ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – प्रवासी मजदूर

कविता

प्रवासी मजदूर

ओमसिंह अशफ़ाक

 

हमको तो कुछ समझ ना आये

कैसे करम लिखें हैं विधाता !

हमरे हिस्से दमड़ी-पाई

उनकू दो लम्बर को खाता !

 

मालिक ओढ़ें शाल-दुशाले

हम ठंड में गरमायें काँखे !

उनकी है सोने की एनक

बबुआ की मटमैली आँखें !

 

गिटपिट कर बतियाएं मालिक

टिलफुनवा पे बात करें !

दस आखर लिखवायें पाती में

हम पे सौ एहसान धरें !

 

आटा-चावल शक्कर तेल यहाँ

किसी चीज की किल्लत ना है !

सभी ठाठ हैं एई मुल्क में

पर हम पे तो पैसा ना है !

 

बीमार पड़े थे जा दिन बिटवा

हम का कम परेशान भये थे !

डाक्टर मांगा तीस रुपइया

हम तो वहाँ हैरान खड़े थे !

 

साठ व्यंजन साहूकार के

अपनी रोटी बिन तरकारी !

बबुआ को कैसे समझाऊँ

क्या है ससुरी ये लाचारी !

(1993 में )

One thought on “ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – प्रवासी मजदूर

  1. असमानता का चित्रण करता मार्मिक भावपूर्ण गीत

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