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रविन्द्र कुमार ‘रवि’ की एक ग़ज़ल

रविन्द्र कुमार ‘रवि’ की एक ग़ज़ल   पेट की उदासी को,रोटियां समझती हैं। बंदरों की चालें कब, बिल्लियां समझती हैं।…