राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं
1.
फूलों के रॅंग सपनों में
फूलों के रॅंग सपनों में
ज़रुरी तो नहीं कि हों हाज़िर हाथ बाॅंधे
बॅंधे हैं हाथ फूलों के भी बॅंधे हैं हर काल
वे अलग-अलग भी हैं और गुच्छों में भी
पर्याप्त जिज्ञासाओं,पर्याप्त सम्मान सहित
हर फूल का,हर रॅंग का,हर ख़ुशबू का
अलग-अलग खिलने और खौलने का
है वक़्त वही,है रक्त वही भेद-विभेद नहीं
भीतर हड्डियों में पुरज़ोर है ताक़त भी वही
समझ का सवाल नहीं हवा के हवाले जैसा
ज़िम्मेदारी समझते हैं अपनी ध्वनियों में
ज़िम्मेदारी से महकते हैं अपनी निष्ठाओं में
टकराते हैं तो बैर नहीं रखते हैं कहीं कोई
इशारों की दुनिया है सुबह-शाम ख़ुशनुमा
मुस्कुराते हैं एकाधिकार में भी कभी-कभी
रोते हैं तो बस अकेले-अकेले.
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2.
विस्मय और रास्ता.
मैं यहाँ इस तरफ़
और वह वहाँ उस तरफ़
दोनों दो विपरीत दिशाओं की ओर
अपना मुह फुलाए खड़े हैं अगर
तो संभावना सिर्फ़ सूर्यास्त ही नहीं
हो सकती है उम्मीद प्रतीक्षा भी
उस ओर से भी वही,इस ओर से भी वही
विस्मय का कोई कारण व्यर्थ है ढूँढ़ना
एक पर शून्य रख देने से बन जाता है दस
और दस पर शून्य रखने से हो जाता है सौ
एक क़दम बढ़ाने से बढ़ते हैं हज़ार क़दम
थोड़ा जो चलूँ मैं,तो थोड़ा चले वह भी
हिसाब सब लिखता रहेगा इतिहास
बचा है कौन कितना,बचेगा कौन कितना
रचा है क्या किसने,रचेगा कौन कितना
अधिक से अधिक सौंदर्यशाली है अभी
विस्मय और रास्ता?
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3.
बच रहती है एक उड़ान
भीतर और-और भीतर
लहराते पत्तों से होते हुए जड़ों तक
और जड़ों से ज़मीन की गहराइयों तक
जो बच रहता है ऑंधियों के बावजूद
मैं विचार करता हू वह प्रेम अपने एकांत में
एक शून्य से दूसरे शून्य की ओर आते हुए
जाते हुए को ज़रा भी रोकते हुए नहीं
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे मेले हर बरस
कोई भी झाँका नहीं अभी तक तो इस तट
बाद मरने के मेरे कक्ष में मेरी ओर से फिर
फटी कमीज़ का टूटा बटन ढ़ूँढने के लिए
झाँकता ही कौन है और झाॅंकेगा ही क्यों
अब यहाँ रखा ही क्या है फ़ालतू चीज़ों में
बाज़ार की फ़ितरती चीज़ों जैसा नायाब
बमुश्किल मिलता है ज़रुरत का कुछ थोड़ा
दरवाज़े के बाहर पड़ी भूल-भुलैया जैसा
चिल्लर की तरह ख़र्च हुआ जीवन सारा
बड़ा फ़ख़्र था,गर्व था पत्तों को लहराने का
सब कुछ उड़ जाने के बहुत बाद भी
बच रहती है एक उड़ान.
