सक्रिय राजनीति से सम्मानजनक पार्किंग की व्यवस्था

बात बेबात

सक्रिय राजनीति से सम्मानजनक पार्किंग की व्यवस्था

 

विजय शंकर पांडेय

वैसे हाल ही में आंध्र प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्री और मुख्यमंत्री के बेटे नारा लोकेश ने मजाकिया अंदाज में ही सही, हैरतअंगेज खुलासा किया था। पिछले दिनों Ideas of India Summit 2026 में नारा लोकेश ने भागीदारी की थी।

मीडिया से बातचीत के दौरान उनका कहना था कि वे अपने पिता के स्थान पर मुख्यमंत्री बन सकते हैं। साथ ही केंद्र में उनके पिता कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय का जिम्मा संभाल सकते हैं।

उधर, नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का ऐलान किया है, और उधर जेडीयू ने बीजेपी से बिहार का गृह मंत्रालय वापस मांग लिया है। मतलब जाते-जाते घर की चाबी भी चाहिए!

राजनीति के जानकार बता रहे हैं कि यह वैसा ही है जैसे कोई किरायेदार मकान छोड़ते वक्त मकान मालिक से कहे—“चाबी तो दे दी, पर किचन का कंट्रोल हमारे पास ही रहेगा।” बीजेपी सोच में है कि यह विदाई है या एडवांस बुकिंग। उधर जेडीयू के नेता समझा रहे हैं—“नेता जी जा रहे हैं, पर व्यवस्था यहीं से चलेगी।”

आंध्रप्रदेश और बिहार की राजनीति में अब नया ट्रेंड है—पावर भी चाहिए और ट्रांसफर भी! उधर दिल्ली चाहती है कि रैपर भले समाजवाद का रहे, फ्लेवर भाजपा का हो। यह उपकार भी कम नहीं है कि भाजपा नीतीश को राज्यसभा भिजवाने पर राजी हो गई। अन्यथा मार्गदर्शक मंडल भी भिजवा सकती थी। आप इसे सक्रिय राजनीति से सम्मानजनक पार्किंग की व्यवस्था भी मान सकते हैं।

उधर, नीतीश के ज्यादातर सिपहसालार अरसे से इस दिन का बाट जोह रहे थे। अब सवाल उठ रहा है—क्या बिहार में समाजवादी राजनीति खत्म हो गई? नहीं भाई, खत्म कहाँ हुई है… बस अब वह “आइडियोलॉजी” “एडजस्टमेंट पॉलिसी” बन गई है। कुछ लोगों को गवर्नरी भी थमाई जा सकती है।

बिहार की राजनीति में फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि कौन किसे ढो रहा था या है— बीजेपी नीतीश को या नीतीश बीजेपी को? जनता बस यही सोच रही है कि इस राजनीतिक ट्रक का असली ड्राइवर कौन है?

आरजेडी सांसद मनोज झा ने तो इस पूरे घटनाक्रम को वेनेजुएला के राष्ट्रपति की किडनैपिंग से जोड़ दिया। मतलब यह कि नीतीश कुमार मानो किसी राजनीतिक वैन में बैठे हैं, जहां ड्राइवर बार-बार रास्ता बदल देता है और यात्री को खुद भी पता नहीं चलता कि वे जा कहां रहे हैं?

बीजेपी की हालत भी कम दिलचस्प नहीं है। वह ऐसे मुस्कुरा रही है जैसे बारात में फूफा…। न चाहते हुए भी बतीशी निपोरने की लाचारी।

उधर, नीतीश जी भी अनुभवी यात्री हैं। उन्हें मालूम है कि राजनीति में सीट बेल्ट से ज्यादा जरूरी है “सीट” बचाना। इसलिए वे कभी इस गाड़ी में, कभी उस गाड़ी में बैठ जाते हैं। अब असली सवाल वही है—बीजेपी नीतीश को कब तक झेलेगी?

 

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