युद्ध के विरुद्ध युद्ध – 4
युद्ध तो अपने आप में एक मसला है, वह मसलों का हल क्या देगा- (साहिर लुधियानवी)
कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।
प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। इस कड़ी में हमने ओमसिंह अशफ़ाक की कविताएं प्रकाशित की हैं। आज प्रस्तुत है जयपाल की कविता।
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संपादक
कविता
लोकतंत्र की स्थापना
जयपाल
घेर लो किसी भी देश को
बरसा दो बम
कर दो नेस्तनाबूद
आतंकवादी घोषित कर दो
फहरा दो विजय पताका
सीमाओं को सील कर दो
बिजली-पानी काट दो
राशन की सप्लाई बंद कर दो
राहत सामग्री के ट्रक तैयार रखो
राख कर दो हस्पतालों को
आदमी के चिथड़े उड़ा दो
भेज दो एंबुलेंस की गाड़ियां
दवाईयों के जहाज रवाना कर दो
बच्चों पर बम बरसा दो
स्कूलों को मलबे में बदल डालो
शिक्षा के लिए बजट जारी कर दो
बचे खुचे लोगों को कहो
वे भाग जाएं जहां तक भाग सकते हैं
जहां जहां वे जाएं
वहां वहां स्थापित करो शरणार्थी कैंप
विस्थापितों को शरण दो
अरे ओ ! दुनिया के महान देशो !
जला डालो इंसानियत का इतिहास
पूंजी का इतिहास रच दो
फोड़ दो सबकी आंखें
काट डालो सबकी जुबां
जड़ दो बंदिशें हवाओं पर
टैंकों पर लोकतंत्र लिख दो

बहुत खूब सर।
युद्ध का चित्र खींचते हुए एक विश्वसनीय कविता जो युद्ध के साथ लुटेरी-पूंजी का संबंध भी उद्घाटित करती है। किस तरह से जंगखोर देशों के नेता लोगों के आशियाने बर्बाद करते हैं, उनको विस्थापित हो जाने पर मजबूर करते हैं और फिर उनके लिए राहत शिविर खोलने, शरणार्थी कैंप लगाने और गजा़ की तरह फिर से बसाने का नाटक भी किया जाता है?