दिल्ली का संडे बुक बाजार
संजय श्रीवास्तव
पिछले संडे दिल्ली के चर्चित रविवारीय पुस्तक बाजार यानि दिल्ली संडे बुक मार्केट गया. राजघाट की ओर से अगर जा रहे हैं तो करीब सामने ही। उस दिन पुरानी दिल्ली का दरियागंज का रोजाना खुलने वाला बाजार बंद रहता है. जाने से पहले उधेड़बुन थी कि पार्किंग कहां करेंगे, वहां तो बहुत ट्रैफिक होता होगा. लेकिन पार्किंग आराम से हुई. एक तो दरियागंज के शुरू में ही है. दूसरी पार्किंग नगर निगम की है इस बुक बाजार के बिल्कुल बगल में.
अब ये दरियागंज के महिला हाट में संडे के दिन लगता है. 300-400 या उससे ज्यादा वेंडर्स आते हैं. जिधर देखो उधर किताब ही किताब बिखरी होती हैं. यहां सस्ती कीमत में ऐसी किताबें मिल जाती हैं, जो बहुत दुर्लभ हैं. भीड़ तो खूब होती है. ज्यादातर युवा बच्चे आते हैं, उसमें कॉलेज गर्ल ज्यादा. खुशी की बात है कि उनकी संख्या ज्यादा होने लगी है. युवा आमतौर पर कोर्स के साथ कंपटीशन की किताबें खरीदने आते हैं. दूसरे टेस्ट वाले भी आते हैं, यहां हरेक की दिलचस्पी किताबें मिल जाती हैं.

मार्केट खरीदारों से अटा रहता है. हजारों की संख्या में लोग. मैने कन्हैया लाल माणिक मुंशी की दो दुर्लभ किताबें खरीदीं. एक – “सोमनाथ द श्राइन इटरनल” और दूसरी संस्मरणों की उनकी किताब – “सिटी ऑफ पैराडाइज”. बेटे ने दर्शन की दो किताबें लीं- लेखक महर्षि अरविंद और ओशो.
मैं नोएडा में वर्ष 2003 में आया. अब 23 साल बाद इस संडे बुक बाजार में जा पाया. शायद बेटे की ही वजह से, क्योंकि उसको तो जाना ही था. अपन भी लटक लिये. पढ़ने में उसकी दिलचस्पी ज्यादा है. कहना चाहिए कि दिल्ली का संडे बुक बाजार एक लिविंग कल्चर है. अगर ये कुछ व्यवस्थित हो जाए तो और बढ़िया हो जाएगा. किताबों के लिए उमड़ी बड़ी तादाद भी देखकर अच्छा लगा. कहा जाता है कि इस मार्केट में हर कोई कभी ना कभी जरूर आता है, चाहे नेता हो या अफसर या पत्रकार या फिर लिखने पढ़ने वाले लोग. ये जगह सभी को कभी ना कभी बुलाती ही है.

30 सालों से यहां हर संडे आकर किताब बेचने वाले अधेड़ प्रिंसराज तिवारी से किताब खरीदी तो हल्की बातचीत भी हो गई. वैसे उनका नाम तो गजब का है ना. बनारस के रहने वाले हैं.अब गाजियाबाद में रहते हैं. हर संडे यहां किताबों का स्टाल लगाने जरूर पहुंचते हैं. कहते हैं देखिए ये बाजार तो खास है. हम सभी वेंडर यहां हर संडे में स्टाल लगाने की फीस 300 रुपए देते हैं लेकिन जरा देख लीजिए कितनी गंदगी है, सफाई होती ही नहीं. वाकई किताबों के बीच गंदगी और कीचड़ का आलम था. मार्च के आखिर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण हुई बारिश ने गंदगी को ज्यादा बढ़ा दिया था. काश हमारे निकाय किताबों के इस तीर्थ की हालत कुछ बेहतर रख पाते. देश में सिस्टम की भारी समस्या है. जिम्मेदार हम भी हैं और सिस्टम चलाने वाले भी.
ये बाजार असल में फ्लोटिंग मार्केट है. कुछ साल पहले सड़क पर लगता था. फिर कुछ समय बंद कर दिया गया. अब फिर लगने लगा है. संडे के दिन यहां किताबें लगाने वाला वेंडर 3000 रुपए से 10,000 रुपए तक की कमाई कर लेता है. एक अनुमान के अनुसार यहां हर संडे 10 लाख से 30 लाख रुपए का किताबों को बेचने का कारोबार होता है. 10,000 से 50,000 किताबें बिक जाती हैं.
ज्यादातर किताबें पुरानी, लाइब्रेरी से निकली, छात्रों द्वारा बेची गई और पब्लिशर्स के यहां भेजी गईं ओवरस्टॉक होती हैं. दुनियाभर में कई फेमस बुक स्ट्रीट्स हैं. हमारे देश में भी कोलकाता और मुंबई में हैं लेकिन वो स्थायी हैं, हर दिन एक ही जगह लगते हैं. दिल्ली का संडे बुक बाजार अलग है. वैविध्य भरा भी. काश इसे थोड़ा और व्यवस्थित किया जा पाता.
