरतों नै कोए साबासी कोण्या देवै। गाम मैं तै मान के चाल्या जा सै अक बहू पर्दा करै ए करैगी।
पढ़े लिख्यां नै बी इसका विरोध क्यों ना करया या सोच्चण की बात तै सै ए। महिला की लिहाज (मोडैस्टी) उसकी आंख की सरम मानी जावै सै अर ज्यां करकै घूंघट तारकै बात करण की बात तै दूर रही उस ताहिं तै माणस तै आंख तै आंख मिलाकै बात करण की बी इजाजत कोण्या। और तै और चपाड़ के धोरे कै जागी तो बी घूंघट करैगी अर चपाड़ मैं चढ़ण की बी इजाजत कोण्या।
कोए मरज्या तै उसकी अर्थी गेल्यां समसान घाट मैं बी जाण की मनाही सै। घूंघट की जागां ढाठा मारण की छूट बी बालक चिलक आली बड्डी उम्र की लुगाइयां खात्तर सै। घूंघट इस बात नै तय करदे सै अक घर मैं, गाम मैं, अर बाहर किसकी बात ऊपर रैहगी। घूंघट औरत कै बेड़ी सै। साफ दिखण लागरी सै अक उसके हक उसनै ना मिल सकैं ज्यां तै बहू ताहिं घूंघट पहरा दिया।
यो इतना ए गुणकारी सै तै बतौर लड़की या बाहन के उस ताहिं घूंघट क्यों नहीं पहराया गया? उसके घूंघट की बेड़ी काटण की जागां उसनै घर मैं कैद करण की त्यारी होण लागरी सैं। बचियो! किमै करियो!! घूंघट के खिलाफ आवाज बुलंद करनी ए चाहिए आज हरियाणा मैं।

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