कक्षा से जीवन तक: एक शिक्षक की असली विरासत

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

शिक्षक दिवस पर विशेष

कक्षा से जीवन तक: एक शिक्षक की असली विरासत

 

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“मैम, आपको शायद याद नहीं होगा… आपने एक दिन मुझसे कहा था कि तुम कर सकती हो।”
वर्षों बाद मिली अपनी एक पुरानी छात्रा की यह बात सुनकर शिक्षिका मुस्कुराईं, “बस इतनी-सी बात तुम्हें याद है?”
छात्रा ने कहा, “मैम, आपके लिए वह एक वाक्य था… मेरे लिए उस समय खुद पर विश्वास करने की वजह।”

शायद शिक्षक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है। वह रोज़ न जाने कितने वाक्य बोलता है, लेकिन उसे स्वयं भी नहीं पता होता कि उसका कौन-सा वाक्य किसी विद्यार्थी के भीतर वर्षों तक जीवित रहेगा।

हर वर्ष 5 सितंबर को हम शिक्षक दिवस मनाते हैं। विद्यार्थी फूल देते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। लेकिन यह दिन केवल सम्मान पाने का नहीं, शिक्षक के लिए अपने भीतर झाँकने का दिन भी है।

क्योंकि समय बदल गया है। आज विद्यार्थी के पास जानकारी पाने के अनगिनत साधन हैं। वह कुछ ही क्षणों में किसी विषय के बारे में बहुत कुछ जान सकता है। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं रह सकती। अब उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है – विद्यार्थी को सही दिशा देना, प्रश्न पूछना सिखाना और गिरने के बाद फिर उठने का साहस देना।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था – “सच्चे शिक्षक वे हैं, जो हमें अपने लिए सोचने में सहायता करते हैं।”

यह बात आज शायद पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण है।

हर कक्षा में कुछ बच्चे तेज होते हैं, कुछ शांत, कुछ शरारती और कुछ ऐसे भी, जो पीछे की सीट पर बैठकर धीरे-धीरे स्वयं पर विश्वास खो रहे होते हैं। अच्छे शिक्षक की नज़र केवल उस हाथ पर नहीं जाती जो हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए उठता है, बल्कि उस चेहरे पर भी जाती है जो उत्तर जानते हुए भी हाथ उठाने से डरता है।

कई बार एक शिक्षक का छोटा-सा विश्वास बच्चे का पूरा भविष्य बदल देता है।

“तुमसे नहीं होगा” और “एक बार फिर कोशिश करो, तुम कर सकते हो” – दोनों वाक्य बोलने में कुछ ही क्षण लगते हैं, लेकिन विद्यार्थी के मन पर इनका प्रभाव वर्षों तक रह सकता है।

इसीलिए शिक्षक की असली शक्ति उसकी किताब में कम, उसके व्यवहार में अधिक होती है।
विद्यार्थी शायद वर्षों बाद यह भूल जाए कि हमने उसे कौन-सा अध्याय पढ़ाया था, लेकिन वह यह नहीं भूलता कि उसकी गलती पर हमने उसे अपमानित किया था या समझाया था; उसकी असफलता पर उसका मज़ाक बनाया था या उसका हाथ थामा था।

हेनरी एडम्स का एक सुंदर विचार है – “एक शिक्षक का प्रभाव अनंतकाल तक रहता है; वह कभी नहीं जान सकता कि उसका प्रभाव कहाँ जाकर समाप्त होगा।”

शिक्षक का काम आसान नहीं है। पाठ्यक्रम पूरा करना है, परिणामों का दबाव है, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ हैं और हर बच्चे की अलग आवश्यकता है। कभी-कभी इन सबके बीच शिक्षक स्वयं भी थक जाता है। ऐसे समय शिक्षक दिवस शायद उसे भी यह याद दिलाने आता है कि उसकी मेहनत का परिणाम केवल अंकतालिका में नहीं दिखाई देता।

किसी विद्यार्थी का आत्मविश्वास, किसी की सोचने की क्षमता, किसी का अच्छा इंसान बनना – इनमें भी कहीं न कहीं उसके शिक्षक का अंश होता है।

इसलिए शायद हर शिक्षक को कभी-कभी स्वयं से तीन प्रश्न पूछने चाहिए –
क्या मेरी कक्षा में बच्चा प्रश्न पूछने से डरता है या उत्साहित होता है?
क्या मैं केवल अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी को देखता हूँ, या उस बच्चे को भी जो चुपचाप पीछे छूट रहा है?
और जब कोई विद्यार्थी वर्षों बाद मुझे याद करे, तो उसे मेरा पढ़ाया हुआ पाठ याद आएगा या मेरे कारण अपने भीतर जागा हुआ विश्वास?

क्योंकि एक शिक्षक की सबसे सुंदर सफलता शायद वह नहीं, जब विद्यार्थी कहे –
“आपने मुझे बहुत अच्छा पढ़ाया था।”

बल्कि वह क्षण है जब वह वर्षों बाद लौटकर कहे –
“जब मुझे खुद पर विश्वास नहीं था, तब आपने मुझ पर विश्वास किया था।”

शिक्षक दिवस पर उन सभी शिक्षकों को नमन, जिनके दिए ज्ञान से कहीं अधिक, उनका दिया विश्वास आज भी उनके विद्यार्थियों के भीतर जीवित है।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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