कविता
ना जाने वो …
मंजुल भारद्वाज
ना जाने वो कौन सी मिट्टी होती है
जिसमें ज़िंदा क़ौम लहलहाती है !
ना जाने वो कौन सा आसमान है
जिसमें आज़ाद परिन्दें उड़ते है !
ना जाने वो कौन से पहाड़ है
जहाँ से प्रेम की नदियाँ बहती हैं !
ना जाने वो कौन सी हवाएं हैं
जिनमें इंक़लाब के नगमें गूंजते हैं !
ना जाने वो कौन सा सूर्य है
जो अँधेरे मिटाता है !
मैं भी कैसा रूमानी हूँ
अँधेरे में उजाला
नफ़रत में प्रेम
गुलामों में आज़ादी
बुझी राख में चिंगारी
मुर्दा कौम में
ज़िंदगी ढूंढ़ रहा हूँ !
