दलित आत्मकथा केवल निजी अनुभवों का वर्णन नहीं है

छब्बीसवाँ डॉ. विनीता अग्रवाल स्मृति रचनापाठ एवं परिचर्चा

दलित आत्मकथा केवल निजी अनुभवों का वर्णन नहीं है

डॉ. आदित्य चतुर्वेदी की रिपोर्ट

 

हिन्दी विभाग, देशबंधु महाविद्यालय में गत 1 अप्रैल, 2026, दिन बुधवार, को छब्बीसवाँ डॉ. विनीता अग्रवाल स्मृति रचनापाठ एवं परिचर्चा कार्यक्रम अत्यंत गंभीर, विचारोत्तेजक एवं बहुआयामी साहित्यिक विमर्श के साथ सम्पन्न हुआ।

देशबंधु महाविद्यालय के हिन्दी विभाग की पूर्व शिक्षिका डॉ. विनीता अग्रवाल की स्मृति में विगत 25 वर्षों से अनवरत साहित्यिक परिचर्चाओं का आयोजन होता रहा है। आज के समय में जब साहित्य केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक न्याय, असमानता, लैंगिक भेदभाव और जातिगत संरचनाओं को भी चुनौती देता है, ऐसे में इस प्रकार के आयोजन अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं। डॉ. विनीता अग्रवाल की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम एक परंपरा का हिस्सा है, जो वर्षों से साहित्यिक विमर्श को नई दिशा प्रदान करता आ रहा है। इस वर्ष का आयोजन विशेष रूप से दलित स्त्री आत्मकथा और उसके सामाजिक प्रभावों पर केंद्रित रहा।

हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा में स्मृति-व्याख्यान, रचनापाठ और परिचर्चाएँ केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे साहित्य, समाज और विचार के बीच सेतु का कार्य करते हैं। साहित्यिक चर्चाओं के क्रम में इस बार हिंदी की सुप्रसिद्ध दलित लेखिका सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ के महत्त्व पर चर्चा हुई। डॉ. प्रीति गुप्ता दीवान एवं दीबा ज़ाफ़िर द्वारा इस आत्मकथा का अंग्रेजी में ‘My Shackled Life’ शीर्षक से अनुवाद किया गया है। कार्यक्रम के आरंभ में मूल पाठ तथा उसके अनूदित अंश का रचना पाठ विशेष आकर्षण का केन्द्र रहा। इसके अंग्रेज़ी अनुवाद का पाठ डॉ. प्रीति गुप्ता दीवान द्वारा प्रस्तुत किया गया।। पूरे कार्यक्रम के दौरान हिंदी साहित्य, विशेषतः आत्मकथा-विधा, दलित स्त्री लेखन तथा समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों पर उद्देश्यपूर्ण संवाद हुआ जिसने, छात्र-छात्राओं की समझ को और विकसित किया।

कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत आईक्यूएसी के समन्वयक आनंद कुमार के स्वागत भाषण से हुई। हिंदी भाषा के प्रति अपने गहरे अनुराग को व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और संवेदना की आत्मा है। उन्होंने स्मरण किया कि वर्ष 2007 में आयोजित सातवें विनीता अग्रवाल स्मृति कार्यक्रम में उन्होंने स्वयं भी रचनापाठ किया था। यह उल्लेख न केवल उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को दर्शाता है, बल्कि इस परंपरा की निरंतरता को भी रेखांकित करता है।

कार्यक्रम के संयोजक प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि, जिस तरह संस्कृत साहित्य के “नांदी” प्रसंग को प्रमुख कथा से जोड़ने कार्य नट करता है, उसी प्रकार बजरंग जी कार्यक्रम में सूत्रधार की भूमिका निभाते हैं।

इसके पश्चात् प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने संचालक की भूमिका का निर्वहन करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की और आत्मकथा-विधा के स्वरूप एवं विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने आत्मकथा को “एकालाप” की संज्ञा देते हुए कहा कि यह विधा व्यक्ति के अंतर्मन की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, जो व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से व्यापक सामाजिक यथार्थ को उद्घाटित करती है। विचारसत्र के अतिथियों एवं वक्ताओं का परिचय हिंदी ऑनर्स के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किया गया।

रचनापाठ से पूर्व अपने वक्तव्य में टाकभौरे जी ने बताया कि उनकी लेखन-यात्रा का मूल उद्देश्य अपने अनुभवों, मनोभावों और सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्ति देना रहा है। अपने वक्तव्य में सुशीला जी ने ‘शिकंजे का दर्द’ की रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दिल्ली आगमन के पश्चात् रमणिका गुप्ता के निवास पर पत्रकार मजीद अहमद के आग्रह पर उन्होंने इस आत्मकथा को लिखना प्रारंभ किया। इस कृति का लेखन उन्होंने 2006 में प्रारंभ किया जो 2009 में अपनी अंतिम परिणति को प्राप्त हुआ। यद्यपि उन्होंने वाणी प्रकाशन से 2010 में प्रकाशन का अनुरोध किया था, किन्तु यह पुस्तक 2011 में प्रकाशित हुई।

अपनी आत्मकथा के वर्णित प्रसंगों में आरंभिक जीवन को याद कर सुशीला जी भावुक हो गईं। अपने बचपन, परिवार, गांव, विद्यालयीन जीवन एवं किशोरावस्था के संघर्षों को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि —“कब आया बचपन, जान न पाया मन।” उनके पति सुंदरलाल टाकभौरे शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता थे जिनका उनके जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहा। नागपुर प्रवास को उन्होंने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बताया, जहाँ वे आंबेडकरवादी आंदोलनों एवं स्त्री मुक्ति आंदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं।

उन्होंने बताया कि उनका लेखन कार्य 1980 के पूर्व ही प्रारंभ हो चुका था, किन्तु 1991 में “सिलिया” कहानी के प्रकाशन के बाद उन्हें व्यापक पहचान मिली। इसके पश्चात् उनकी कविता “मृगतृष्णा” प्रकाशित हुई तथा ‘स्वाति बूँद और खारे मोती’ नाम से 1993 में उनका प्रथम कविता संग्रह प्रकाशित हुआ।

सुशीला टाकभौरे ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि उनकी लेखन-यात्रा का मूल उद्देश्य अपने अनुभवों, मनोभावों और सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्ति देना तथा अपनी कथा के माध्यम से समाज को एक सशक्त संदेश पहुँचाना है। उनके अनुसार आत्मकथा केवल निजी अनुभवों का विवरण नहीं, बल्कि समाज और परिवार को समझने का एक माध्यम भी है।

सुशीला जी ने अपने रचनापाठ की शुरुआत अपनी आत्मकथा के पृष्ठ संख्या 24 पर वर्णित “नानी” के प्रसंग से की। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अपने जातिगत अनुभवों और समुदाय की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि उनकी नानी उनके घर के पास ही रहती थीं। सुशीला जी ने जाति-आधारित अपमान, घृणा और सामाजिक विषमता को निकट से अनुभव किया।

शुरुआत में वह अपने अपमान की वज़ह अपनी नानी के काम और रहने के तौर तरीकों को मानती थी। उन्होंने कहा कि, उनकी नानी हमेशा गुस्से में भगवान को गाली देती रहती थी, तेरी सत्ता उजड़ जाय, तुझे मौत आ जाय’ तब सुशीला जी को जाति, धर्म और भगवान के विषय में उतना ज्ञान नहीं था।

वे कहती हैं, हर वो उत्पीड़ित व्यक्ति जो कुछ नहीं कर सकता, उसका प्रतिरोध कभी-कभी गालियों के रूप में भी प्रकट होता है। अर्थात्, जो व्यक्ति असहाय होता है, वह अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए ईश्वर का प्रतिरोध भी करता है—यह मानव स्वभाव का एक सरल किंतु गहन सत्य है। उनकी नानी का ईश्वर को गालियाँ देना केवल आक्रोश नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो लगातार अपमान और असमानता के अनुभव से उत्पन्न होती है।

उन्होंने अपने जीवन के संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार उन्हें सामाजिक अपमान, पारिवारिक प्रताड़ना और लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। पृष्ठ संख्या 195 का उल्लेख करते हुए उन्होंने उस प्रसंग को साझा किया, जब वे प्रो. धर्मपाल पीहल के आग्रह पर उस्मानिया विश्वविद्यालय, में दलित साहित्य सम्मेलन में गईं, जहाँ यह टिप्पणी की गई कि उनकी सफलता के पीछे उनके पति का योगदान है। यह सुनकर उन्हें गहरा आघात पहुँचा, क्योंकि उनके दाम्पत्य जीवन में संघर्ष, विरोध और मानसिक उत्पीड़न के अनुभव अधिक थे। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके जीवन में डाँट-फटकार, उपेक्षा और स्त्री को हीन समझने की प्रवृत्ति आम थी।

कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता डॉ. कवितेन्द्र इन्दु ने प्रगतिशील एवं दलित आलोचना के केंद्रबिंदुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए। वे दलित साहित्य के गंभीर अध्येता हैं और उनके विचारों में समकालीन आलोचनात्मक दृष्टि स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। डॉ.कवितेन्द्र ने साहित्य एवं आलोचना, विशेषतः मार्क्सवादी आलोचना के संदर्भ में भी अपने विचार रखे। उन्होंने ग़ैरदलित स्त्री को “अंडर द मार्जिन” तथा दलित स्त्री को “बियोंड द मार्जिन” बताते हुए लेखन में दृष्टिकोण के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक के आसपास साहित्य और समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जेंडर और कास्ट के सवाल को साहित्य में प्रमुखता मिली।

दलित एवं आदिवासी लेखकों की आवाज़ प्रमुखता से सामने आने लगी फिर भी दलित लेखन में दलित स्त्री लेखकों की अभिव्यक्ति साहित्य में थी। डॉ. धर्मवीर की धारणा को पितृसत्तात्मक बताते हुए आलोचना की। कवितेन्द्र जी लक्ष्य करते हुए कहते हैं कि डॉ. धर्मवीर यहाँ तक कहते हैं कि दलितों को चाहिए अपनी स्त्रियों को काबू में रखें। जाति के सवाल से जूझिये लेकिन औरतों पर शिकंजा कड़ा रखिये।

समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कोई जाति अपना सामाजिक स्तर ऊँचा उठाना चाहती है, तो वह सबसे पहले अपनी स्त्रियों पर नियंत्रण स्थापित करती है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि दलित समाज में भी पितृसत्ता विद्यमान है, यद्यपि उसका स्वरूप भिन्न हो सकता है। कवितेन्द्र जी कहते हैं कि दलित स्त्री आन्दोलन का विरोध, दलित पुरूषों ने ही किया।

उनका मानना था कि दलित स्त्री लेखन, दालित आन्दोलन को कमजोर कर रहे हैं। उनके अनुसार साहित्य समाज का दर्पण नहीं है, बल्कि यह एक “मेटाफर” है, जो आंशिक सत्य को अभिव्यक्त करता है। उन्होंने भारतीय समाज की जटिलता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज अनेक समानांतर संसार एक साथ अस्तित्व में रहते हैं— जैसे एक ही घर में “सिलबट्टा” (प्राचीन संस्कृति का प्रतीक) और “एलेक्सा” (आधुनिकता का प्रतीक) दोनों मौजूद होते हैं।

दूसरी प्रमुख वक्ता के रूप में प्रो. बी. मंगलम उपस्थित रहीं। बी. मंगलम तमिल एवं अंग्रेज़ी के मध्य एक महत्वपूर्ण सेतु हैं तथा हिंदी के प्रति उनका गहरा लगाव है। उनकी क्लासिकल तमिल साहित्य में विशेष रुचि है, उन्होंने तमिल के दलित कथा साहित्य एवं उसके विविध आयामों का गहन अध्ययन किया है। उनके वक्तव्य में दलित कथा साहित्य में जाति एवं लिंग के प्रश्नों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत हुआ।

बी. मंगलम, ने अपने वक्तव्य की शुरुआत दलित एवं स्त्री विमर्श की अवधारणा से की। इन्होंने आत्मकथा को एक प्रकार का “एविडेंस” बताया, जो किसी व्यक्ति ही नहीं समाज के यथार्थ को प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करती है। बी मंगलम जी ने वर्ग, जाति और जेंडर के त्रिकोणीय संबंध को स्पष्ट करते हुए, नारीवाद और दलित विमर्श के मुद्दों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि दलित महिलाओं ने न केवल समाज, बल्कि दलित पुरुषों की पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों पर भी प्रश्न उठाए हैं।

बी. मंगलम ने अपने वक्तव्य में इस प्रश्न पर कि, क्या केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता ही स्त्री मुक्ति का आधार है? उनका उत्तर था— यह प्रारंभिक सत्य हो सकता है, किन्तु अंतिम नहीं।

उन्होंने “पैरलेल्स” (समानताओं) की अवधारणा पर विशेष बल देते हुए “जूठन” और “तिरस्कृत” जैसी कृतियों का उल्लेख किया। उन्होंने इंट्रा-दलित हायरार्की, यौन उत्पीड़न तथा गाइनोक्रिटिकल अप्रोच जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। उन्होंने वर्जीनिया वुल्फ के संदर्भ में कहा कि जब एक स्त्री लिखती है, तो वह अपने लेखन में स्त्री की उपस्थिति को खोजती है। पोस्ट-फेमिनिज़्म के दौर में भी लेखिकाओं को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसे उन्होंने ऐतिहासिक समानताओं के संदर्भ में प्रस्तुत किया।

उन्होंने “दोहरा अभिशाप” की अवधारणा पर चर्चा करते हुए दलित स्त्री के दोहरे संघर्ष— जाति के स्तर और लिंग के स्तर को रेखांकित किया। उन्होंने “शिकंजे का दर्द” और अन्य कृतियों में निहित संघर्ष, प्रतिरोध और आंबेडकराइट विचारधारा की समानताओं को स्पष्ट किया। बी. मंगलम ने सुशीला टाकभौरे के जीवन के “एक्टिविस्ट” रूप की विशेष प्रशंसा की, विशेषतः आत्मकथा के तीसरे भाग में। उन्होंने कहा कि यह कृति पाठकों को हिंदू समाज की संरचना पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती है। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में सुशीला जी की तीन कविताओं—“गाली”, “कुत्ता” और एक विद्रोही स्त्री कविता—का पाठ किया, जिनमें दलित स्त्री की पीड़ा, प्रतिरोध और ज्वालामुखी जैसी ऊर्जा का सशक्त चित्रण मिलता है।

बी. मंगलम ने दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र पर विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि पारंपरिक सौंदर्य की अवधारणाओं को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में उन्होंने प्रेमचंद के कथन— “हमें सौंदर्य की कसौटी को बदलना होगा”—का उल्लेख किया। उन्होंने कौशल्या बैसंत्री की कृति “अभिशाप” तथा कांचा इलैया की पुस्तक “ह्वाइ आइ एम नाट अ हिन्दू” का उल्लेख करते हुए दलित विमर्श की व्यापकता को रेखांकित किया। साथ ही, प्रभा खेतान की कृति के साथ “शिकंजे का दर्द” की तुलना करते हुए उन्होंने स्त्री अनुभवों की विविधता को उजागर किया।

कार्यक्रम के तीसरे मुख्य वक्ता प्रो. राजकुमार(अंग्रेज़ी विभाग) ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वे दलित साहित्य के अनुवाद तथा उत्तर-उपनिवेशिक अध्ययन के क्षेत्र में कार्यरत हैं और उड़िया से अंग्रेज़ी में अनुवाद कार्य कर चुके हैं। राजकुमार जी ने दलित साहित्य के अनुवाद की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि इसके अनुवाद से दलित साहित्य की भागीदारी वैश्विक स्तर पर बढ़ेगी।

डॉ. राजकुमार जी ने ‘शिकंजे का दर्द’ के अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए डॉ. प्रीति गुप्ता दीवान का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे इस कृति का वैश्विक विस्तार संभव हो पायेगा। आत्मकथा के इतिहास का उल्लेख करते हुए बनारसी दास की ‘अर्धकथानक’ (1640) तथा प्रथम महिला आत्मकथा ‘आमार जीबन’ जो राससुंदरी देवी द्वारा 1876 में लिखा गया दोनों के बीच के अंतर इतना अंतर कैसे आया, इसको समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि दलित स्त्री के लिए आत्मकथा लिखना ‘डबल सफरिंग’ है, क्योंकि यह अपने अनुभवों को पुनः जीने जैसा होता है।

प्रो. राजकुमार ने आत्मकथा को ड्रीम, पे’न, सफरिंग, असपिरेशन और होप के समुच्चय के रूप में व्याख्यायित किया। उनके अनुसार सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उनके सामुदायिक अनुभवों का दस्तावेज़ है। राजकुमार जी कहते हैं कि, शिकंजे के दर्द पुस्तक में फुले और आंबेडकर के विचार एवं संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘ह्यूमैनिटी’ और ‘इक्वालिटी’ के आदर्श प्रतिध्वनित होते हैं। उन्होंने दलित पैंथर्स आन्दोलन का जिक्र किया जो, 1972 में महाराष्ट्र में स्थापित एक क्रांतिकारी दलित युवा आंदोलन था। जो जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ सीधे संघर्ष के लिए जाना गया।

नामदेव ढसाल और जे. वी. पवार द्वारा स्थापित, यह संगठन अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आंदोलन से प्रेरित था और इसने जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए उग्र (मिलिटेंट) रास्ता अपनाया। यह आंदोलन दलितों के लिए न्याय और आत्म-सम्मान का प्रतीक बना। राजकुमार जी कहते हैं कि मार्जिनलाइज कम्युनिटी में दलित पैट्रियार्की नही मिलती। यहाँ कास्ट अनटचैबिलिटी, पैट्रियार्की ब्राह्मण पितृसत्ता से आती है। महाराष्ट्र की लेखिका बेबी ताई काम्बले की 1986 में प्रकाशित पुस्तक मराठी आत्मकथा ‘जीवन अमुची’ (जीवन हमारा’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह दलित पैट्रियार्की सिमिलर पैटर्न में चली आ रही है।

यह कार्यक्रम डॉ. विनीता अग्रवाल की स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ-साथ हिंदी साहित्य में आत्मकथा-विधा और दलित स्त्री लेखन के महत्व को रेखांकित करने में अत्यंत सफल रहा। विविध वक्ताओं के विचारों ने इस विमर्श को बहुआयामी बनाया और यह सिद्ध किया कि साहित्य, सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावी माध्यम है। यह कार्यक्रम न केवल डॉ. विनीता अग्रवाल की स्मृति को समर्पित एक सार्थक साहित्यिक आयोजन रहा, बल्कि इसने आत्मकथा-विधा, दलित स्त्री लेखन, सामाजिक न्याय और वैचारिक विमर्श के अनेक आयामों को एक मंच पर प्रस्तुत किया। समग्र रूप से, “शिकंजे का दर्द” के बहाने समकालीन सामाजिक यथार्थ, जातिगत एवं लैंगिक असमानताओं तथा उनके दुष्परिणामों पर गंभीर चर्चा हुई। यह स्पष्ट हुआ कि दलित स्त्री आत्मकथाएँ न केवल व्यक्तिगत अनुभवों का विवरण प्रस्तुत करती हैं, बल्कि वे समाज के उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को और अधिक सशक्त रूप से सामने लाती हैं।

सुशीला टाकभोरे को हाल ही में 20 दिसम्बर को बाँदा में प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रो. संजीव जी ने कहा कि सुशीला टाकभौरे को समझने के लिए वर्ग, जाति और जेंडर के अंतर्संबंधों को समझना अनिवार्य है। उन्होंने उनकी आत्मकथा को सामाजिक यथार्थ का प्रामाणिक दस्तावेज़ बताया।

यह कार्यक्रम साहित्य, समाज और संवेदना के त्रिवेणी संगम के रूप में उभरकर सामने आया। इसने यह स्थापित किया कि आत्मकथा केवल व्यक्तिगत जीवन की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, संघर्षों और परिवर्तन की प्रक्रिया का सशक्त दस्तावेज़ है। विशेषतः दलित स्त्री आत्मकथाएँ समाज के उन पहलुओं को उजागर करती हैं, जो लंबे समय तक उपेक्षित रहे हैं और यही इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

कार्यक्रम में विभिन्न विद्वानों, अनुवादकों और शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने इसे एक जीवंत वैचारिक मंच में परिवर्तित कर दिया। सम्पूर्ण कार्यक्रम के दौरान हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं के अतिरिक्त रीता जी (डॉ. विनीता अग्रवाल की बहन), प्रो.. मीना शर्मा (पीजीडीएवी कॉलेज), प्रो. ललित मोहन, प्रो. संजीव कुमार, श्री विभास वर्मा, प्रो. सुरभि ढींगरा, डॉ. पुरुषोत्तम, प्रो. छोटू राम मीणा, डॉ. राकेश कुमार सिंह, डॉ. नविता, डॉ. प्रेम प्रकाश शर्मा, डॉ. सीमा कुमारी, शरीना जोशी, डॉ. श्रवणकुमार गुप्त, डाॅ. कल्पना शर्मा, डॉ. शिव दत्त, डॉ. भारती अग्रवाल, डॉ. गीतांजलि सिंह तथा हिंदी विभाग के साथ अन्य विभागों के स्थायी और अस्थायी अध्यापकों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

अंत में, हिंदी विभाग के प्रभारी प्रोफेसर अनुज कुमार रावत द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया। उन्होंने सभी वक्ताओं, आयोजकों एवं सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस स्मृति-परंपरा को भविष्य में भी निरंतर बनाए रखने की कामना की।

 

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