दयाल जास्ट की कविता – कविता करती है काम

कविता

कविता करती है काम

         दयाल जास्ट

 

कविता करती है

हर दौर में अपना काम

जो समझ में आता है

बहुत दिनों के बाद।

 

इसके घर में

सबके लिये जगह है

दीया-बाती है

रसोई है

पूजा करने का सामान भी।

 

वह हवा की तरह हवा

पानी की तरह पानी

धूप की तरह धूप

मिट्टी की तरह मिट्टी

फसल की तरह फसल

बाजार की तरह बाजार

जीवन की तरह जीवन

वीर की तरह वीर

दुश्मन की तरह दुश्मन

युद्ध की तरह युद्ध

श्मशान की तरह श्मशान

वह सब की तरह है

 

वह उगती है सूरज जैसे

अस्त होती है चांद जैसे

वह झूठ-फरेब से दूर

छबि-प्रेम के बहुत नजदीक।

 

यह आदमी आदमी में फर्क नहीं करती

आदमी इसमें फर्क कर देता है चालाकी से।

 

कविता अब भी उतनी ही बची है

जितनी पृथ्वी बची है

पृथ्वी न बचने के बाद भी कविता बची है।

 

कविता करती है काम

हर रंग में

हर दल बल में

हर शोर में

हर दौर में

क्या कविता

आज भी करती है वैसे ही

जैसे पहले करती थी काम..?

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