रेणुका बांध: पुनर्वास में पूरी संवेदना दिखाने की जरूरत

रेणुका बांध: पुनर्वास में पूरी संवेदना दिखाने की जरूरत

कुलभूषण उपमन्यु

राष्ट्रीय महत्व की रेणुका बांध परियोजना के विस्थापित एक बार फिर आक्रोषित हैं। उनकी पुनर्वास और पुन:स्थापन की लंबित मांगें अभी भी अनसुलझी हैं। यह स्टोरेज बांध हिमाचल के सिरमौर जिला के ददाहू में गिरी नदी पर बनाया जा रहा है।

बांध की ऊंचाई 148 मीटर और लागत 6947 करोड़ है। इसमें 4980 लाख घन मीटर पानी भंडारण होगा, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, और उत्तर प्रदेश की जरूरतों को पूरा करेगा।

इस बांध से दिल्ली के लिए 23 क्यूमेक्स पानी की आपूर्ति की जाएगी जो दिल्ली की कुल जरूरत का 40% है। इस बांध से 40 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा जिस पर हिमाचल का हक होगा।

इस परियोजना का निर्माण हिमाचल पॉवर कॉर्पोरेशन द्वारा किया जा रहा है। निर्माण लागत का 90% केंद्र सरकार और 10% लाभान्वित राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा। विद्युत् खंड का खर्च केंद्र सरकार द्वारा 90% और हिमाचल द्वारा 10% के हिसाब से वहन होगा।

यह बांध रॉक फिल तकनीक से बनाया जाएगा, जिसके लिए 1231 हेक्टेयर निजी भूमि अधिग्रहण की जा रही है और 939 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई है। 1408 परिवार विस्थापित हुए हैं जो 41 गांवों और 17 पंचायतों से संबंध रखते हैं।

पुनर्वास के लिए डांडा अन्बोया में चिह्नित भूमि को प्रभावितों ने अनुपयुक्त पाया और अस्वीकृत कर दिया था। इसके अलावा कुछ परिवार छूट गए हैं उन्हें विस्थापित सूची में शामिल करने की बात है, जिनमें से कुछ वन भूमि पर बसे हैं। विरोध के कारण प्रबन्धन ने सैनवाला, चकली,और टोकिओं में जगह खरीद कर विकसित करने का वादा किया है।

2800 करोड़ रुपये भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और राहत कार्य के लिए निर्धारित किया गया है। 1408 परिवारों में से 1362 को मुख्य परियोजना प्रभावित घोषित किया गया है। प्रभावित परिवारों का दावा है कि उनकी चिंताओं को वर्षों से नजरंदाज किया जा रहा है।

वे सरकार से हस्तक्षेप करके पुनर्वास के लिए वैकल्पिक स्थल के चयन का आग्रह कर रहे हैं। पुनर्वास स्थल पर बुनियादी ढांचे के बिना बस पाना संभव नहीं हो सकता। राहत एवं पुनर्वास नीति के तहत मकान बनाने के लिए 150 और 250 वर्ग मीटर देने की व्यवस्था है, किंतु बुनियादी ढांचे के अभाव में बसना संभव ही नहीं है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने 2016 में 8 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी, जिसे यह जांचने का निर्देश दिया गया था कि प्रभावित परिवारों के लिए व्यापक एवं प्रभावी पुनर्वास नीति है या नहीं और उसमें क्या सुधार आवश्यक हैं।

समिति को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था कि जिन परिवारों की जमीन या मकान डूब क्षेत्र में आएं उनके पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था हो। समिति को यह भी जांचना था कि परियोजना निर्माण में वन्यजीव, वन, पर्यावरण एवं अन्य स्वीकृतियों की सभी शर्तों का पालन हुआ है या नहीं। अनावश्यक भू अधिग्रहण से बचने का भी निर्देश दिया गया था।

मई 2016 में समिति ने प्रभावित गांवों का दौरा करके निर्देश दिया कि परियोजना चालू होने से पहले पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए। पुनर्वास स्थलों पर सड़क, बिजली, पेयजल आदि मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था करने पर बल दिया गया. वृक्षों की कटाई की भरपाई के लिए प्रतिपूरक वनीकरण करने का निर्देश दिया गया।

भूअधिग्रहण के मामले में परियोजना प्रबंधन ने वादा किया था कि शुरुआती अधिग्रहण में निर्धारित मुआवजा राशि के मुकाबले बाद के अधिग्रहण में राशि में बढ़ोतरी होगी तो पिछले अधिग्रहण के लिए भी बढ़े हुए मुआवजा के हिसाब से अदायगी की जाएगी, किंतु यह मांग भी पूरी नहीं हुई है।

राष्ट्र की प्रगति के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी है। किंतु राष्ट्र के निवासी जिनकी भूमि ली जाति है, उनका पुनर्वास और पुन:स्थापन भी तो राष्ट्र की ही जिम्मेदारी है। आखिर राष्ट्र के विकास का अर्थ उसके नागरिकों की सुरक्षा और सुख समृद्धि भी तो है।

एक परिवार को जब आप सदियों से बसे बसाए परिवेश से उखाड़ कर नए स्थान पर धकेल देते हैं तो उनको बुनियादी सुविधाएं देकर स्थापित करना भी आपकी जिम्मदारी बनती है। इसीलिए अंग्रेजी सरकार के समय के भूअधिग्रहण कानून में नागरिकों के प्रति संवेदना के अभाव के कारण ही संशोधित करके नया कानून 2013 में लाना पड़ा।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी पुनर्वास में कोई ढील न करने की ताकीद की। इसके बाबजूद कोई लापरवाही हो तो समझ से परे है। इसका समाधान होना चाहिए। विस्थापितों के प्रति गैर जिम्मेदार व्यवहार के सबूतों से देश के विकास का इतिहास भरा पड़ा है। हिमाचल तो इस त्रासदी का डंक भाखड़ा, और पौंग जैसे विस्थापन के रूप में अभी तक झेल रहा है।

अधूरे वादों के चक्रव्यूह में फंसे

भरे पूरे समृद्ध समाजों को विस्थापन के समय यह वादा किया गया था कि उनकी स्थिति पहले से भी अच्छी होगी, किंतु वे लोग अभी तक पुनर्वास के अधूरे वादों के जाल में फंसे हुए हैं। कई न्यायालयों के चक्कर में उलझे हैं तो कई मन मार कर अपने भाग्य के सहारे हार कर बैठ गए हैं।

संघर्षों को मानवीय दृष्टि से समर्थन देने की जरूरत

यह स्थिति कहीं और दोहराई नहीं जानी चाहिए। इसलिए विस्थापितों के संघर्षों को मानवीय दृष्टि से देखते हुए समर्थन देना आम समाज की भी जिम्मेदारी बनती है। सरकारों को परियोजना निर्माता इदारों के स्तर पर कोई ढील होने नहीं देनी चाहिए।

यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि कृषि भूमि सतत आय का साधन है। नकद मुआवजा यदि ढंग से खर्च न किया जाए तो फजूल ही समाप्त हो जाता है। किसान पैसे से पैसा कमाने की संस्कृति में नहीं पले बढ़े होते हैं, इस कारण मुआवज़ा मिलने के बाबजूद भी कई परिवार बर्बाद होते देखे गए हैं।

कर्तव्य निभाए हिमाचल सरकार

अत: पुनर्वास में पूरी संवेदना दिखाने की जरूरत होती है। आशा की जाती है कि हिमाचल सरकार और परियोजना निर्माता, रेणुका बांध परियोजना के विस्थापितों के जमीनी स्तर पर व्यवस्थित पुनर्वास के काम को गंभीरता से करते हुए उनकी मांगों को सहानुभूति पूर्वक पूरा करके अपने कर्तव्य का निर्वहन करेंगे।

विकास की प्रक्रिया में उन नागरिकों के साथ कोई भी अन्याय, जिनका त्याग सबसे ज्यादा है, अक्षम्य माना जाना चाहिए।

लेखक- कुलभूषण उपमन्यु

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