आज (27 फरवरी) चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि है चन्द्रशेखर आजाद के जीवन पर मलवेंदर जीत सिंह वढ़ैच और राजवंती मान ने “चन्द्रशेखर आजाद- विवेकशील क्रान्तिकारी” नाम से एक पुस्तक लिखी है। उस पुस्तक का अंश ‘नया दल’ नाम का अध्याय यहां पर दिया जा रहा है। देश की आजादी का मकसद पूरा करने के लिए क्रांतिकारियों ने कैसे मिलकर एक दल का गठन किया और आजादी का फायदा आम जनता को मिल सके इसके लिए उसके नाम में समाजवादी शब्द जोड़ा। इसके लिए पुस्तक के लेखक द्वय मलवेंदर जीत सिंह वढ़ैच और राजवंती मान और राजकमल प्रकाशन का आभार व्यक्त करते हैं।
चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर विशेष
नया दल
अनेक कठिनाइयों के बावजूद आजाद अपने लक्ष्य को एक क्षण के लिए भी न भूले। दल के संगठन की चिंता उन्हें हर समय रहती थी। धीरे-धीरे बिखरे हुए सदस्य फिर एक दूसरे के संपर्क में गए और तब संगठन को एक व्यवस्थित रूप देने का निश्चय किया गया। इसके लिए विजय कुमार सिन्हा, राजकुमार सिन्हा के छोटे भाई थे, जो काकोरी षड्यंत्र के मुकदमे में अभइयुक्त थे। विजय कुमार अनेक अंग्रेज पत्रों के संवाददाता भी थे और काकोरी षड्यंत्र के मुकदमे की कार्रवाई के संवाद भेजते थे। वे कई युवक संगठनों तथा रामकृष्ण मिशन में भी कार्य करते थे। वे प्रताप के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में भी थे।
गणेश शंकप विद्यार्थी कानपुर में ही नहीं समस्त उत्तर प्रदेश में नवयुवकों के चेतना स्रोत रहे हैं। आजाद का गणेश शंकर विद्यार्थी से उनकी शहादत तक घनिष्ठ संपर्क रहा। पुलिस यह जानती थी कि गणेश जी का संबंध क्रांतिकारियों से है। वे भी पुलिस के पूछने पर इनकार नहीं करते थे, पर साथ ही यह भी कहते थे कि ‘मैं उनसे मिलने नहीं जाता, वे मेरे पास आते हें तो मैं उन्हें कैसे रोक सकता हूं। मैं तो राजनीतिक व्यक्ति हूं। मेरे द्वार सबके लिए खुले हैं।’ कानपुर के दल के महावीर, बटुकेश्वर दत्त, अजय घोष, पं. राम दुलारे त्रिवेदी, सुरेंद्र पांडे, ब्रह्मदत्त, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, डॉ गया प्रसाद, सद्गुरु दयाल अवस्थी, वीरभद्र तिवारी आदि भी विद्यार्थी जी से संबंधित थे।
कुंदनलाल गुप्त के कथनानुसार, विजय कुमार को दल के अनेक सदस्यों का पता तो चल गया; पर चंद्रशेखर आजाद का पता न चल सका। तब यह काम कुंदनलाल गुप्त को सौंपा गया। कुंदनलाल को यह पता चला था कि आजाद झांसी रह चके हैं सले वे न्हें ढूंढने झांसी आए। उनके अनुमान के अनुसार वे वहां उनको मिल गए। उन्होंने आजाद से मिलकर यह निश्चय कर लिया कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुलाया जाएगा। बाद में कानपुर की एक बैठक में कुंदनलाल गुत आजाद को ले गए।यहां पर उनकी भेंट सुखदेव और भगत सिंह से कराई गई। इसके पूर्व आजाद बमरौली बम कांड के समय भगत सिंह से मिल चुके थे। उस समय भगत सिंह दल में बलवंत के नाम से पुकारे जाते थे। कानपुर की बैठक में ही यह निश्य किया गया कि पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारी मिलकर काम करें।
कानपुर की बैठक में दल को फिर संगठित कर सुव्यवस्थित ढंग से चलाने का निश्चय किया गया। उत्तर प्रदेश में युवकों के संगठन तथा शस्त्र जुटाने के कार्य पर ही अधिक बल या जा रहा था। कालेजों तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में क्रांतिकारी संगठन जोरों पर था। गुप्त संगठन के साथ-साथ सदस्य ‘मजदूर सभा’ तथा ‘यूथ लीग’ आदि में भी कार्य करते थे।
भगत सिंह इससे पूर्व भी कानपुर में रह चुके थे। वे प्रताप के संपादकीय विभाग में काम कर चके थे। बाद में मां की बीमारी का समाचार पाकर वे वापस लाहौर चले गए थे। वहां उन्होंने ‘नौजवान भारत सभा’ का निर्माण किया। यह सभा क्रांतिकारी दल के खुले मंच के रूप में काम करती थी।
दिल्ली में बैठक
8-9 सितंबर 1928 को दिल्ली में क्रांतिकारी दल की बैठक हुई। इस बैठक में आजाद को भी जाना था, परंतु उनकी आंखों में तकलीफ होने के कारण वे इस बैठक में भाग लेने न जा सके। 8 सितंबर को सभी सदस्यों के न पहुंच सकने के कारण बैठक 9 सितंबर को हुई। आजाद की अनुपस्थिति में बैठक का संचालन भगत सिंह ने किया। इस बैठक में भगत सिंह, सुखदेव, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, सुरेंद्र पांडे, ब्रह्मदत्त मिश्र, कुन्दनलाल गुप्त, फणींद्र घोष मनमोहन बनर्जी आदि उपस्थित थे।
शिव वर्मा लिखते हैं-
भगत सिंह से पहले क्रांतिकारियों का कोई देशव्यापी संगठन न था। बंगाल में ‘अनुशीलन’, ‘युगांतर’ आदि संस्थाएं थीं, पंजाब में ‘किरती पार्टी’ थी, यूपी और बिहार में मुख्यतया ‘हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ’ काम करता था। शहीदों पर सबका समान अधिकार होते हुए भीउनमें आपसी सहयोग नहीं के बराबर रहता था। भगत सिंह सबको मिलाकर एक देशव्यापी संगठन कायम करना चाहता था। इसी उद्देश्य से सितंबर 1928 में उसने दिल्ली में सभी प्रांतों के प्रतिनिधि क्रांतिकारियों की एक मीटिंग का आयोजन किया जिसमें उत्तर प्रदेश (उस समय संयुक्त प्रांत), बिहार, पंजाब और राजस्थान से दस प्रतिनिधि शामिल हुए थे। बंगाल के अधिकांश क्रांतिकारी स समय जेल में थे। जो बाहर थे उनमें से जिनसे हमारा संपर्क हुआ वे हमारे समाजवादी विचारों और संगठन के जनवादी सुझावों से सहमत न थे। उन्होंने मीटिंग में भाग लेने से मना कर दिया था।
दिल्ली मीटिंग का नेतृत्व भगत सिंह ने ही किया और उसके सुझाव पर समाजवाद को दल का घोषित लक्ष्य स्वीकार कर उसका नाम बदलकर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ कर दिया गया।
मीटिंग का दूसरा महत्वपूर्ण फैसला था संगठन का जनवादीकरण। भगत सिंह किसी एक व्यक्ति को आन्दोलन का सर्वेसर्वा मानकर उसकी अच्छाइयों या बुराइयों पर सबकुछ छोड़ देने का विरोधी था। उसके सुझाव पर आन्दोलन के संचालन के लिए एक केंद्रीय कमेटी का गठन किया गया और नीति के प्रश्नों पर इस कमेटी को ही सर्वोपरि माना गया। इस मीटिंग में सुखदेव, फणीन्द्र घोष, कुन्दन लाल और शिव वर्मा क्रमशः पंजाब, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के संगठनकर्ता चुने गए और भगत सिंह और विजय कुमार सिन्हा को प्रचार और अन्तरप्रांतीय संपर्कों का भार सौंपा गया था। ये छह तथा आजाद को लेकर केन्द्रीय कमेटी का गठन किया गया था। मीटिंग में सुरेंद्रनाथ पांडे, ब्रह्मदत्त मिश्र और बिहार के मनमोहन बनर्जी भी सम्मिलित हुए थे।
दल के सेनापति को चुनने की भी परम्परा अपनाई गयी और आजाद हमारे प्रथम निर्वाचित सेनापति बने। मीटिंग में आजाद सम्मिलित नहीं हो पाए थे , लेकिन भगत सिंह और विजय कुमार सिन्हा ने पहले ही उनसे मिलकर सब बातों पर विचार-विमर्श कर लिया था और उन्होंने सभी सुझावों पर अपनी स्वीकृति दे दी थी।
इससे पूर्व क्रांतिकारियों की शक्ति का एक अच्छा-खासा भाग सरकारी गवाहों, मुखबिरों और गुप्तचर विभाग के अधिकारियों को मारने तथा धन जुटाने के लिए डकैतियां करने में समाप्त हो जाता था। इन कामों से जितना लाभ होता था उसके अनुपात से कहीं अधिक मूल्य हम चुका आते थे। दिल्ली में इस संबंध में भी एक निश्चित नीति अपनाई गई। हमने तय किया कि पैसे के लिए जहां तक संभव होगा हम सरकारी रुपये पर ही हाथ डालेंगे। ‘ऐक्शन्स’ भी ऐसे ही चुने जाएंगे जिनका जनता तथा देश की राजनीतिक समस्याओं से सीधा संपर्क हो। इन फैसलों के पीछे भी मुख्यतः भगत सिंह का ही हाथ था।
1928 का वर्ष राजनीतिक हलचलों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण वर्ष था। बड़े पैमाने पर मजदूरों की देशव्यापी हड़तालें चल रही थीं, पूंजीवाद के अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संकट की काली छाया भारत पर भी पड़ चुकी थी जिसके कारण किसान, मध्यम वर्ग तथा राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग भी परेशान थे।
इंग्लैंड के संकटग्रस्त पूंजीपतियों के कुछ राहत देने के विचार से भारत की अंग्रेज सरकार ने एक ओर रुपए की दर एक शीलिंग चार पेंस की जगह एक शीलिंग छह पैसे निर्धारित की और इस प्रकार अंग्रेज व्यापारियों तथा उद्योगपतियों ने देखते ही देखते लाखों पेंस का मुनाफा कमाने का इंतजाम कर दिया, दूसरी ओर भारतीय इस्पात उद्योग को प्राप्त संरक्षण हटाकर विलायती इस्पात के लिए रास्ता खोल दिया। इससे भारत का पूंजीपति वर्ग भी असंतुष्ट था। इस देशव्यापी असंतुष्ट के विरुद्ध मरहम-पट्टी के रूप में कुछ सुधारों का आश्वासन देकर अंग्रेजों ने एक साइमन कमीशन की घोषणा की। इस कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज थे। भारत की प्रायः सभी पार्टियों और दलों ने सौ प्रतिशत अंगेरेज कमीशन का विरोध किया। इसके बाद भी कमीशन आया। देश ने उसका बहिष्कार किया। जनता ने उसके खिलाफ हड़ताल की, ‘साइमन वापस जाओ’ के नारों के साथ काले झंडे दिखाये। अंग्रेज सरकार पर इसका कुछ प्रभाव न पड़ा और रदेश की इच्छा के विरुद्ध कमीशन हमारे सिर पर लाद दिया गया। यह हमारी भारतीयता का अपमान था।
हमने उत्तर भारत में साइमन कमीशन का पीछा करने का निश्चय किया और जब वह दिल्ली आया तो भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और जगदेव कपूर ने कमीशन के पास पहुंचने में दिल्ली की काफी धूल फांकी, लेकिन वे इसकी परछायीं तक न देख सके। उस समय हमारे साथियों के पास केवल रिवाल्वर और पिस्तौल ही थीं। दिल्ली के अनुभवों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सफलता के लिए बमों की व्यवस्था आवश्यक है।’
आजाद नए संगठन के ‘समाजवादी’ लक्ष्य से पहले चौंके अवश्य परन्तु चर्चा के पश्चात उन्होंने यह परिवर्तन स्वीकार कर लिया। वे यही सोचते थे कि रिपब्लिकन शासन व्यवस्था में समानाधिकार का अधिकार तो निहित होगा ही, परंतु चर्चा के बाद उन्हें यह समझते देर न लगी कि रिपब्लिकन शासन व्यवस्था में तो यह भी संभव है कि गोरी नौकरशाही के स्थान पर भारतीय नौकरशाही हो तथा पूंजीपति अपना प्रभुत्व स्थापित कर जनसाधारण का शोषण करता रहे। इसलिए जिस जनता की शक्ति पर स्वतंत्रता प्राप्त होगी उसे स्पष्ट शब्दों में विश्वास दिलाना अनुचित न होगा और यह विश्वास दल के नाम में समाजवादी शब्द जोड़कर ही दिलाया जा सकता है।
आजाद के समाजवाद की ओर आकर्षित होने का एक और भी कारण था। आजाद का जन्म एक बहुत ही निर्धन परिवार में हुआ था और साधनों के अभाव के चुभन को व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने अनुभव किया था। बचपन में भावरा तथा उसके इर्दगिर्द के आदिवासियों और किसानों के जीवन को भी नजदीक से देख चुके थे। बनारस जाने से पहले कुछ दिन बम्बई में मजदूरों के बीच भी रहे थे। इसीलिए जैसा कि वैशम्पायन ने लिखा है, किसानों तथा मजदूरों के हित की जब वे चर्चा करते तो उसमें उनकी अनुभूति की झलक अवश्य दिखाई देती थी।
आजाद ने 1952 में क्रांतिकारी दल में प्रवेश किया था। उसके बाद काकोरी कांड में फरार होने तक उन पर दल के नेता पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का काफी प्रभाव था। बिस्मिल आर्य समाजी थे और आजाद पर भी उस समय आर्य समाज की छाप थी। लेकिन बाद में जब दल ने समाजवाद को लक्ष्य के रूप में अपनाया और आजाद ने उसमें मजदूरों-किसानों के उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा पहचानी तो उन्हें नई विचारधारा को अपनाने में देर नहीं लगी।’
दल की केंद्रीय समिति बनाई गई । उसमें पंजाब से भगत सिंह तथा सुखदेव, उत्तर प्रदेश से विदय कुमार सिन्हा तथा शिव वर्मा, बिहार तथा उड़ीसा से फणींद्र घोष तथा राजपूताने से कुन्दनलाल गुप्त को लिया गया। विजय कुमार सिन्हा को विभिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों में तालमेल बनाए रखने के लिए नियुक्त किया गया। झांसी में दल का हेडक्वार्टर रखने का निश्चय किया गया।
प्रांतीय शाखाओं को एक्शन करने के अधिकार को छोड़कर सभी अधिकार दिए गए। साथ ही यह भी निश्चय किया गया कि हथियारों पर नियंत्रण केंद्र का होगा, प्रांतों में एक्शन के लिए हथियार दिए जाएंगे और काम हो जाने पर उन्हें वापस केंद्र को लौटा देना होगा। पैसे केंद्र के हाथ में होगा। धन के लिए आवश्यकता पड़ने पर एक्शन करना जरूरी समझा गया। अन्तिम निर्णय केंद्रीय समिति ही करेगी। दल के केंद्रीय सदस्यों के लिए घर छोड़ना अनिवार्य कर दिया गया।
प्रचार की कार्यप्रणाली को दृष्टि में रखकर ही पंजाब में दल ने ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की थी जो देश में पुर्ण स्वतंत्रता की मांग केसाथ मजदूर किसानों तथा बुद्धिजीवी वर्ग के अधिकारों, सामाजिक क्रांति, विदेशी शासन के अत्याचारों तथा 1857 के विद्रोह, कूका विद्रोह, गदर पार्टी, बब्बर अकाली आंदोलन, पंजाब सैनिक विद्रोह, खालसा आंदोलन एवं क्रांतिकारियों द्वारा किए गए आत्मबलिदानों का इतिहास युवकों के समक्ष रखा था। गदर पार्टी के मुख्य पत्र ‘किरती किसान’ में पुराने क्रांतिकारी डेनब्रोन की ‘ माई फाइट फार आयरिश फ्रीडम’ (My fight for Irish freedom) पुस्तक का हिंदी अनुवाद ‘ मेरा आईरिश स्वतंत्रता संग्राम’, बलवंत सिंह के नाम से प्रकाशित किया था। जब जब दल को ऐसे प्रचार का अवसर मिला उसने मौका हाथ से नहीं जाने दिया। कुंदनलाल गुप्त मार्च या अप्रैल1928 में दिल्ली गए थे। वहां उनकी विजय सिंह पथिक से भेंट हुई। उन्हीं से उन्हें ज्ञात हुआ कि ‘चांद’ के संपादक रामरखा सिंह सहगल‘चांद’ का विशेषांक‘फांसी अंक’ के शीर्षक से निकालना चाहते हैं। उसके लिए चतुरसेन शास्त्री से अनुरोध किया गया है कि वे उसका संपादन करें। दिल्ली की बैठक में इसकी भी चर्चा हुई और चतुरसेन शास्त्री से मिलकर ‘चांद’ के ‘फांसी अंक’ में भारत के प्रमुख क्रांतिकारियों के जीवन तथा बलिदान और क्रांतिकारी आंयोजन के संबंध में लेख छपवाने का निर्णय किया गया। इसका प्रमुख दायित्व शिव वर्मा को सौंपा गया। भगत सिंह ने इस अंक के लिए गदर पार्टी के वीरों तथा अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों के संबंध में लेख तथा चित्रों के ब्लाक दिए।
इस बैठक में दल के सदस्यों के असली नाम बदल दिए गए जिससे आपस में भी सदस्यों‘’ को एक दूसरे के नाम का पता न चल सके। उदाहरणार्थ भगत सिंह का नाम रणजीत, सुखदेव का नाम ‘विलेजर’, फणींद्र का ‘दादा’, शिव वर्मा का ‘प्रभात’, कुंदनलाल का ‘नं वन’ तथा विजय कुमार का ‘बच्चू’ तथा आजाद को ‘पंडित जी’, ‘महाशयजी’ तथा ‘नंबर 2’ के नाम से संबोधित किए जाने लगे ।
