जातीय विशेषाधिकारों को बचाने का खेल

जातीय विशेषाधिकारों को बचाने का खेल

देवदत्त पटनायक

ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजों ने मीडिया और शिक्षा व्यवस्था पर कब्ज़ा कर लिया था, अब ‘सात्विक सनातनी’ लोग शिक्षा व्यवस्था और मीडिया पर कब्ज़ा कर रहे हैं। इस सब पर उन कट्टर शाकाहारी अरबपतियों का नियंत्रण है, जो इस विचार को बढ़ावा दे रहे हैं कि राम को मांसाहारी लोग पसंद नहीं हैं; यही कारण है कि उनके मंदिर के 15 किलोमीटर के दायरे में कहीं भी मांस नहीं बेचा जाता।

उनका कहना है कि मांस खाने से आप ‘अपवित्र’ हो जाते हैं। ‘पवित्र’ लोग मांस नहीं खाते। राम को अपवित्र लोगों से नफ़रत है। कृष्ण भी कट्टर शाकाहारी थे। केवल ‘चांडाल’ ही मांस खाते हैं। इसलिए, अब बंगालियों को ‘अहिंदू’ कहा जाने लगा है क्योंकि वे मछली खाते हैं; तमिल लोग भी ‘अहिंदू’ बन जाते हैं क्योंकि वे मछली और मांस खाते हैं। जो ब्राह्मण मछली खाते हैं, उन्हें ‘निम्न कोटि का ब्राह्मण’ माना जाता है।

इस प्रकार, भारत पर पूरी तरह से कब्ज़ा करने की प्रक्रिया एक सोची-समझी रणनीति के तहत चल रही है। आप इसे स्वीकार करें या न करें, लेकिन सच्चाई यह है कि आपके बच्चे जिस स्कूल में जाएँगे, वहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर सनातनियों का ही नियंत्रण होगा। वे ही बच्चों को सिखाएँगे कि उन्हें कैसे सोचना है, कैसे काम करना है, और सबसे महत्वपूर्ण बात—ब्राह्मणों के सामने कैसे झुकना है; क्योंकि स्वयं राम को भी रावण का वध करने के बाद खुद को ‘पवित्र’ करना पड़ा था, जबकि रावण एक ब्राह्मण था।

ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजों ने भारत पर विजय प्राप्त की थी, और जैसे मुगलों ने भारत पर विजय प्राप्त की थी, अब वैसे ही ‘पवित्र’ ब्राह्मणों, जैनों और बनियों ने भारत पर कब्ज़ा कर लिया है। इसका हिंदू धर्म को बचाने से कोई लेना-देना नहीं है। यह तो केवल अपने जातीय विशेषाधिकारों को बचाने का खेल है—यह शाकाहारी लॉबी की सत्ता का खेल है। यही कारण है कि वे संसद की संरचना को बदलना चाहते हैं, ताकि उत्तर भारतीय लोग दक्षिण भारतीयों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकें; क्योंकि ब्राह्मणों का मुख्य गढ़ आज भी उत्तर भारत ही है।

याद है न, जब वे कहते थे कि मुसलमान ज़्यादा बच्चे पैदा करके इस देश पर कब्ज़ा कर लेंगे? लेकिन, ठीक उसी रणनीति का पालन अब उत्तर भारत के सनातनी लोग कर रहे हैं। वे शिक्षित दक्षिण भारतीयों की तुलना में कहीं ज़्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं—यानी वे ‘द्रविड़’ लोग, जो मांस का सेवन करते हैं। यह रणनीति कितनी भयावह है!

ठीक वैसे ही जैसे यहूदी आबादी संख्या में भले ही कम हो, लेकिन वह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है; उसी तरह, सनातनी लोग भी बनियों, जैनों और ब्राह्मणों का एक छोटा सा समूह मात्र हैं, जो भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर अपना नियंत्रण जमाए बैठे हैं। जो लोग देख सकते हैं, वे इस सच्चाई को भली-भांति देख रहे हैं।

‘ऋषि’ का अर्थ है—वह व्यक्ति जो उन बातों को देख सकता है, जिन्हें दूसरे लोग या तो देख नहीं पाते, या देखना नहीं चाहते, अथवा देखने में असमर्थ होते हैं। आप भी एक ‘ऋषि’ बनें। इन ‘औपनिवेशिक ताकतों’ से अपनी रक्षा करें—ये वे लोग हैं जो भारत से प्रेम करने का ढोंग करते हैं, लेकिन असल में भारत को ‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ के आधार पर विभाजित करके उस पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे सभी आदिवासी लोगों को उनके जंगलों से बाहर निकाल देंगे, ताकि वे उन सभी जंगलों को जला सकें और उनके नीचे दबे सोने, लोहे और अन्य धातुओं को चुराकर, उन्हें सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाले को बेच सकें। क्योंकि जब राजा ही व्यापारी बन जाता है, तो प्रजा अंततः भिखारी बनकर रह जाती है। देवदत्त पटनायक के फेसबुक वॉल से साभार

यह लेखक के अपने विचार हैं।

लेखक- देवदत्त पटनायक

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