व्यंग्य
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा…
-
फैसलों का “ट्रायल वर्जन”
रमेश सिद्धू
मौसम बदला है, लेकिन मौसम से ज्यादा आजकल फैसलों का मिजाज बदल रहा है। सुबह जो बात पत्थर की लकीर बताई जाती है, शाम तक उसे चॉक की लाइन साबित कर दिया जाता है। जनता भी अब मौसम के मिजाज से कम, घोषणाओं और फैसलों से ज्यादा भ्रमित रहती है।
आदेश ऐसे जारी होते हैं जैसे शतरंज की चाल चल रहे हों- फर्क है तो बस इतना कि मोहरा हमेशा आम जनता बनती है। कभी जेब पर असर, कभी समय पर असर, कभी रोजमर्रा की सुविधाओं पर असर…। और जब शोर थोड़ा बढ़ जाए, तो कह दिया- “गलतफहमी हो गई थी।”
अजब व्यवस्था का गजब परिवर्तन है। पहले बोझ रखो, फिर प्रतिक्रिया तौलो, फिर बोझ हटाकर अहसान जताओ। जैसे किसी की जेब से रुमाल निकालकर वापस देते हुए उम्मीद की जाए कि धन्यवाद भी मिले।
उधर लोग भी कम दिलचस्प नहीं हैं। हर नए फैसले या ऐलान पर पहले माथा पकड़ते हैं, फिर हिसाब लगाते हैं, फिर लाइन में लगते हैं, फिर विरोध करते हैं, और अंत में सुनकर खुश हो जाते हैं- “फिलहाल स्थगित किया जाता है।”
वैसे अब जनता ने भी समझ लिया है कि हर फैसला अंतिम नहीं होता, कुछ फैसले “ट्रायल वर्जन” होते हैं।
गलत निर्णयों का सबसे बड़ा कमाल यह है कि उन्हें लेने वालों को परेशानी कम होती है, भुगतने वालों को ज्यादा। ऊपर बैठे लोगों के लिए ये महज फाइल का पन्ना होता है, जनता के लिए जेब पर बोझ और महीने का बजट गड़बड़ा जाना।
हालात ऐसे हैं कि समझदार लोग चुप हैं, परेशान लोग व्यस्त हैं, और सलाह देने वाले सक्रिय हैं। मगर फिर भी उम्मीद है कि टूटने का नाम नहीं लेती।
गुजरे जमाने के शायर शौक़ बहराइची साहब ने कहा भी है-
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा
लेकिन पहले उल्लू वहां बैठते थे जहां ‘वीरानी’ होती थी। आज नए दौर के आधुनिक उल्लू इतने टैलेंटेड हैं कि वे जहां बैठते हैं, वहां खुद-ब-खुद ‘वीरानी’ छा जाती है।
