कविता
बच्चियां गोरैया हो गईं हैं
ओमप्रकाश तिवारी
बच्चियां गौरैया हो गईं हैं
गोरैया लुप्त हो गईं हैं
बच्चियां लुप्त हो रहीं हैं
बच्चियां गली में नहीं खेलतीं
बच्चियां गुमसुम हो रही हैं
बच्चियां छत पर नहीं दिखतीं
बच्चिया कोख में मारी जा रही हैं
बच्चियां घर से नहीं निकलतीं
बच्चियां राह चलते मारी जा रही हैं
बच्चियों के हत्यारों के हाथों में
आ गया है देश का झंडा
बच्चियों के हत्यारों के समर्थन में
निकलता है झुंड का झुंड
बच्चियों के मां बाप सपने बुन रहे हैं
उनके जैसे लोग साजिशें रच रहे हैं
बच्चियां परी बन रही हैं
परियां कहीं स्वर्ग में रहती हैं
बच्चियां गोरैया बन रही हैं
गोरिया लुप्त हो गईं हैं…
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