जसवीर त्यागी की चार कविताएं

जसवीर त्यागी की चार कविताएं

बचाना

गुमशुम पत्नी से
उदासी का कारण पूछा

वह बोली-
करीपत्ता का पौधा सूख गया
जब लगाया था
तब हरा-भरा था

पता नहीं क्या हुआ?
मैं बोला-
इसमें दुःख की क्या बात है?
दूसरा नया पौधा ले आयेंगे

उसने कहा-
बात दूसरा पौधा लाने की नहीं है
बात तो लाये हुए को बचाने की है।
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अवज्ञा

शिमला माल रोड पर घूमते हुए
मैं थक कर
पत्थर की एक बैंच पर बैठ गया

कुछ समय बाद
एक सुंदर नव विवाहित युगल
आकर मेरी बगल विराज गया

जो शब्दों से कम
अपनी रंग-आभा से अधिक बोल रहा था

कुछ देर
मैं बैंच पर ही टिका रहा

युगल के आते ही
तुरंत उठ कर जाना
शायद यह प्रेम की अवज्ञा होता।
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अनदेखा

एक स्त्री ने कहा-
आजकल चिड़िया कम दिखती है

उसके कथन के बाद
मैं देर तक
चिड़ियों के बारे में सोचता रहा

मेरे मन में यह बात नहीं आयी
एक स्त्री ने मुझे यह सच्चाई बतायी

संसार में कितना कुछ
पुरुष की पहुँच से छूट जाता है

और स्त्री उस अनदेखे को
सदा के लिए सहेज लेती है।
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सुकून

घर के कामों से थककर
उसे कभी-कभी दिन में ही
हल्की-फुल्की नींद आ जाती है

जरूरी काम होने पर भी
मैं उसे जगाता नहीं

सोता हुआ इंसान
मुझे कोई फरिश्ता लगता है

आँख खुलने पर वह कहती है-
अरे!आपने मुझे जगाया नहीं
कितना काम अभी बाकी है
यह कहती हुई
वह अपने काम में लग जाती है

उसकी हल्की-सी नींद
मुझे भारी सुकून से भर देती है।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर हैं>