नितिन उपमन्यु  की  कविता –  नफ़रत के सौदागर

युद्ध के विरुद्ध युद्ध-22

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है नितिन उपमन्यु की  एक और कविता – नफ़रत के सौदागर । संपादक

 

कविता

नफ़रत के सौदागर

नितिन उपमन्यु

 

सुनो! नफ़रत के सौदागरो

कान खोलकर सुनो

हवा-पानी में जो घोला है ज़हर तुमने

इक दिन तुम्हारे ही बच्चों का दम घोंटेगा

उस दिन कुछ नहीं होगा तुम्हारे पास

सिवा इस नफ़रत के, वहशत के

वह दिन बहुत भयानक होगा

तुम घुटनों के बल झुक कर

रहम की भीख मांग रहे होंगे

और काल तुम्हें लौटा रहा होगा

तुम्हारी ही फैलाई नफ़रत

वह दिन बहुत भयानक होगा

सुनो! नफ़रत के सौदागरो

कान खोलकर सुनो।।

 

 

One thought on “नितिन उपमन्यु  की  कविता –  नफ़रत के सौदागर”

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