कर्म करते कांड हो जाना…

कर्म करते कांड हो जाना…

रमेश सिद्धू

एक बात तो साफ है…ये आयोजन ही एपस्टीन फाइल्स, ट्रेड डील व जनरल नरवणे की किताब जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किया गया कि लोग वो सब भूलकर वाह मोदी जी वाह करते रहें। जिस तरह समाचार एजेंसी पीटीआई और एएनआई को लंबे लम्बे इंटरव्यू दिए गए। हर अखबार में एआई समिट लीड खबर बनवाई गई। और फिर रील बनाने के लिए आम लोगों को 5 किलोमीटर पैदा मार्च करवाना या देसी भाषा में कहें तो आम आदमी को ठुलाणा।

मकसद साफ दिख रहा था…मेरा ही जलवा। हर बार यही सब तो होता है जब जवाबदेही से बचना होता है। आपको लगता है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रशासन ने बिना ऊपरी अनुमति या सहमति के चीनी प्रोडक्ट को अपनी ईजाद बताकर प्रदर्शित कर दिया? या नेहा मैडम ने अपनी यूनिवर्सिटी के अधिकारियों की अनुमति के बगैर रोबोट को अपने छात्रों का नवाचार बता दिया हो?

हां अब कर्म करते करते कांड हो गया तो ठीकरा किसी न किसी के सिर तो फूटेगा। लिखते लिखते पता चला है मैडम जी पर फूट भी गया। पर जो फजीहत होनी थी वो तो हो ही गई न। अब जितनी मर्जी लीपापोती कर लीजिए। वैसे भी गलती तो नेहरू जी से शुरू होकर और पता नहीं किस किस तक जाती है…बस साहब की कभी कोई गलती नहीं होती चाहे नोट बंदी हो, ताली थाली बजाओ हो या कुछ और…कितनी गिनाएं। देश भक्ति काल में चल रहा है…बस नाम जाप चलता रहे…

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