लघु कथा
रिश्तों की दिशा
डॉ रीटा अरोड़ा
“सुधा, तुम्हें पता है… आजकल रिश्ते इतनी जल्दी क्यों बदल जाते हैं?”
रीमा ने चाय का कप मेज पर रखते हुए पूछा।
सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “शायद लोग बदल गए हैं।”
रीमा कुछ पल चुप रही, फिर बोली-
“लोग हमेशा नहीं बदलते सुधा… कई बार परिस्थितियाँ सिर्फ उनका असली चेहरा दिखा देती हैं।”
सुधा ने उसकी ओर देखा, “कैसे?”
“जब तक हम किसी के काम आते हैं, उसके लिए समय निकालते हैं, उसकी जरूरतों में खड़े रहते हैं-तब तक रिश्ता बहुत अपना लगता है। लेकिन जिस दिन हमें सहारे की जरूरत पड़ती है, वही अपनापन अचानक व्यस्तता, मजबूरी और दूरी में बदल जाता है।”
सुधा की आँखें नम हो गईं।
“हाँ… सबसे ज्यादा दर्द तब होता है, जब पराया नहीं, अपना बदलता है।”
रीमा ने धीमे स्वर में कहा-
“और कुछ लोग शब्दों से इतने अपने लगते हैं कि हम उनके व्यवहार में छिपी बेरुखी देख ही नहीं पाते।”
“फिर रिश्तों को पहचाना कैसे जाए?”
रीमा मुस्कुराई-
“बातों से नहीं… उस दिन से पहचानो, जिस दिन तुम्हें उनकी जरूरत हो और तुम्हारी आवाज़ सुनकर उनके कदम तुम्हारी ओर बढ़ें या पीछे हट जाएँ।”
सुधा ने गहरी साँस ली।
रीमा ने चाय का आखिरी घूँट लिया—
“रिश्तों की असली परीक्षा अच्छे दिनों में नहीं, हमारे बुरे दिनों में होती है। और यह पीड़ा समझने में इंसान को अक्सर आधी ज़िंदगी लग जाती है।”
