गुमनाम नायिका
बिखी बाईः बीकानेरी भुजिया बनाकर दुनिया को दिया एक अनोखा स्वाद
जिसका नुस्खा था, कारोबार में उसके नाम का एक डिब्बा भी नहीं बना
आइए जानिये कैसे हुई भुजिया की शुरुआत, कैसे मिली दुनिया में शोहरत
राहुल तिवारी
जिस नुस्खे पर खड़ी कंपनी की कीमत आज पचासी हजार करोड़ आंकी जाती है, वो नुस्खा एक औरत का था।
उस कारोबार में उसके नाम कभी कोई हिस्सा नहीं आया। न कोई डिब्बा उसके नाम का बना। न कोई दुकान।
बिखी बाई।

और मुमकिन है कि इस वक्त आपकी रसोई में उसी सीख से निकली हुई कोई चीज रखी हो।
बीकानेर। थार के किनारे बसा वो शहर, जिसे पंद्रहवीं सदी में राव बीका ने बसाया था। नाम भी उसी से बना बीका, और नेर। मारवाड़ी में नेर यानी ठिकाना, बसेरा, नगर।
बीका का ठिकाना।

पांच सौ बरस से यह शहर अपने बसाने वाले का नाम माथे पर लिए घूम रहा है।
यह बात याद रखिएगा। इस कहानी के आखिर में इसकी जरूरत पड़ेगी।
1877। महाराजा डूंगर सिंह का राज। महल में मेहमानों के लिए कुछ नया चाहिए था। रसोइयों ने रेगिस्तान में उगने वाली मोठ की दाल पीसी, उसमें बेसन मिलाया, मसाले डाले, और छेदों वाली एक लोहे की प्लेट से उस लोई को दबाकर खौलते तेल में उतार दिया।
जो निकला, उसे नाम मिला डूंगरशाही भुजिया।
महाराजा को यह देखने का वक्त नहीं मिला कि उनकी रसोई से क्या निकल चुका है। दस बरस बाद, बत्तीस की उम्र में वो चले गए।
पर भुजिया रह गई।

महल से निकलकर वो गलियों में आई। गलियों से घरों में। और घरों से एक बाजार में, जिसका नाम ही भुजिया बाजार पड़ गया।
उसी बाजार में अग्रवालों की एक छोटी दुकान थी।
भिखाराम नाम के आदमी ने वहां भुजिया बनाकर बेचनी शुरू की। तराजू में तुलती थी, और पुराने अखबार का पुड़ा बनाकर उसी में दे दी जाती थी। दाम कुछ पैसे किलो। इतने से कि जाड़े में घर का चूल्हा जलता रहे, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

और नुस्खा?
नुस्खा उस घर का था ही नहीं। वो ससुराल से आया था।
बिखी बाई उसी परिवार की बेटी थीं। ब्याह के बाद जब भी वो पीहर आतीं, बच्चों की जिद पर चूल्हा जलता। भुजिया बनाना उन्होंने अपनी सास से सीखा था। मोटी, खुरदरी, दाँतों के नीचे जोर से टूटने वाली।
घर के बच्चे उसके पीछे पागल थे।
इतने कि बुआ के लौट जाने के बाद घर के बड़ों को वही तरीका सीखना पड़ा, ताकि बच्चे चुप रहें।
और उन बच्चों में एक बच्चा ऐसा था, जो सिर्फ खाता नहीं था।
वो चूल्हे के पास बैठ जाता था।
बारह बरस की उम्र में उसने बुआ के साथ बैठकर पूरा हिसाब सीख लिया। कितनी दाल, कितना बेसन, तेल कितना गरम, और हाथ किस रफ्तार से चलेगा। यह कोई सुहाना काम नहीं था कड़ाही के सामने घंटों खड़े रहना, और छींटों से बचते रहना।
घर में उस बच्चे को हल्दीराम कहते थे।

कागज पर नाम था, गंगा बिशन अग्रवाल।
अब वो बात, जिस पर पूरी कहानी घूम जाती है।
बुआ की भुजिया में बेसन ज्यादा था। बेसन से लोई अच्छी बँधती है, तलना आसान रहता है, टूटन कम होती है। पूरा बाजार वही बना रहा था, इसलिए नहीं कि वो बेहतर थी इसलिए कि वो आसान थी।
लड़के को लगा कि यह गलत रास्ता है।
उसका तर्क सीधा था। मोठ इसी रेगिस्तान की दाल है। हर घर में पड़ी रहती है, सस्ती है, और उसका स्वाद बेसन से कहीं गहरा है। अगर भुजिया में मोठ ज्यादा हो, तो वो पेट भरने की चीज नहीं रहेगी। वो जबान पर चढ़ने वाली चीज बन जाएगी।
घर के बड़े राजी नहीं हुए।
तो उसने वही किया जो हर जिद्दी आदमी करता है। अपनी वाली अलग बनाई, और उसी दुकान पर, घर की मोटी भुजिया के ठीक बगल में रख दी।
पतली। कुरकुरी। ज्यादा तीखी।
हफ्ता भी पूरा नहीं हुआ था कि मांग पूरी करना मुश्किल हो गया।
1937 में उसने अपनी अलग दुकान खोल ली।
और फिर उसने वो दो काम किए, जो उस जमाने के किसी हलवाई ने नहीं किए थे।
पहला बाकी सब दो पैसे किलो बेच रहे थे। उसने पांच मांगे। उसे सस्ते की होड़ में नहीं उतरना था। उसे यह साबित करना था कि यह अलग चीज है, और अलग चीज का दाम अलग होता है।
दूसरा काम ज्यादा चालाक था।
उसने अपनी भुजिया को एक नाम दिया-डूंगर सेव। उसी महाराजा के नाम पर, जो साठ बरस पहले गुजर चुके थे।
एक दुकानदार ने एक मरे हुए राजा का नाम उधार लेकर अपनी भुजिया को शाही बना दिया।
ब्रांडिंग शब्द तब उस बाजार में शायद किसी ने कहा भी नहीं था। पर काम उसने ठीक वही कर दिया था।
एक बात और, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
बरसों तक अखबारों में यही छपता रहा कि भुजिया का यह कारोबार परिवार के सबसे बुजुर्ग तनसुखदास ने शुरू किया था। पवित्रा कुमार ने जब इस परिवार पर किताब लिखी, तो उन्होंने परिवार के सबसे बुजुर्ग जीवित पोते से यही सवाल पूछा।
जवाब मिला कि तनसुखदास ने कभी भुजिया बनाई ही नहीं।
यानी अस्सी बरस से जिस आदमी को श्रेय दिया जा रहा था, उसका इस नुस्खे से कोई लेना-देना नहीं था।
और जिसका था, उसका नाम किसी अखबार में नहीं छपा।
क्योंकि वो सिर्फ एक बुआ थी, जो त्योहारों पर मायके आती थी।
अब उस बात पर लौटिए जो मैंने शुरू में कही थी।
बीका ने शहर बसाया, और शहर के नाम में उसका नाम बैठ गया।
डूंगर सिंह ने भुजिया बनवाई, और भुजिया के नाम में उसका नाम बैठ गया।
जिस औरत के हाथ से वो नुस्खा इस घर में आया, उसके नाम पर एक तसला भी नहीं है।
औरतों के नाम पर अकसर कुछ नहीं होता।
औरतें अकसर नहीं रखतीं।
आगे की कहानी तेज है।

पचास के दशक में हल्दीराम एक शादी में कलकत्ता आए। शहर देखा, भीड़ देखी, और लौटकर बेटों के साथ यहीं दुकान खोल दी। कंपनी की पहली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट राजस्थान में नहीं, इसी शहर में लगी।
बीकानेर की भुजिया ने अपनी पहली फैक्ट्री बंगाल में देखी।
फिर तीसरी पीढ़ी आई, और उसने नक्शा बदल दिया।
कंपनी अपने बारे में खुद लिखती है कि 1970 में पोते शिव किशन अग्रवाल भुजिया को बीकानेर की सीमा से बाहर ले जाने की जिद में नागपुर जा बसे। वहाँ महाराष्ट्र में तब भुजिया की कोई मांग नहीं थी। दूसरे भाई दिल्ली गए, चांदनी चौक में दुकान खोली।
एक ही घर के लोग, तीन शहरों में, एक ही नाम के साथ।
अस्सी के दशक तक हल्दीराम हिंदुस्तान का नाम बन चुका था।
गंगा बिशन अग्रवाल 1985 में गुजरे। दिल्ली वाली दुकान को खुले तब मुश्किल से दो बरस हुए थे। जो असली विस्फोट होना था, वो उनके जाने के बाद हुआ।
1993 में कंपनी ने पहली बार माल बाहर भेजा।
पहला मुल्क अमरीका था।
इसलिए नहीं कि अमरीकियों को भुजिया पसंद थी। इसलिए कि वहां बहुत सारे हिंदुस्तानी रहते थे, और उनके पास घर लौटने का कोई रास्ता नहीं था सिवाय एक डिब्बे के।
जो चीज बीकानेर के महल में मेहमानों के लिए बनी थी, वो अब उन लोगों के काम आ रही थी जो खुद मेहमान बनकर किसी और मुल्क में रह रहे थे।
फिर 1996 में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अपनी भुजिया उतारी। नाम रखा लहर। पैसा उनके पास हल्दीराम से कई गुना ज्यादा था।
उससे पहले वो कंपनी सौदे की बात लेकर भी आई थी।
दिल्ली वाले हिस्से के मुखिया मनोहरलाल अग्रवाल ने मना कर दिया। किताब में उनका कहना दर्ज है कि उन्होंने अपना ब्रांड और अपना सपना छोड़ने से इनकार कर दिया।
लहर बीस बरस चली, और चुपचाप बंद हो गई।
अब आज की तस्वीर देखिए।
दिल्ली और नागपुर वाले हिस्से एक कंपनी में मिल चुके हैं। पिछले बरस सिंगापुर की सरकारी निवेश कंपनी टेमासेक ने उसमें करीब दस फीसदी हिस्सा खरीदा, और कीमत दस अरब डॉलर आँकी गई। अबू धाबी और न्यूयॉर्क के निवेशक भी पीछे-पीछे आए।
एक भुजिया की दुकान की कीमत अब उस रकम में गिनी जाती है, जिसमें मुल्क गिने जाते हैं।
और इसी महीने, इंग्लैंड में, कंपनी की यूरोप वाली शाखा ने गणेश चतुर्थी के लिए मोदक का एक खास डिब्बा उतारा है। तीन तरह के काजू, नारियल और मोतीचूर।
रेगिस्तान के एक शहर की रसोई से निकला हुनर, अब ब्रिटेन की दुकानों में गणपति के उत्सव की मिठाई बनकर बिक रहा है।
पर बीकानेर में क्या बदला?
बहुत कम।
भुजिया बाजार आज भी है। छोटी-छोटी इकाइयां आज भी सुबह चार बजे चूल्हा जलाती हैं। लोई आज भी झर्रा नाम की उसी छेदों वाली प्लेट से दबाई जाती है। बनाने वाले कहते हैं कि यह स्वाद कहीं और बन ही नहीं सकता क्योंकि इसमें बीकानेर का खारा पानी है, यहां की लाल मिर्च है, और यहां की सूखी हवा है।
सामान बाहर भेज दीजिए, स्वाद साथ नहीं जाएगा।
कवि अशोक वाजपेयी ने इस शहर के बारे में कहा है कि आधा शहर भुजिया बनाता है और आधा उसे खाता है।
और एक पोता ऐसा भी था, जो कहीं गया ही नहीं।
बाकी भाई दिल्ली, नागपुर और कलकत्ता चले गए। शिवरतन अग्रवाल बीकानेर में ही रुक गए।
अस्सी के दशक के मध्य में उन्होंने वहीं से अपना अलग कारोबार खड़ा किया। नाम रखा शिवदीप अपना नाम और अपने बेटे दीपक का नाम, दोनों जोड़कर।
सात बरस बाद उन्होंने उस कारोबार को दूसरा नाम दिया।
बीकाजी।
यानी बीका, और आदर के लिए जी।
उसी राव बीका का नाम, जो पांच सौ बरस से इस शहर के माथे पर लिखा है।
आज वो कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध है। और कंपनी अपने ही दस्तावेजों में लिखती है कि राजस्थान में करीब पाँच हजार औरतें उसके लिए हाथ से पापड़ बनाती हैं।
गूंथा हुआ आटा उनके घर पहुंचता है। अगली सुबह सूखे पापड़ वापस आते हैं।
एक नुस्खा जो औरतों के हाथ से निकला था, आखिरकार औरतों के हाथ में लौट आया।
यह कहानी दस अरब डॉलर की नहीं है।
यह उस नुस्खे की कहानी है जिसे किसी ने ताले में नहीं रखा।
अगर बिखी बाई अपनी सास से सीखी वो चीज सीने से लगाकर रखतीं, तो आज न भुजिया बाजार होता, न वो हजारों औरतें, न किसी बीकानेरी लड़के के पास कोई ऐसी चीज होती जिसे वो दुनिया के सामने रख पाता। नुस्खा उन्हीं के साथ चला जाता।
उन्होंने वो बच्चों को खिला दिया।
और एक बच्चे ने उसे बदल दिया।
जो नुस्खा बांट दिया गया, वही बचा। जो सीने से लगाकर रखा गया, वो चूल्हे के साथ बुझ गया।
अब मेरी बात, दो लाइनों में।
मैं अठारह साल से अखबार में हूं, और मुझे यह जानकर अजीब सी शांति मिली कि सौ बरस पहले बीकानेर में मेरे पेशे का सबसे बड़ा काम शायद यही था कि अखबार का एक पन्ना पुड़ा बने, और उसमें किसी के घर की भुजिया जाए।
और फिर वो कंपनी अपनी पहली फैक्ट्री लेकर इसी कलकत्ता आई, जिस शहर में बैठकर मैं यह लिख रहा हूं।
तीन काम, जो उस लड़के ने असल में किए, और जिनके लिए यह पोस्ट सहेजने लायक है।
1. घर में जो चीज सबसे मामूली मानी जा रही थी, उसी को उसने बाजार की सबसे खास चीज माना।
2. उसने सस्ते की होड़ में उतरने से इनकार कर दिया, और ढाई गुना दाम पर अड़ा रहा।
3. जब एक बहुराष्ट्रीय दिग्गज खरीदने आया, तो उस घर ने अपना नाम बेचने से मना कर दिया।
यह कहानी उस इंसान तक पहुंचनी चाहिए, जो अपने घर के किसी पुराने हुनर को छोटा समझकर छोड़ने की तैयारी में है। और उस इंसान तक भी, जो सात समंदर पार बैठा है, और जिसके किचन कैबिनेट में हिंदुस्तान सिर्फ एक डिब्बे की शक्ल में बचा है।
इस पन्ने पर कोई किस्सा सुनी-सुनाई पर नहीं छपता। हर नाम, हर तारीख और हर बड़ा मोड़ दस्तावेजों, पारिवारिक बयानों और पुराने रिकार्ड से मिलाकर देखा गया है।
और मुझे एक बात बताइए।
आपके घर में एक नुस्खा जरूर होगा। कोई अचार, कोई मसाला, कोई मिठाई, जो सिर्फ आपके घर में वैसी बनती है।
वो किसका है?
