कविता
एक ही आग
अनुपम शर्मा
समाज की देहरी पर
दो परछाइयाँ साथ खड़ी हैं —
एक दलित,
एक स्त्री।
नाम अलग-अलग,
पीड़ा का इतिहास एक।
घावों की भाषा भिन्न सही,
पर रक्त का रंग एक।
कभी जाति की दीवारों में चुन दी जाती हैं,
कभी लाज की चादर में बुन दी जाती हैं।
कभी धर्म की दुहाई देकर
उनकी आवाज़ दबाई जाती है,
कभी रिवाज़ों की राख तले
उनकी साँसें जलाई जाती हैं।
चौराहों पर अपमान की धूप
दोनों को बराबर झुलसाती है,
और सत्ता की ठंडी छाया
हमेशा उनसे कतराती है।
एक को कहा जाता है “अछूत”,
दूजी को “परायी” बताकर बाँट दिया जाता है।
दोनों के हिस्से में
निर्णयों की नहीं,
निर्देशों की दुनिया आती है।
पर सुनो—
अब राख से अंगारे उठ रहे हैं।
जो सरेआम जलाए गए थे,
वही अब मशाल बन रहे हैं।
दलित की चेतना,
स्त्री की अस्मिता—
जब हाथ मिलाएँगी,
तो इतिहास की कठोर ज़मीन पर
बराबरी का पहला बीज
दृढ़ता से उग आएगा।
क्योंकि
जो सबसे अधिक कुचले गए हैं,
वही सबसे अधिक उगने की ताक़त रखते हैं।
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