ओमसिंह अशफ़ाक की कविताएं- कविता का जन्म, दृष्टि, ऊर्जा, सीखना और अलाव
कविता का जन्म
फ़सल सी उगती है कविता
झेलती मार पाले़ और सूखे की
बह जाती है बाढ़ में यकदम
जैसे गई फसल पकी-पकाई ।
चली आती है कभी खिंची-
कोयले की तरह खान से
लथपथ मिट्टी और कीचड़ से
करती हुई दिमाग को
पसीना-पसीना ।
कभी लेती है जन्म ऐसे
जैसे हुई हो नार्मल डिलीवरी घर में
और देखती है सद्य-प्रसूता मां-
नवजात शिशु को बड़े चाव से
लेटा हुआ बगल में ।
दृष्टि
आँखें सच की लिपि को
पढ़ सकती हैं
उसका संदेश नहीं
संदेश आत्मसात होता है
महसूसती नज़र से
धुंधला दिया है जिसको
अतिज्ञानियों ने
कहकर दिव्यदृष्टि ।
अलाव
ठंडी रात में
खुले आकाश तले
अलाव तापते
बेघर परिवार की मौलिकता
उसे खूब लुभाती है ।
पर डरता है वह ये सोचकर
कि किस पते पर आती होगीं
उनकी चिठ्ठियाँ और
कहाँ रहती होगी
कोई खुशखबरी ।
ऊर्जा
परमाणु ऊर्जा सिर्फ़
बम केअंदर नहीं होती
वह मौजूद रहती है
बम बनाने वाले दिमागों में ।
कविता में भी विद्यमान है
परमाणु ऊर्जा
फ़र्क ये है कि
बम ध्वंस करता है
और कविता निर्माण ।
सीखना
पैदल चलना
सेहत के लिए ही जरूरी नहीं
जरूरी है इसलिए भी
ताकि बना रहे धरती से
आदमी का रिश्ता ।
पैदल चले बिना नहीं हो पाती
धरती के कड़ियलपन
और धसान की पड़ताल ।
इस अर्थ में हमारे पैर
आँखों का काम करते हैं ।
पर आँखें देख नहीं पातीं
बिना प्रकाश के
और पैर पढ़ लेते हैं धरती को छूकर ।
पैर केवल रास्तों की लंबाई नहीं बताते
चढ़ाई-उतराई का संयम
और श्रम की नाप-जोख भी करते हैं पैर ।
वे परिचित कराते हैं रास्तों के
जोखिमों से भी
जरा-सी लापरवाही हुई कि
गिर जाते हैं हम औंधे-मुँह ।
बन जाता है जीवन का पहला सबक
जो नहीं भूलता जीवन भर
टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते हुए ।
मानचित्रों में नहीं मिलते नए रास्ते
हवाई सर्वेक्षण भी नहीं कर सकते
उनकी शिनाख्त
पैदल ही जाना पड़ता है उन्हें खोजने
अन्यथा एक दिन हम खुद को
दलदल में धंसा पाते हैं।
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