कपिल मुनि, कलायत मंडी और कृष्ण कुमार

(29-12-1983-10-02-2014)

स्मरण:

कपिल मुनि, कलायत मंडी और कृष्ण कुमार

ओमसिंह अशफ़ाक

 

कुछ दिनों पहले की घटना है कि मेरी एक पुरानी डायरी में रखे हुए  लेखकों, पाठकों एवं मित्रों के कुछ पत्र मुझे मिले, जिनको मैं गुम हो गए मानकर दुखी भी था। उन्हीं में एक 10 साल पुराना पत्र कलायत मंडी से आया था और प्रेषक का नाम था-कृष्ण कुमार भारतीय।

पत्र लेखक की लिखाई सुंदर और आकर्षक थी और बिना लाईनों के पोस्ट कार्ड पर भी मजमून एकदम सीधी लाईनों में लिखा गया था।

कलायत मंडी हरियाणा प्रदेश में कैथल से कोई 20 किलोमीटर की दूरी पर होगी और वहां कुरुक्षेत्र-नरवाना रेल लाईन का छोटा सा स्टेशन भी पड़ता है।

कलायत एक छोटा कस्बा है और पहले-पहल वहां मेरा जाना सन् 1970 में हुआ था। जब मैंने स्नातक की परीक्षा दी थी।

गर्मियों की छुट्टियां हो गई थी। मुझसे बड़ा मेरा भाई (अब स्वर्गीय) प्रताप सिंह, उस इलाके में कृषि विकास अधिकारी की नौकरी पर तैनात था।

उसने कलायत कस्बे में रैबारी (कहीं रहबारी भी लिखा होता है) मुहल्ले में अपने रहन-सहन के लिए मकान किराए पर ले रखा था।

कैथल-नरवाना राज्य मार्ग की उत्तरी दिशा में सड़क और कस्बे के बीच एक बड़ा सा तालाब भी है।

वहां के लोगों की मान्यता है कि कभी वहां उस तालाब के किनारे किसी वक्त में कपिल ऋषि ने तपस्या की थी। इसलिए इस कस्बे का नाम पहले कपिलस्थली और बाद में बदलते बदलते कलायत हो गया था। अब इस मान्यता के पीछे कितनी तथ्यात्मक सच्चाई है और कितनी कल्पना, ये तो पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के प्रयासों से ही पता लग सकता है।

परन्तु ये तथ्य अपनी जगह निर्विवाद है कि कलायत अभी भी एक छोटा कस्बा ही है और उसका जिला मुख्यालय कैथल है। फिर भी इससे कलायत का महत्त्व कम नहीं हो जाता, बल्कि अब तो वह तालाब और कस्बा दोनों और भी सुंदर बन गए हैं। हाल की दो घटनाओं ने मेरी नजर में उस कस्बे का महत्व और अधिक बढ़ा दिया है।

एक घटना सन् 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान घटी थी, जब दिल्ली पुलिस ने अन्ना को गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल में बंद कर दिया था।

तब अखबारों की खबरों से हमें पता चला था कि अन्ना के साथ जेल जाने वाले 5-7 लोगों में कलायत का एक नौजवान भी शामिल है और वह प्रजापति (कुम्हार) समुदाय से है। अफ़सोस है कि मैं उस गौरवशाली नौजवान का नाम इस वक्त याद नहीं कर पा रहा हूं।

दूसरी घटना साल (2014) की है, जो सिर्फ़ घटना नहीं, बल्कि बहुत बड़ी दुर्घटना है जिसको हम ट्रेजिडी कह सकते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे दुख इस बात का भी है कि माह फरवरी में हुई इस ट्रेजिडी की जानकारी मुझे हाल ही में मिली है।

जिस कृष्ण कुमार के दस साल पुराने ख़त का जिक्र मैंने ऊपर किया है, तब वह (2004 में) बी.कॉम. का छात्र था। वह मेधावी था। मैट्रिक(10वीं कक्षा) और  प्लस-2(12वीं कक्षा) में उसने क्रमशः 70 और 67 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। परन्तु बी. कॉम की पढ़ाई उसे रास नहीं आई, क्योंकि वह साहित्यिक अभिरुचि वाला नौजवान था। इसलिए बी. कॉम. में 53 प्रतिशत अंक लेकर पिछड़ गया और एम.ए. में उसने हिन्दी साहित्य की पढ़ाई करने का निश्चय किया।

उसका ये फैसला सही साबित हुआ और एम.ए. (हिन्दी) में 67 प्रतिशत अंक लेकर उसने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में दूसरी पॉजीशन प्राप्त की थी। तदोपरांत कृष्ण कुमार ने ‘इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कहानी : दृष्टि और सरोकार’ पर रिसर्च की। 28 फरवरी 2014 को पी.एच.डी. उपाधि अवार्ड होते ही वह डॉ० कृष्ण कुमार हो गए थे।

लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हमने 10 फरवरी 2014 को एक सड़क दुर्घटना में उस प्रखर बुद्धि नौजवान साहित्यकार को मात्र 30 वर्ष की आयु में खो दिया है।

जिसके विभिन्न राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में 40 से अधिक पुस्तक समीक्षाएं तथा आलेख प्रकाशित हो चुके थे।

वह मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘साक्षात्कार’, राजस्थान साहित्य अकादमी की ‘मधुमती’ में अमूमन लिखता था। दैनिक भास्कर, दैनिक ट्रिब्यून व हरिभूमि आदि समाचार पत्रों के लिए पुस्तक समीक्षाओं का नियमित लेखन करता था।

वेबसाइट्स पर भी वह ‘सृजन गाथा’, प्रवासी दुनिया, वेब दुनिया आदि में पुस्तक समीक्षाओं का नियमित लेखन करता था। राष्ट्र स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में भी उसके लेख, कविताएं, व्यंग्य लेख आदि छपते रहते थे।

कृष्ण कुमार के भीतर एक बड़ा साहित्यकार, चिंतक और बड़ा पत्रकार बनने की सभी संभावनाएं मौजूद थी। सरबजीत की तरह ही कृष्ण कुमार ने भी बड़ी तेजी से अपनी कला का विकास किया था, जैसा कि पाठक अगले कुछ पृष्ठों पर स्वयं देख सकेंगे।

लेकिन इससे पहले कृष्ण कुमार के 10 साल पुराने पोस्ट कार्ड की चन्द लाइनें जो उसने मुझे लिखी थीं। जो इस बात की साक्षी हैं कि उसे उस वक्त भी साहित्य से विशेष अनुराग था। और उस अवस्था में ही वह स्वयं का कविता संग्रह प्रकाशित करवाने की तैयारी कर रहा था। जबकि उस समय वह महज बी. कॉम. की पढ़ाई कर रहा था। खत का मजमून कुछ इस तरह था :

कलायत मंडी 18.06 2012

आदरणीय ओम सिंह जी,

सादर सप्रेम नमस्कार।

आपकी प्रकाशित कृति ‘भूकंप में बच्चे’ पढ़ने को मिली क्योंकि मैं भी कविता लेखन के प्रति रुचि रखता हूं और अभी कुछ समय बाद एक कविता संग्रह प्रकाशित करवाना चाहता हूं। मैं आपके संग्रह की प्रत्येक कविता को तन्मयता से पढ़ने के बाद में आपको इस सफलता पर शुभकामनाएं प्रेषित के बिना भला कैसे रह सकता हूं। आपकी जो कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगीं वो हैं-  वर्षा,लानत है, इस युग में, चीकू के नाम,.. खैर छोड़िए सभी कविताओं ने मुझे प्रभावित किया है। मैं चाहता हूं कि यह संग्रह मेरे पास भी हो तो अच्छा होगा। यदि आप चाहे तो प्रेषित करें। कविता लेखन में भी मैं समय-समय पर आपका मार्गदर्शन चाहता हूं। आपका सहयोग भी बड़े भाई के नाते मुझे मिलता रहेगा। इसी कामना के साथ

मन-मंदिर में नमन।

आपका शुभचिंतक,

कृष्ण कुमार भारतीय

कलायत मंडी।

कृष्ण कुमार ने ‘मास एंड मीडिया कम्यूनिकेशन’ में भी डिप्लोमा ले लिया था। और 2013-14 के शिक्षण सत्र में उसने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान में सहायक प्रोफेसर (हिन्दी) के तौर पर यू.जी. एवं पी.जी. कक्षाओं को पढ़ाया भी था। इसलिए वह साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता में रुचि रखता था और एक अवसर पर इसे पेशे के तौर पर अपनाने की भी सोचने लगा था।

लेकिन 1 जनवरी 2014 से 10 फरवरी 2014 तक आर.के.एस. डी. कालेज, कैथल में बतौर सहायक प्रोफैसर (गेस्ट फैकल्टी) पढ़ा रहा था। जिला अम्बाला में नारायणगढ़ स्थित राजकीय महाविद्यालय में भी सत्र 2013 में अध्यापन किया था।

उनकी पत्नी प्रियंका अग्रवाल की नियुक्ति स्थायी पद पर डी.ए.वी. कालेज, अम्बाला में प्राणी-शास्त्र विभाग में हो गई थी। अपने एक साल के बेटे कुशल अग्रवाल के साथ ये जोड़ी खुशी मना रही थी कि उनके कैरियर की गाड़ी अब पटरी पर आ जाएगी। तभी हंसते-खेलते इस युगल पर घोर विपती आन पड़ी। लेकिन सांत्वना के सिवा क्या किया जा सकता है। प्रियंका को भी अपने बेटे के साथ इन्हीं परिस्थितियों में जीना सीखना होगा।

कहते हैं कि बड़े से बड़ा गम भूलने में इंसान को छह महीने का समय लगता है।

लेकिन क्या अपने प्रियजनों को विशेषकर जिनके साथ हमने सारा जीवन बिताने के सपने संजोए हैं, क्या कभी भूला जा सकता है। शायद नहीं, शायद हाँ, निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता।

कृष्ण कुमार अपने लेखन में तमाम समसामयिक विषयों पर कलम चलाते थे।

आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, आधुनिकता, स्वी-विमर्श लिव इन रिलेशनशिप, वृद्धावस्था, बाज़ारवाद से वेब पत्रकारिता तक पर उन्होंने लिखा और स्तरीय लिखा :

‘वर्तमान हिन्दी कहानी आतंकवाद के सभी पक्षों पर तटस्थता से विचार-विमर्श करते हुए आतंकवाद के मनोविज्ञान तथा उसकी रणनीति को प्रकाश में लाती है।

“इन कहानियों में यह स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है कि आतंकवाद तथा आतंकवादी घटनाओं के पीछे कुछ संकीर्ण मानसिकता के धार्मिक कट्टरपंथी और चालाक स्वार्थी राजनेताओं का हाथ होता है।

“आतंक का कोई मूल्य और ईमान नहीं होता। उसका लक्ष्य जनसाधारण में दहशत और भय का माहौल निर्मित कर अपने घिनौने उद्देश्यों की सिद्धी तक सीमित है।”

भूमंडलीकरण के दौर में बढ़ती साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के उभार को भी वह समझने का प्रयास करते हैं। ‘मौजूदा दौर भूमंडलीकरण तथा वैश्वीकरण का दौर है।

“इक्कीसवीं सदी में भूमंडलीकरण की अवधारणा के चलते एक ऐसे ‘वैश्विक ग्राम’ की परिकल्पना की जा रही है जहां सम्पूर्ण विश्व के सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक तथा सांस्कृतिक हित सांझा होंगे।

“परन्तु इस सबके बावजूद जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद तथा सम्प्रदायवाद की जड़ें उत्तरोत्तर गहरी होती जा रही हैं।

“वस्तुतः आज की मूल्यविहीन राजनीति विभिन्न वर्ग के लोगों में विद्वेष फैलाकर अपना उल्लू सीधा करने के उद्देश्य से ऐसा कर रही है।

“साम्प्रदायिकता का जन्म ही क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए हुआ था।

“हिन्दू-मुस्लिम एकता अंग्रेजी साम्राज्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिससे पार पाना अंग्रेजी शासन के लिए असंभव था।

“ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए अपने हित तथा अस्तित्व को सुरक्षित बनाए रखने के लिए इन दोनों वर्गों को बांटना अनिवार्य बन चुका था।

“चालाक अंग्रेजों ने हिन्दु-मुस्लिम विवाद पैदा करके न केवल अपनी कुत्सित योजनाओं की पूर्ति की, अपितु मानवीय सभ्यता को एक ऐसे कोढ़ से ग्रस्त कर दिया जो आज तक लाइलाज है।”

वह परम्परा और आधुनिकता के द्वंद्वपूर्ण संबंध को भी समझने की कोशिश करते हैं :

‘इक्कीसवीं सदी का भारतीय समाज एक ऐसे युग में जी रहा है, जहां पर वह एक तरफ अपने परम्परागत मूल्यों और आदर्शों को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम की चकाचौंध उसे आकर्षित कर रही है।

‘सांस्कृतिक संक्रमण के इस दौर में भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने हमारे जीवन मूल्यों तथा जीवनादशा  को बहुत अधिक प्रभावित किया है।

‘नैतिकता की परिभाषाओं में स्खलन तथा निरंतर हो रहे परिवर्तन के कारण भारतीय जनमानस, परम्परा और आधुनिकता के अन्तद्वंद्व में फंसा है।”

स्त्री-विमर्श को लेकर लिखी गई हिन्दी कहानियों के विषय में वह टिप्पणी करते हैं:

‘वर्तमान हिन्दी कहानी में स्त्री-विमर्श के अंतर्गत नारी जीवन के हुए-अनछुए अनेक पहलू पूरी ईमानदारी से चित्रित हुए हैं।

‘संकोच तथा भय से मुक्त हिन्दी कथाकारों ने स्त्री जीवन सम्बन्धी अन्तः बाह्य पक्षों का बेबाक रेखांकन किया है।

‘इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कहानी एक तरफ जहां पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष की सामंती मानसिकता को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में उघाड़ती है। ‘वहीं स्त्री-मनोविज्ञान की भी गहराई से पड़ताल करती है।

‘इस सारे उपक्रम में एक ओर जहां स्त्री अपने हक के प्रति जागरूक हुई, उसने अपने अस्तित्व तथा गरिमा को स्थापित किया है।

‘वहीं अनेक प्रसंगों में उसकी अति जागरूकता, उच्छृंखलता के रूप में प्रस्फुटित हुई और वह अति स्वातंत्र्य के उत्साह में उन्मुक्तता की ओर बढ़ गई।

‘जहां उसका शोषण एक नई शक्ल में होने लगा। इस प्रकार वर्तमान हिन्दी कहानी ने स्त्री अधिकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

‘परन्तु स्त्री आंदोलन में कहीं-कहीं भटकाव की स्थिति ने कई मुश्किलें भी पैदा की हैं, जिससे स्त्री-विमर्श की उपलब्धियां प्रभावित हुई हैं।”

अपने एक लेख से वह लिव-इन रिलेशनशिप बारे बड़े स्पष्ट ढंग से पाठक को समझाते हैं :

‘लिव-इन-रिलेशनशिप से अभिप्राय उस प्रणाली से है, जिसमें स्त्री-पुरुष बिना किसी कानूनी अथवा सामाजिक रीति के, केवल समझौते के आधार पर एक-दूसरे के साथ रहते हैं। ‘लिव-इन रिलेशनशिप पर किसी प्रकार के बंधन न होने के बावजूद स्त्री-पुरुष के बीच पति-पत्नी जैसे सम्बन्ध होते हैं अर्थात् इनका शारीरिक सम्बन्ध भी होता है।

‘परन्तु वे पूरी तरह से स्वतंत्र होते हैं। वस्तुतः इस सम्बन्ध में दोनों यह मानते हैं कि वे पूर्ण रूप से एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हैं और स्वतंत्र तथा पढ़े-लिखे लोग हैं। ‘अतः विवाह जैसी औपचारिक रस्म की आवश्यकता नहीं है।”

बाजारवाद के बारे में उनकी टिप्पणी एकदम सटीक और संक्षिप्त है:

‘वस्तुतः भूमंडलीकरण, जिस वैश्विक सांस्कृतिक समन्वय के मुखौटे में व्यवसायिक तथा व्यापारिक हितों की पूर्ति और प्रसार के लक्ष्य के साथ हमारे मनो-मस्तिष्क को सम्मोहित कर रहा है…

‘…उसने मानव जाति के समक्ष अस्तित्व के गहरे प्रश्नों को जन्म दिया है।

‘आज हमारे सामने बाजार का जो रूप है. उसने हमारी सम्पूर्ण मानवीय चेतना और संवेदना को ध्वस्त कर दिया है।

‘आत्मकेंद्रित तथा स्वार्थी होकर अधिक से अधिक सुख-सुविधाओं का मालिक होना ही आज के मानव का एकमात्र लक्ष्य बन चुका है।*

वेबमीडिया के आगमन का परिचय कराते हुए कृष्ण कुमार उसके संभावित दुरुपयोग की आशंका का भी स्पष्टीकरण करते हैं।

यहां पत्रकारिता में उनकी दिलचस्पी का भी पता चलता है:

‘बीसवीं सदी के अंतिम दशक के मध्य में भारत में इंटरनेट का आगमन हमारे लिए बिल्कुल नई बात थी।

‘चिट्ठियों में अपने मनोद्‌गारों को प्रकट करने वाले समाज के लिए ई-मेल जैसी त्वरित डाक व्यवस्था अनोखी थी।

‘अपने प्रारंभिक दौर में इंटरनेट बेशक केवल शिक्षित और अमीर वर्गों की ही पहुंच में रहा, क्योंकि यह एक महंगा साधन था।

‘और इसके लिए कम्पयूटर की बेसिक जानकारी अनिवार्य थी। परन्तु आज कम्पयूटर साक्षरता में बढ़ोतरी हुई है और इंटरनेट को कौड़ियों के भाव प्रयोग करने की आजादी है।

‘एक साधारण पढ़े-लिखे और अनपढ़ व्यक्ति के लिए भी इंटरनेट को उपयोग करना बहुत कठिन काम नहीं है।

‘धीरे-धीरे इंटरनेट पर सूचना, मनोरंजन और संवाद को स्थितियों ने वेबमीडिया को आधुनिक जनसंचार माध्यमों में सबसे त्वरित गति से कार्य करने वाला मीडिया बना दिया।

‘संचार व सम्प्रेषण के नए साधनों के एक समुच्चय के रूप में वेबमीडिया पर त्वरित लेखन, त्वरित प्रकाशन और त्वरित फीडबैक की सुविधा उपलब्ध है।”

‘मीडिया विशेषज्ञों द्वारा भविष्य की पत्रकारिता के रूप में वेबमीडिया की बढ़ती लोकप्रियता के संबंध में चिंताएं जताई जा रही हैं।

‘समाचार पत्रों तथा टी.वी. चैनलों के माध्यम से जो अश्लीलता और कामुकता अब तक परोसी जाती रही है, उसके सारे रिकार्ड वेबमीडिया मात्र एक सप्ताह में तोड़ सकता है।

‘ये वाजिब चिंताएं हैं और प्रासंगिक भी, परन्तु रेडियो को छोड़ कर जनसंचार के लगभग सभी माध्यमों की इस संदर्भ में भूमिका नकारात्मक ही रही है।

‘फिर भी समाचार पत्र और टी.वी. चैनल सामूहिक रूप से पूरे परिवार द्वारा प्रयोग में लाए जाते हैं, जिससे सामाजिक वातावरण प्रदूषित होता है।

‘जबकि वेबमीडिया अधिकांशतः व्यक्तिगत तथा निजी प्रयोग में आता है, दूसरी बात पोर्न साइट्स को प्रतिबंधित भी किया जा सकता है।

‘फिर इस तर्क का दो टूक जवाब ये भी है कि यह प्रयोगकर्ताओं की मानसिकता पर निर्भर करता है कि वे किसी माध्यम का सदुपयोग या दुरुपयोग करते हैं।”

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  1. वर्तमान हिन्दी कहानी और आतंकवाद ‘कश्फ’ वर्ष-11, पंजी-2 अंक-1 जून 2012
  2. 21वीं सदी की हिन्दी कहानी और साम्प्रदायिकता, कुरुक्षेत्र वि.वि. रिसर्च जरनल Vol -XLIII :2009
  3. परम्परा और आधुनिकता के अन्तद्वंद्व, संचार बुलेटिन ङ्कमद्य-२ अंक 4-5 अक्तूबर-मार्च-2012
  4. हिन्दी कहानी में स्त्री विमर्श उपलब्धियां और सीमाएं, पंचशील शोध समीक्षा, जयपुर (राज.) अप्रैल-जून 2010, अंक-8 वर्ष-2
  5. वही अंक-15, वर्ष-4, जन-मार्च 2012 (वर्तमान हिन्दी कहानी और लिव-इन रिलेशनशिप)
  6. वही 21वीं सदी की हिन्दी कहानी और बाजारवाद अंक-19, वर्ष-5, जन-मार्च-2013
  7. वेबमीडिया की सामाजिक न्याय में भूमिका, वेब मीडिया और हिन्दी का वैश्विक परिदृश्य, के.एम. अग्रवाल महाविद्यालय,    कल्याण (प.) महाराष्ट्र, पृ. 211, प्रथम सं. 2013
  1. वहीं, पृ. 218

लेखक – ओमसिंह अशफ़ाक

 

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