धन्यवाद बाबूजी
ओमप्रकाश तिवारी
बाबूजी
आप किसान के यहां क्यों पैदा हुए?
हो भी गए थे तो
पढ़ाई क्यो नहीं किए?
शहर क्यों नहीं गए?
कोई नौकरी क्यों नहीं किए?
ये सब नहीं किए तो भी ठीक था
पर थोड़ी चालाकी क्यों नहीं सीखे?
सीखे होते तो थोड़ा
हमें भी सिखा देते
ता उम्र सिखाते रहे
बड़ों का आदर करना
कमजोर की मदद करना
हर इंसान की कद्र करना
मिलजुकर रहना
किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना
खिलाते रहे चींटियों को आटा
आवारा चितकबरे कुत्ते
और झबरी गाय को रोटी
अपने निवाले से बचाकर
दो रोटी कम खाकर
दुख दूर होंगे सुख आएंगे
इसी उम्मीद में करते रहे
सुबह शाम गायत्री मंत्र का जाप
हर शनिवार जाते रहे बनवारीनाथ
शंकर भगवान को जल चढ़ाने
हर मंगलवार जाते रहे बिजेठुआ
हनुमान जी के दर्शन करने
हर पूर्णमासी सुनते रहे
सत्यनारायण की कथा
नीम और पीपल के पेड़ में
हर रोज जल चढ़ाते रहे
खाने से पहले भगवान को
भोग भी लगाते रहे
फिर भी भूखों रहने की नौबत बनी रही
और देवी देवताओं पर आपकी आस्था।
आप इतना करके भी नहीं हारे
हम देखकर ही हो गए नास्तिक
लेकिन आपके संस्कार नहीं भूले
इंसानों में खोजते रहे भगवान
दूसरों की मां बेटियों में
नजर आती रहीं मां भगवती
आदमियों वाली चालाकी
हम नहीं सीख पाए बाबू जी।
यही वजह है सफल नहीं हो पाए
शहर में रहे पर शहरी नहीं हो पाए
हमेशा आड़े आते रहे आपके संस्कार
और हम देहती ही बने रहे
मेरे बच्चों में शायद आ जाएं
शहरी चालाकियां।
हालांकि इसके लक्षण दिखते नहीं
इसके लिए आपको
धन्यवाद बाबूजी!