सिनेमा
समाज के खोखले आदर्शों, नैतिक दुविधाओं को बयां करती ‘पार्टी’
बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति
1984 में रिलीज फिल्म ‘पार्टी’ गोविन्द निहलानी ने निर्देशित की है. गोविन्द निहलानी ने अपने करियर की शुरुआत श्याम बेनेगल की फिल्मों में कैमरामैन के रूप में की थी फिर आगे चलकर वे फिल्म निर्देशक बने और कई शानदार फ़िल्में बनायीं। वे श्याम बेनेगल स्कूल से निकले बेहद प्रतिभाशाली निर्देशक थे और फिल्मों के ट्रीटमेंट में श्याम बेनेगल से एक मसले पर अलग थे, वो ये कि श्याम बेनेगल की फिल्मों में सामाजिक मसले हीरो के माध्यम से उठाये जाते हैं; जबकि गोविन्द निहलानी ने हीरो के व्यक्तिगत संघर्ष, दुविधा, अस्तित्व से जुड़े संकट पर जोर दिया और उन प्रश्नों के माध्यम से समाज को चित्रित किया।
पार्टी फिल्म भी कुछ किरदारों के माध्यम से समाज और उनके खोखले आदर्शों और उनकी नैतिक दुविधाओं को चित्रित करने की कोशिश है। एक पार्टी रखी गयी है जिसे रखा है दमयंती राणे नामक सोशलाइट ने। दिवाकर बर्वे एक दिग्गज नाटककार हैं जिन्हें राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला है। इस पार्टी में कई लोग हैं, और इन लोगों के बीच बहस में बार बार एक नाम आता है, अमृत। अमृत एक बेहद प्रतिभाशाली कवि है जो महाराष्ट्र के जंगलों में आदिवासियों के हक़ की लड़ाई लड़ने चला गया है। पूरी फिल्म में वो उपस्थित होता है अपनी कविताओं के माध्यम से और उसके बारे में होती चर्चाओं में। वो परदे पर नहीं दीखता कभी, पर इस पार्टी पर हावी है।
दिवाकर बर्वे की पत्नी है जो स्टेज पर एक्ट्रेस रह चुकी है और अब वो रिश्ते में घुटन महसूस कर रही है। बर्वे भी उससे उतना भी ऊबा हुआ है। अभिनय का रास्ता बंद है उसकी पत्नी के लिए और वो बेहद फ़्रस्ट्रेटेड है। बर्वे उससे अब नफ़रत करने की हद तक भाव रखता है।
वहीं स्टेज का स्टार रवि है जो मोहिनी पर डोरे डाल रहा है। सोशलाइट का पति नहीं है और अब उसका पार्टनर है जिसे डॉक्टर कहके सब बुलाते हैं। सोशलाइट दमयंती राणे की बेटी जो अमृत से प्रेम करती है और अभी एक बच्चे की माँ है, अपनी सोशलाइट माँ से नफरत करती है। वो अपने पिता की मौत के लिए अपनी माँ को जिम्मेवार ठहराती है और अपनी माँ को पैरासाइट कहती है जो इन तथाकथित क्रिएटिव लोगों की संगत में अपने जीवन का मकसद ढूंढ रही है।
एक युवा कवि और नाटककार है भरत, जो अमृत से बेहद प्रभावित है और अपनी प्रतिभा को उसके सामने कमतर मानता है। एक उसकी फैन है जब उसे पार्टी में एक मेहमान अगाशे ने अधेड़ उम्र का कह दिया, तो वो इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाती है और अपने व्यक्तित्व और यौवन की तस्दीक़ के लिए भरत के साथ फ़्लर्ट करने लगती है, जिस भरत को अभी थोड़ी देर पहले वो दुत्कार रही थी।
दमयंती राणे नाटककार बर्वे से पूछती है, इस ऊंचाई पर तुम्हे कैसा लग रहा है? तब वो अपने अंदर झाँकने पर खुद को विवश पाता है, यहाँ बेहद अकेलापन है और डर भी है यहाँ से आगे क्या? शायद अब पतन ही है। बातचीत के दौरान बर्वे स्वीकार करता है कि जिस बुलंदी पर आज वो है, पिछले बीस सालों से, उसमें उसकी प्रतिभा का कम और साहित्यिक कुचक्रों का ज्यादा हाथ है जिसमें पावर ब्रोकर के रूप में दमयंती ने भी उसका साथ दिया है।
बर्वे कुछ आइडियाज स्टेज एक्टर रवि के साथ डिसकस कर रहा है; पर रवि भी इतना खोखला है; वो सेल्फ इम्पोर्टेंस से भरा इंसान जिससे देर तक बात नहीं की जा सकती।
भरत की चाह है एक डेलीगेशन का हिस्सा होना जो अमेरिका जा रहा है। सब अपनी अपनी इच्छाओं के विषय में सोच रहे हैं और लेखन उन इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम लग रहा है जो जनता से उनकी समस्याओं से जुड़ा नहीं लग रहा है।
पार्टी में पत्रकार अविनाश आता है अमृत का समाचार लेकर। वो एक बहस छेड़ देता है जो मूलतः साहित्यकार के राजनीतिक कमिटमेंट बनाम कलावाद पर है। एक साहित्यकार की पॉलिटिक्स स्पष्ट होनी चाहिए, ये अविनाश की राय है जैसा कि अमृत में दिखता है जबकि कुछ इससे सहमत नहीं होते।
भरत कहता है वो दो स्तरों पर जी सकता है, एक व्यक्ति के स्तर पर और दूसरा साहित्यकार के स्तर पर। पर जब एक को चुनना पड़े, तो वो कहाँ खड़ा होगा, इस पर भरत लाजवाब है।
तभी फ़ोन की घंटी बजती है। अविनाश फ़ोन उठाता है। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद वो समाचार देता है कि अमृत की हत्या हो गयी है, और कुछ आदिवासियों को इसके लिए आरोपित किया गया है, जबकि वहां का स्थानीय नेता इसके लिए जिम्मेवार है।
अंतिम दृश्यों में बर्वे और भरत दोनों के सामने अमृत का भयावह खून से लथपथ चेहरा दिखता है और वे पसीने पसीने हैं मानो वो उन्हें आईना दिखा रहा है उनके लेखन और उनके पोलिटिकल कमिटमेंट के बीच गैप पर।
फिल्म चूँकि एक सेट पर चली है तो कई जगह बहसें दिखाई गयी हैं और कई जगह संवाद के सहारे रिश्तों, उलझनों, और उनके नैतिक खोखलेपन और उनकी असुरक्षाओं को दिखाया गया है। फिल्म में गीत संगीत के लिए जगह नहीं थी। शुक्र है गोविन्द निहलानी बेवजह गीत संगीत के चक्र में नहीं फंसे।
फिल्म का सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या एक कलाकार को राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध होना चाहिए? अमृत के जीवन और लेखन में कोई अंतर नहीं है जबकि बर्वे और भरत के लेखन और जीवन अलग-अलग खांचों में बंधे है। यही अलग अलग खांचों में लेखन और जीवन अंत में उन्हें भय के रूप में दिखाई देता है। इस लिहाज से पार्टी एक नैतिक अदालत में तब्दील हो जाती है जहाँ हर पात्र जाने अनजाने खुद को कटघरे में खड़ा पाता है।
एक अच्छी फिल्म बन पड़ी है। वैचारिक फिल्म है। देखनी चाहिए।
बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति के फेसबुक वॉल से साभार
