औद्योगीकरण के साये में सेहत

औद्योगीकरण के साये में सेहत

कुलभूषण उपमन्यु

 

वर्तमान सभ्यता मूलतः औद्योगिक सभ्यता है। दैनिक जरूरतों के सामान से लेकर सब तरह के ऊर्जा, सुरक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्माण आदि से संबंधित सामान और उपकरण बड़े पैमाने पर उद्योगों में ही बनाना संभव है। इसलिए दुनिया भर में उद्योगों की स्थापना की होड़ लगी रहती है। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएं औद्योगीकरण पर ही टिकी हुई हैं, इसलिए कोई भी उद्योगों से पैदा होने वाली पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय समस्याओं पर बोलना नहीं चाहता, लेकिन हर सहनशीलता की भी एक सीमा है। उद्योग एक ओर रोजगार देकर आम आदमी को राहत देते हैं तो दूसरी ओर हवा, पानी, मिटटी को प्रदूषित करके जीवन यापन की स्थितियों को बीमारियों के भंवर में फंसा देते हैं। पर्यावरण को पंहुचने वाले नुकसान के आधार पर उद्योगों को शून्य से 100 के स्केल से मापा जाता है। 60 सूचकांक से ज्यादा प्रदूषक उद्योगों को लाल सूची में डाला गया है। सीमेंट, खनिज तेल रिफाइनरी, बड़े स्तर का खनन, ताप विद्युत परियोजनाएं और रासायनिक उत्पादन इकाइयों को इस श्रेणी में रखा गया है। इस श्रेणी के लिए पर्यावरणीय कानूनों के अंतर्गत उद्योग स्थापना और चालू करने के लिए स्वीकृति के सख्त प्रावधान हैं।

दूसरी श्रेणी संतरी है। इसमें 41 से 59 प्रदूषण सूचकांक तक के उद्योग आते हैं। इसमें कम प्रदूषक गतिविधि वाले उद्योग आते हैं, जैसे खाद्य प्रसंस्करण, स्टोन क्रशर, ईंट भठ्ठे और मध्यम दर्जे के उत्पादन. इनके लिए सामान्य स्थापना और प्रचालन स्वीकृतियां लेनी होती हैं। तीसरी श्रेणी हरित श्रेणी कहलाती है। इसमें 21 से 40 तक प्रदूषण सूचकांक वाले उद्योग आते हैं। इसमें आरा मशीनें, पारंपरिक शिल्प, और छोटे मसला पिसाई इकाइयां आती हैं। इनके लिए स्वीकृतियां तो चाहिए होती हैं, किंतु लंबे समय तक स्वीकृति प्रदान की जाती है।

चौथी श्रेणी श्वेत श्रेणी है। 0 से 20 प्रदूषण सूचकांक वाले उद्योग इसमें आते हैं। इसमें सौर ऊर्जा प्लांट, वायु ऊर्जा प्लांट और बाईसिकल असेंबली जैसे उद्योग आते हैं। इनके लिए स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं है, केवल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सूचना मात्र देनी होती है। हिमाचल में बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़ में सबसे ज्यादा उद्योग स्थापित हैं। करीब 3000 इकाइयां यहां स्थापित हैं, जिनमें से 380 लाल श्रेणी की, 1400 संतरी श्रेणी की हैं। इनमे से 500 के लगभग इकाइयां जहरीली गैसें वातावरण में छोड़ रही हैं, कुछ के पास तो प्रचालन स्वीकृतियां भी नहीं हैं। अधिकांश अपशिष्ट उपचार संयंत्र कम क्षमता के हैं या अकुशल हैं। शिवालिक अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट भी मनमर्जी से काम करता है। कई उद्योगों पर प्रदूषित पदार्थों को जमीन में पंप करके डाल देने का आरोप है।

यह राज्य के अंदर और पड़ोसी राज्यों में भी स्वास्थ्य से बड़े खिलवाड़ का मामला है। अत: पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह औद्योगीकरण के अंध विरोध का भी मामला नहीं है, किंतु टिकाऊ और जन अभिमुख विकास के लिए औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण होना ही चाहिए, वरना विकास का अर्थ ही अनर्थ में बदल जाता है। यहां से प्रदूषित वायु और जल पंजाब को भी प्रभावित कर रहा है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच के बाद हिमाचल के बोर्ड को लिखा भी है कि इस क्षेत्र का प्रदूषित अपशिष्ट सतलुज तक पंहुच रहा है। अवैध डंपिंग से रिस कर कुछ अपशिष्ट सिरसा नदी को प्रदूषित कर रहा है, जिसका असर हरियाणा तक हो रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट को इस तरह स्वास्थ्य के लिए खतरा बनने नहीं दिया जा सकता। गत दिनों हिमालय नीति अभियान और उससे जुड़े हुए कई संगठनों ने नालागढ़ में विरोध प्रदर्शन करके अपनी चिंता प्रकट की और प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर इस स्थिति को सुधरने की मांग की है। अभियान के संयोजक गुमान सिंह के अनुसार कुछ इकाइयों के आसपास तो बदबू से गुजरना तक मुश्किल हो गया है। उद्योगों में हिमाचल के 2023 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार 68,650 लोगों को काम मिला है शेष करीब 26000 कर्मचारी बाहरी राज्यों से हैं, किंतु इसके बदले पर्यावरणीय बर्बादी और स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष खतरे को फैलने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

गत दिनों कुछ शोध सामने आए हैं जिनसे पता चला है कि हिमाचल में स्वास्थ्य की स्थितियां चिंताजनक होती जा रही हैं। विशेषकर कैंसर जैसे रोगों का फैलाव राष्ट्रीय औसत से ज्यादा हो गया है। बीबीएन में काम करने वाले मजदूर या अन्य कार्यकर्ता भी इस दंश से बचे नहीं हैं। अशुद्ध जल के कारण पीलिया जैसे रोग आम हैं, जिसकी चपेट में आ कर कई जान गंवा चुके हैं। औद्योगिक कार्यकर्ताओं के लिए इलाज की भी उचित व्यवस्थाएं नहीं हैं जिसके चलते मुश्किल से न्यूनतम मजदूरी पर काम करने वाले महंगे इलाज तक पंहुच ही नहीं पाते। बीबीएन विकास योजना में ही उद्योग, बॉयलर, गैसों का उत्सर्जन, अपशिष्ट जलाना और रासायनिक कणों के उत्सर्जन को वायु प्रदूषण का कारण माना गया है, जिससे खांसी, गले में खराश, बलगम, श्वास, ब्रोंकाइटिस, अन्य श्वसन संबंधी रोग, फेफड़ों के कार्य में कमी, आंखों में जलन जैसे रोगों में वृद्धि हुई है। 2026 के एक वैज्ञानिक अध्ययन में 50 भूजल के नमूनों का अध्ययन किया गया था, जिसमें 78% नमूनों में जल पीने योग्य नहीं पाया गया। संखिया और फ्लोराइड की उपस्थिति चिंताजनक मानी गई, जिससे चर्म रोग, हृदय रोग, मधुमेह, और कैंसर का खतरा बढ़ा है। फ्लोराइड से दांतों का फ्लूरोसिस आदि का खतरा बढ़ा है। बच्चों के लिए यह खतरा ज्यादा है।

प्रदूषण केवल औद्योगिक स्थल तक ही सीमित नहीं रह सकता, क्योंकि प्रदूषित हवा और पानी आसपास और नदी के माध्यम से नीचे दूर तक पंहुच जाता है, इसलिए पंजाब तक यह खतरा फैलता जा रहा है। इसी कारण गत दिनों प्रदूषण विरोधी विरोध प्रदर्शन में पंजाब से भी लोग शामिल हुए। अत: अब हिमाचल के औद्योगिक सफर को निरापद और टिकाऊ औद्योगिक विकास के अनुकूल बनाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण पर सख्त कदम उठाने का समय आ गया है, जिसके लिए एकल स्तर पर उपचार संयंत्रों का ठीक से काम करना सुनिश्चित किया जाना चाहिए और केंदुवाल स्थित सामूहिक अपशिष्ट संशोधन संयंत्र की क्षमता- वर्धन और सतत कार्यशीलता सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस कार्य में स्थानीय स्तर पर कार्यरत सामाजिक संगठनों का सहयोग लेना और उनकी शिकायतों को ध्यानपूर्वक सुन कर उन पर कार्यवाही करके इस समस्या पर कुछ हद तक पार पाया जा सकता है। आर्थिक लालच के लिए लोगों की सेहत से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता, जिनके विकास के लिए उद्योग चाहिए, उनके ही स्वास्थ्य को नष्ट किया जाना औद्योगिक विकास के लक्ष्य को ही नष्ट कर देता है।

 

कुलभूषण उपमन्यु,अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

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