और अब प्राथमिक स्कूलों को बंद करने की तैयारी!

नागरिक परिक्रमाः संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणी-2

और अब प्राथमिक स्कूलों को बंद करने की तैयारी!

संजय पराते

 

जिस नई शिक्षा नीति और उसके जरिए भारतीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार का दावा नरेंद्र मोदी की संघी सरकार कर रही है, उसकी पोल अब धीरे-धीरे खुलने लगी है। नीति आयोग के जरिये सरकार ने यह मंशा जाहिर कर दी है कि वह प्राथमिक स्कूलों को बड़ी संख्या में बंद करेगी, क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वे लाभप्रद नहीं है।

भारत जब आजाद हुआ था, तो औसत साक्षरता दर बहुत कम थीI इस चुनौती से निपटने के लिए शिक्षा का जो ढांचा अपनाया गया था, उसके मूल में यही विचार था कि हमारे देश का कोई भी बच्चा प्राथमिक शिक्षा के दायरे से बाहर न रहे। इसके लिए सैद्धांतिक रूप से यह तय किया गया था कि प्राथमिक स्कूल के बच्चे को एक किमी. से ज्यादा पैदल न चलना पड़े। इसके सकारात्मक नतीजे भी मिले। 2011 में साक्षरता दर बढ़कर करीब 73% हो गयी और महिलाओं में औसत साक्षरता दर बढ़कर 65% हो गयी।

आज देश में सात लाख तीस हज़ार के करीब सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं। लेकिन इनमें से एक-तिहाई से ज़्यादा (लगभग ढाई लाख) स्कूलों में कुल मिलाकर 50 से भी कम बच्चे हैं। इनमें से लगभग 5% स्कूल ऐसे हैं, जहाँ 10 से भी कम बच्चे पढ़ते हैं और करीब 8% स्कूल ऐसे हैं, जहाँ सिर्फ़ 11 से 20 बच्चे ही पढ़ते हैं।

नीति आयोग का यह मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार के लिए और देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कम बच्चे वाले स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसे स्कूलों को चलाना आर्थिक रूप से अप्रभावी और प्रशासनिक तौर पर चुनौतीपूर्ण होता है। साफ तौर पर यह समझदारी उस रणनीति के उलट है, जो शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने और 100 प्रतिशत साक्षरता को प्राप्त करने के उद्देश्य से आजादी के बाद से आज तक हमने अपनाई है।

नीति आयोग की यह समझदारी शिक्षा के क्षेत्र को माल बनाने और प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही शिक्षा का निजीकरण करने की समझदारी है। मोदी सरकार की नीति भी यही है कि जिसकी औकात हो, वह पढ़े। हाल ही में विभिन्न परीक्षाओं में प्रश्न पत्र लीक होने की जो घटनाएं सामने आई है, वह भी यही कहती है कि जिसकी औकात हो, वह शिक्षा और रोजगार को खरीद ले।

यदि इन कम बच्चों वाले स्कूलों में औसत दर्ज संख्या 30 भी मानी जाएं, तो ढाई लाख स्कूलों को बंद करने का अर्थ है, 75 लाख बच्चों को सरकारी प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र के दायरे से बाहर करना। चूंकि इनमें से अधिकांश स्कूल दूरस्थ और पहुंच विहीन इलाकों में पड़ते हैं और इन स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब, आदिवासी, दलित और सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों से ताल्लुक रखते हैं, यह माना जा सकता है कि शिक्षा से निष्कासित होने वाला शायद ही कोई बच्चा निजी और महंगी शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखेगा। इससे साक्षरता दर, और खासकर महिला साक्षरता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगी।

नीति आयोग की रिपोर्ट यह स्वीकार करती है कि मोदी राज के पिछले एक दशक के दौरान पूरे देश में लगभग 94000 स्कूल बंद हो गए हैं। वर्ष 2014-15 में देश भर में स्कूलों की संख्या 11.07 लाख थी, जो वर्ष 2024-25 तक घटकर 10.13 लाख रह गई है। इसी अवधि के दौरान देश में सरकारी सहायताप्राप्त स्कूलों की संख्या भी 83000 से घटकर 79000 रह गई है। इसी प्रकार, इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई है। इसका अर्थ है कि देश में 25-26 स्कूल रोज बंद हो रहे हैं और इनकी जगह रोज 13-14 निजी स्कूल ले रहे हैं। साफ है कि निजी स्कूलों के विस्तार से सार्वजनिक शिक्षा की बच्चों तक पहुंच और इसकी वहनीयता पर विनाशकारी पड़ा है। इससे सरकारी स्कूलों में दाखिलों की संख्या में गिरावट आना ही था और यह संख्या 2.26 करोड़ से ज्यादा है।

लेकिन मोदी सरकार को गरीब तबकों के हितों, उनकी चिंताओं और समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। उसे तो कॉरपोरेटों का हित साधने के लिए देश के करोड़ों लोगों और लाखों परिवारों को अशिक्षा के अंधकार में धकेलने में भी कोई हिचक नहीं है। संघी गिरोह की सरकार शिक्षा के क्षेत्र में जिन नीतियों को लागू कर रही है, वह सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को परास्त करने वाला और आज तक हासिल उपलब्धियों को मटियामेट करने वाला है।

यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।

(टिप्पणीकार छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)

लेखक-  संजय पराते

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