क्या सत्ता और कॉरपोरेट के समीकरण बदल रहे हैं?

क्या सत्ता और कॉरपोरेट के समीकरण बदल रहे हैं

ओमप्रकाश तिवारी

भारत के कॉरपोरेट जगत में कुछ घटनाएं एक साथ घट रही हैं। पहली नजर में इनका आपस में कोई सीधा संबंध दिखाई नहीं देता है, लेकिन इन्हें एक क्रम में रखकर देखिए तो एक बड़ा सवाल सामने आता है। वह यह कि क्या सत्ता और कॉरपोरेट के समीकरण बदल रहे हैं? क्या कॉरपोरेट शक्ति का संतुलन बदल रहा है? क्या सत्ता के साथ बड़े कारोबारी घरानों की राजनीतिक रणनीति बदल रही है?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले एक दशक में भारत की राजनीति और बड़े उद्योग समूहों के रिश्ते जिस तरह बने, उनमें मुकेश अंबानी और गौतम अदानी दो सबसे प्रमुख नाम रहे हैं, लेकिन अब तस्वीर में कुछ नए संकेत दिखाई दे रहे हैं। वे संकेत क्या हैं इसे समझते हैं।

2014 के बाद बदली कॉरपोरेट तस्वीर

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में कई बड़े कारोबारी समूहों का विस्तार हुआ। रिलायंस ने जिओ के जरिए दूरसंचार और डिजिटल बाजार को बदल दिया। इसके बाद रिटेल, मीडिया, नई ऊर्जा और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में उसका विस्तार हुआ।

दूसरी तरफ अदानी समूह ने बंदरगाह, एयरपोर्ट, ऊर्जा, ट्रांसमिशन, लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से विस्तार किया। यहीं से भारत के कॉरपोरेट नक्शे पर एक नया मुकाबला उभरा। एक तरफ पहले से स्थापित रिलायंस था तो दूसरी तरफ तेजी से फैलता अदानी समूह। अब इन दोनों की प्रतिस्पर्धा उन क्षेत्रों में पहुंच गई है जो आने वाले दशक की अर्थव्यवस्था तय कर सकते हैं।

अब मुकाबला तेल और बंदरगाह से आगे—AI और डेटा तक

साल 2026 में अंबानी-अदानी की प्रतिस्पर्धा का नया मैदान AI और डेटा सेंटर बनता दिखाई दे रहा है।

फरवरी में अदानी समूह ने 2035 तक “नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाले एआई-रेडी डेटा सेंटर” के लिए 100 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष निवेश की घोषणा की। समूह के मुताबिक इससे अगले दशक में अतिरिक्त 150 अरब डॉलर का पूरे तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश आकर्षित हो सकता है।

इसके कुछ ही महीनों बाद रिलायंस ने मेटा के साथ गुजरात के जामनगर में 168 मेगावाट क्षमता वाला एआई-सक्षम डेटा सेंटर बनाने का समझौता किया। मेटा इसे लीज पर लेगा। अदानी भी मेटा और गूगल के साथ भारत में डेटा सेंटर क्षमता के विस्तार को लेकर बातचीत कर रहा है। यानी आने वाली अर्थव्यवस्था में मुकाबला सिर्फ पेट्रोलियम, बंदरगाह या एयरपोर्ट का नहीं है।

आने वाला मुकाबला इसमें होना है कि किसके पास ऊर्जा की क्षमता है। किसके पास डेटा है। किसके पास एआई कंप्यूटर हैं और किसके पास डिजिटल इंफ्रास्टक्चर है। यह सब जिसके पास होगा वही देश की अर्थव्यवस्था पर राज करेगा। यही नई कॉरपोरेट शक्ति की लड़ाई है। इसीलिए अंबानी-अदानी की प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ दो अरबपतियों की कारोबारी कहानी नहीं रह गई है।

अब मुकाबला सीधे दिखाई देने लगा है

जनवरी 2026 में रिलायंस की दूरसंचार कंपनी और अदानी के मुंबई एयरपोर्ट के बीच मोबाइल नेटवर्क को लेकर विवाद सामने आया। रिलायंस जियो समेत कुछ ऑपरेटरों ने सरकार से शिकायत की कि मुंबई एयरपोर्ट पर मोबाइल कनेक्टीविटी को लेकर अदानी समूह की व्यवस्था प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर रही है। यानी अब दोनों समूहों की प्रतिस्पर्धा केवल दूर के बाजारों में नहीं है। जहां कारोबार टकरा रहा है, वहां हित भी टकरा रहे हैं।

इसी बीच राजनीति में एक असामान्य घटना

सितंबर 2026 में राहुल गांधी की प्रस्तुति में एक बदलाव दिखाई दिया। 19 सितंबर को पुणे में राहुल गांधी के कार्यक्रम में राजनीतिक फ्रेम में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत, अजित डोभाल के साथ गौतम अदानी और मुकेश अंबानी की तस्वीरें दिखाई गईं। इससे पहले भी राहुल गांधी अदानी के साथ अंबानी का नाम लेते ही रहते हैं। लेकिन 24 सितंबर को इंदैार के कार्यक्रम में जो पीपीटी प्रस्तुति राहुल गांधी ने दिखाई उसमें मुकेश अंबानी की तस्वीर गायब थी। यह सयास था या अनायास इसी पर कयास लगाए जा रहे हैं। यह बदलाव अपने आप में छोटा लग सकता है, लेकिन राजनीतिक प्रतीकों की अपनी भाषा होती है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब अंबानी और अदानी को एक ही राजनीतिक फ्रेम में रखने से बच रही है? क्या यह सिर्फ प्रस्तुति का बदलाव है या क्या विपक्षी की राजनीति में अंबानी की भूमिका को अदानी से अलग करके देखने की शुरुआत है? सवाल यहीं से उठता है।

‘अदानी-अंबानी’ की जोड़ी कांग्रेस के लिए कॉरपोरेट प्रभाव, आर्थिक असमानता और मोदी सरकार पर कथित कारोबारी निकटता के आरोपों का संक्षिप्त राजनीतिक प्रतीक बन चुकी है। ऐसे में किसी प्रस्तुति में दोनों में से सिर्फ एक की तस्वीर हटना स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है। अगर आने वाले दिनों में राहुल गांधी के भाषणों, प्रस्तुतियों और कांग्रेस के आधिकारिक दस्तावेजों में ‘अदानी-अंबानी’ की जगह सिर्फ ‘अदानी’ दिखाई देने लगे, तब यह महज ग्राफिक बदलाव नहीं रहेगा। तब इसे राजनीतिक संदेश में बदलाव के संकेत के रूप में पढ़ने के लिए ज्यादा मजबूत आधार होगा।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि “अंबानी की तस्वीर क्यों हटाई गई?” बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी की राजनीति में ‘कॉरपोरेट विरोध’ का निशाना अब व्यापक ‘अदानी-अंबानी’ जोड़ी से सिमटकर मुख्यतः गौतम अदानी पर केंद्रित हो रहा है? अभी इसका जवाब निश्चित रूप से हां नहीं है, लेकिन 19 सितंबर से 24 सितंबर के बीच एक ही राजनीतिक प्रस्तुति-भाषा में आया यह बदलाव इतना स्पष्ट जरूर करता है कि इसे नोट किया जाए और आगे की प्रस्तुतियों से इसकी दिशा को परखा जाए। अभी इसे कांग्रेस की रणनीतिक ‘अंबानी नीति’ में बदलाव कहना जल्दबाजी होगी; लेकिन अदानी और अंबानी को एक ही राजनीतिक प्रतीक मानने की पुरानी फ्रेमिंग में दरार का संकेत जरूर कहा जा सकता है।और फिर अखिलेश यादव का नथवानी दांव

30 सितंबर को समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाया। नथवानी रिलायंस इंडस्ट्री के ग्रुप प्रेसिडेंट हैं। उनका नाम खुद सपा के भीतर भी अपेक्षित नहीं माना जा रहा था। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे अखिलेश यादव का सरप्राइज बताया।

अब इस घटना की दूसरी कड़ी देखिए। धनराज नथवानी के पिता परिमल नथवानी भी रिलायंस से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी हैं। जून 2026 में NDA के समर्थन से झारखंड से राज्यसभा पहुंचे थे।

अर्थात पिता एनडीए समर्थित उम्मीदवार और बेटा समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार। यह सिर्फ पारिवारिक राजनीतिक संयोग नहीं है। यह उस समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भाजपा की मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है।

तो सवाल यह है कि अखिलेश यादव ने रिलायंस के एक शीर्ष अधिकारी को ही क्यों चुना? क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों का मामला है? क्या यह कारोबारी समुदाय को संदेश है? या क्या विपक्षी राजनीति भी यह समझ रही है कि भविष्य की राजनीति में बड़े कॉरपोरेट समूहों से दूरी बनाकर नहीं चला जा सकता? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या रिलायंस से जुड़े लोगों के लिए राजनीतिक दरवाजे अब सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ खुले हैं?

चुनाव आयोग और TCS

अब इसी कहानी में टाटा का प्रवेश होता है। चुनाव आयोग के फार्म -6 में बदलाव को लेकर राहुल गांधी ने टीसीएस की भूमिका पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग के स्तर से टीसीएस को बदलाव करने के निर्देश दिए गए। चुनाव आयोग के ECINET सिस्टम में TCS की तकनीकी भूमिका है।

यहां पर राजनीतिक आरोप और स्थापित तथ्य अलग-अलग हैं, लेकिन राजनीतिक अर्थ महत्वपूर्ण है।

देश की चुनावी प्रक्रिया डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में उलझ गई है। एक निजी कॉरपोरेट कंपनी की भूमिका अब सीधे राजनीतिक विवाद का विषय बन गई है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि टीसीएस ने क्या किया। सवाल यह भी है कि भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं और निजी तकनीकी कंपनियों के बीच शक्ति का रिश्ता कितना पारदर्शी है?

और तभी टाटा के भीतर बड़ा संघर्ष

टीसीएस विवाद के साथ ही टाटा समूह के भीतर ऐसा संघर्ष सामने आया है, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले मुश्किल थी। टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को पांच वर्ष के एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए जाने का फैसला किया। लेकिन टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

टाटा ट्रस्ट का कहना है कि बोर्ड का फैसला टाटा संस के आंतरिक संचालन के नियम के अनुरूप नहीं था और उसे कानूनी प्रभावहीन माना जाना चाहिए।

अब विवाद और आगे बढ़ गया है। नोएल टाटा ने हालिया बोर्ड बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग और मिनट्स मांगे हैं। चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति से जुड़ी कानूनी राय पर सवाल उठाए हैं। टाटा ट्रस्ट के वरिष्ठ ट्रस्टी वेनू श्रीवासन ने तो सुशासन व्यवस्था की जांच की मांग तक कर दी है। यह अब सामान्य बोर्डरूम मतभेद नहीं रह गया है।

सवाल यह है कि टाटा संस को वास्तव में चलाएगा कौन? ट्रस्ट की शक्ति कितनी होगी? बोर्ड की शक्ति कितनी होगी? और भविष्य में टाटा संस की संरचना कैसी होगी?

टाटा ट्रस्ट की मौजूदा कलह को लेकर कारोबारी और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि क्या मौजूदा सत्ता-व्यवस्था इस शक्ति-संघर्ष को प्रभावित कर रही है? यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि टाटा संस की नियमन स्थिति, संभावित लिस्टिंग और ट्रस्ट की भूमिका जैसे सवाल एक साथ सामने आए हैं। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर टाटा समूह जैसे संस्थान के भीतर नियंत्रण को लेकर संघर्ष हो रहा है, तो क्या यह केवल कॉरपोरेट की शासन व्यवस्था का मामला है? या इसके पीछे नियामकीय और राजनीतिक शक्ति-संतुलन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है? यहां से कहानी सिर्फ टाटा संस की नहीं रह जाती है। यह भारत में कॉरपोरेट स्वायत्तता और सत्ता के बीच रिश्ते का सवाल बन जाती है।

अब पूरी तस्वीर एक साथ देखिए। एक तरफ अदानी का अभूतपूर्व विस्तार होता है तो दूसरी ओर अंबानी-अदानी की एआई, डेटा और ऊर्जा में बढ़ती प्रतिस्पर्धा दिखाई देने लगी है। इसी बीच अंबानी के विरोधी विपक्ष के नेता राहुल गांधी की राजनीतिक प्रस्तुति से मुकेश अंबानी की तस्वीर गायब हो जाती है। इसके बाद रिलायंस के शीर्ष अधिकारी धनराज नथवानी को समाजवादी पार्टी राज्यसभा का टिकट थमा देती है। यह सब संयोग है या प्रयोग? संयोग तो बिल्कुल भी नहीं लगता है।

असली बदलाव शायद यहां है

पिछले दशक में भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को देखने का एक आसान तरीका था सत्ता और बड़े कॉरपोरेट लेकिन अब तस्वीर अधिक जटिल है। कॉरपोरेट समूह खुद एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं। अंबानी और अदानी एआई, डेटा सेंटर, ऊर्जा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में आमने-सामने आ रहे हैं। राजनीतिक दल भी कॉरपोरेट जगत के साथ अपने रिश्तों को नए तरीके से देख रहे हैं। समाजवादी पार्टी का नथवानी को टिकट इसका असामान्य उदाहरण है। दूसरी तरफ टाटा जैसे समूह के भीतर ट्रस्ट और बोर्ड के बीच संघर्ष दिखा रहा है कि बड़े कॉरपोरेट संस्थानों के भीतर भी सत्ता का प्रश्न कितना महत्वपूर्ण हो चुका है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या अंबानी की रणनीति बदल रही है? साल 2014 के आसपास मुकेश अंबानी और नरेंद्र मोदी के संबंधों को लेकर जो सार्वजनिक राजनीतिक धारणा बनी, उसमें अंबानी को मोदी के समर्थक कॉरपोरेट चेहरे के रूप में देखा गया। लेकिन आज परिस्थिति अलग है। अदानी का समूह बहुत बड़ा हो चुका है। दोनों की कारोबारी टक्कर अब भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था तक पहुंच गई है।दूसरी तरफ अंबानी से जुड़े व्यक्ति को समाजवादी पार्टी राज्यसभा भेज रही है। इसका मतलब यह नहीं कि अंबानी विपक्ष में चले गए लेकिन यह सवाल जरूर पैदा करता है कि क्या रिलायंस अब केवल सत्ता के एक केंद्र के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय सभी राजनीतिक शक्तियों के साथ अपने रास्ते खुले रख रहा है? अगर ऐसा है तो यह राजनीतिक विचारधारा नहीं, कॉरपोरेट रिस्क मैनेजमेंट भी हो सकता है।

कारोबार सरकारों से लंबा चलता है। सरकारें बदल सकती हैं। नीतियां बदल सकती हैं। लेकिन रिलायंस, अदानी और टाटा जैसे समूह कई दशकों के लिए निवेश करते हैं। इसलिए उनका सवाल हो सकता है कि आज कौन सत्ता में है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन कल कौन होगा, यह भी महत्वपूर्ण है।

और यही इस कहानी का सबसे बड़ा संकेत है भारत का कॉरपोरेट जगत शायद किसी एक खेमे की कहानी नहीं रह गया है। यह अब प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक पहुंच, नियमन, तकनीक और संस्थागत शक्ति के बीच बनने वाले नए समीकरणों की कहानी है। अंबानी और अदानी एक-दूसरे से कारोबार में लड़ रहे हैं। राजनीतिक दल बड़े उद्योग समूहों से रिश्ते बना रहे हैं। टीसीएस जैसे कॉरपोरेट चुनावी तकनीक के केंद्र में हैं। और टाटा ट्रस्ट जैसे शक्तिशाली शेयर होल्डर अपने ही समूह के बोर्ड से टकरा रहे हैं।

क्या यह संयोग है? संभव है। क्या यह किसी बड़े बदलाव के संकेत हैं? संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन एक बात साफ है कि कॉरपोरेट इंडिया अब सिर्फ शेयर बाजार की कहानी नहीं है। यह सत्ता की कहानी भी है। और सत्ता भी अब सिर्फ संसद में नहीं है। डेटा सेंटर में है। एआई में है।

ऊर्जा में है। डिजिटल ढांचे में है। और उन संस्थानों में भी है जो यह तय करते हैं कि भारत का आर्थिक भविष्य किसके हाथ में जाएगा।

तथ्य सामने हैं। संकेत सामने हैं। सवाल सामने हैं। अब देखना यह है कि आने वाले महीनों में इन बिखरे हुए संकेतों से कोई साफ तस्वीर बनती है या ये सिर्फ अलग-अलग घटनाएं साबित होती हैं।

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