राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

1.

कुछ और होना हो गया

कुछ और होना हो गया

जो था होना वह तो हुआ ही नहीं

दीवार में गहरा सुराख़ होना था वांछित

जिसमें रखी जाती,भरी जाती बारूद

और बुनियाद में था होना महाविस्फोट

सुराख़ तो हुआ नहीं तनिक-सा भी कहीं

महाविस्फोट भी कहीं भी दिया नहीं दिखाई

दरारें हो गईं पर्याप्त से अन्यथा अनंत तक

था सोचा कि थोड़ा सरल होगा जीवन

मगर दिन-ब-दिन बढ़ती गईं मुश्किलें

था चाहा कि थोड़ी ताज़ा मिलेंगी हवाऍं

मगर दिन-ब-दिन बढ़ती गईं मोटरगाड़ियाँ

जलाई जाने लगीं जॅंगल में झोपड़ियाँ

घर-घर में भरता गया,बढ़ता गया धुऑं

कम से कम और कमतर होने लगा प्रेम

रोटियाॅं चार मिलें,चार ही सही,हर्ज़ नहीं

मगर हो बॅंटवारा बराबर-बराबर,है ज़रुरी

नहीं हो,ऐसा नहीं हो बार-बार जैसा ही कुछ

कि हो फिर-फिर वही,फिर-फिर हो वैसा ही

होता रहे निर्णय,तरसता रहे न्याय ?

________

 2.

समूचे दृश्य के अदृश्य में

समूचे दृश्य के अदृश्य में

सभी उपकरण ले लिए शब्दकोष ने

घातक होता है शेर वह,जो होता है घायल

घायल के हर ज़ख़्म से टपकता है ख़ून

और टपकते हर ख़ून का रॅंग एक,रॅंगत एक

मुनासिब करूँ कैसे,जिसका नहीं पक्षधर मैं

कारण बनूँ कैसे,मौत नहीं रिश्तेदार मेरो

ढ़लान की ओर तो यूँ ही बह जाता है पानी

पसीना बहाना होता है कि सिर चढ़कर बोले

कि बिन पानी सूना है बेकार है संसार सारा

ताप है कि बढ़ता ही जा रहा है हद-बेहद

बर्दाश्त करने की हद भी होती है ख़त्म

विजेता-हथियारों पर भी बरसता है पानी

वक़्त की मार बड़ी हो जाती है एक दिन

शिथिलता से बड़ी हार नहीं,कायरता नहीं

कुछ किया नहीं जीवनभर तो जीवन क्या

समूचे दृश्य के अदृश्य में.

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