विकसित भारत 2047 : मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा क्यों लगता है यह लक्ष्य?
ओमप्रकाश तिवारी
क्या 2047 तक भारत विकसित देशों की श्रेणी में पहुंच सकता है या जीडीपी की चमक में आम नागरिक की वास्तविक स्थिति पीछे छूट जाएगी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार कहते हैं कि भारत को 2047 तक विकसित बनाना है। इसके बाद किसी भी समझदार इंसान के दिमाग में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह संभव है? है तो किस तरह ? और नहीं है तो क्यों? इस लेख में इसी की पड़ताल की जाएगी।
भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने का लक्ष्य सुनने में बेहद आकर्षक लगता है। बहुत सारे लोग इस पर आंख बंद करके विश्ववास कर लेते हैं। आजादी के सौ साल पूरे होने पर भारत आर्थिक रूप से समृद्ध हो, उसके नागरिकों का जीवन स्तर ऊंचा हो, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं बेहतर हों और हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले इससे बेहतर राष्ट्रीय लक्ष्य क्या हो सकता है? लेकिन किसी लक्ष्य की खूबसूरती और उसे हासिल करने की वास्तविक क्षमता दो अलग-अलग बातें हैं। यह सही है कि भारत की अर्थव्यवस्था का आकार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता के सवाल अब भी बेहद गंभीर हैं।
सवाल यह है कि क्या भारत के पास अगले दो दशकों में इतनी आर्थिक ताकत पैदा करने की क्षमता है कि वह विकसित देशों की श्रेणी में पहुंच सके? क्या आर्थिक विकास की मौजूदा दिशा इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि यदि भारत की जीडीपी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो जाती है, तो क्या उसका लाभ देश की आम आबादी तक भी पहुंचेगा? इन सवालों का जवाब खोजने के लिए भारत की कुल जीडीपी के आंकड़ों से आगे बढ़कर प्रति व्यक्ति आय, जीवन प्रत्याशा, शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार और आर्थिक असमानता को समझना होगा।
जीडीपी बड़ी लेकिन प्रति व्यक्ति आय बहुत कम
भारत की अर्थव्यवस्था का आकार तेजी से बढ़ा है। विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की जीडीपी लगभग 3.96 ट्रिलियन डॉलर अर्थात करीब 378.6 लाख करोड़ रुपये थी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था लगभग 30.77 ट्रिलियन डॉलर और जर्मनी की लगभग 5.05 ट्रिलियन डॉलर थी। जापान की अर्थव्यवस्था भी इसी अवधि में लगभग चार ट्रिलियन डॉलर के आसपास थी।
भारत और जापान की कुल जीडीपी के बीच का अंतर बहुत अधिक नहीं रह गया है। इससे भारत की आर्थिक क्षमता का पता चलता है। लेकिन कुल जीडीपी की तुलना करने से दोनों देशों के नागरिकों की आर्थिक स्थिति का सही आकलन नहीं किया जा सकता। भारत की आबादी जापान से कई गुना अधिक है। देश में पैदा होने वाली कुल आर्थिक संपदा को अधिक लोगों के बीच बांटने पर प्रति व्यक्ति औसत उत्पादन कम रह जाता है। इसी कारण कुल जीडीपी के मामले में जापान के करीब पहुंचने के बावजूद भारत की प्रति व्यक्ति आय उससे बहुत पीछे है।
विश्व बैंक के 2025 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 2,700 डॉलर थी, जबकि अमेरिका में यह करीब 90,000 डॉलर और जर्मनी में लगभग 60,500 डॉलर थी। जापान में भी प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से कई गुना अधिक है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। प्रति व्यक्ति जीडीपी का अर्थ किसी नागरिक की वास्तविक कमाई नहीं है। यह देश की कुल आर्थिक गतिविधियों को उसकी आबादी से भाग देने पर मिलने वाला औसत है। फिर भी देशों के बीच आर्थिक क्षमता और औसत जीवन स्तर की तुलना करने में यह उपयोगी संकेतक है। इसलिए भारत की कुल जीडीपी का जापान के करीब पहुंचना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि भारत के नागरिक भी जापान के नागरिकों के समान समृद्ध हो गए हैं। बड़ी अर्थव्यवस्था होना और समृद्ध समाज होना दो अलग-अलग उपलब्धियां हैं।
विकसित देश बनने के लिए कितनी आय चाहिए?
विकसित देश बनने के लिए प्रति व्यक्ति आय लगभग 14,000 डॉलर होनी चाहिए। इस आंकड़े को समझने के लिए विश्व बैंक की आय-आधारित श्रेणियों पर ध्यान देना जरूरी है। विश्व बैंक देशों को प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय यानी जीएनआई के आधार पर निम्न, निम्न-मध्यम, उच्च-मध्यम और उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में बांटता है। यह वर्गीकरण प्रति व्यक्ति जीडीपी से अलग है। वित्त वर्ष 2027 के लिए लागू व्यवस्था में उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था की सीमा 14,375 डॉलर से अधिक प्रति व्यक्ति जीएनआई है। भारत की 2025 की प्रति व्यक्ति जीएनआई लगभग 2,760 डॉलर थी। इसका अर्थ है कि भारत की प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय को आज की उच्च आय सीमा तक पहुंचने के लिए लगभग 5.2 गुना बढ़ना होगा।
लेकिन इसमें एक पेंच है। विश्व बैंक की यह सीमा स्थिर नहीं रहती। इसे समय-समय पर मुद्रास्फीति के अनुसार संशोधित किया जाता है। इसलिए आज की सीमा तक पहुंचना और 2047 में उस समय लागू उच्च आय वाली श्रेणी में पहुंचना अलग-अलग लक्ष्य हैं। यदि हम आज की सीमा को ही स्थिर मान लें और 2026 से 2047 तक लगभग 21 वर्ष का समय लें, तो भारत की प्रति व्यक्ति जीएनआई को 2,760 डॉलर से बढ़ाकर 14,375 डॉलर तक पहुंचाने के लिए लगभग 8.2 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि की जरूरत होगी।
यदि इसी अवधि में उच्च आय वाली श्रेणी की सीमा औसतन 1.5 प्रतिशत सालाना बढ़ती है, तो 2047 की सीमा तक पहुंचने के लिए डॉलर में मापी गई प्रति व्यक्ति जीएनआई की वृद्धि लगभग 9.8 प्रतिशत सालाना होनी पड़ेगी। यह एक अनुमान आधारित गणना है, न कि 2047 की वास्तविक आय-सीमा का पूर्वानुमान। इस गणना से भारत के सामने खड़ी चुनौती का अंदाजा लगाया जा सकता है। उसे न केवल अपनी प्रति व्यक्ति आय कई गुना बढ़ानी होगी, बल्कि उस दौरान दुनिया की आय-सीमाओं में होने वाले बदलावों का भी मुकाबला करना होगा।
क्या हर साल 9 से 10 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि जरूरी है?
यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि प्रति व्यक्ति आय में लगभग 9 से 10 प्रतिशत सालाना वृद्धि चाहिए, तो क्या भारत की जीडीपी को भी इतनी ही दर से बढ़ना होगा? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। प्रति व्यक्ति आय में डॉलर के हिसाब से वृद्धि और वास्तविक जीडीपी वृद्धि अलग-अलग चीजें हैं। वास्तविक आर्थिक वृद्धि के साथ जनसंख्या, मुद्रास्फीति और रुपये की डॉलर के मुकाबले कीमत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मान लीजिए कि भारत की वास्तविक जीडीपी सात प्रतिशत सालाना बढ़ती है और आबादी लगभग 0.6 प्रतिशत सालाना बढ़ती है। इस स्थिति में प्रति व्यक्ति वास्तविक उत्पादन की वृद्धि लगभग 6.4 प्रतिशत सालाना होगी। लेकिन अगर इसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो डॉलर में मापी गई प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि इससे कम रह सकती है। दूसरी ओर, विनिमय दर की स्थिति बेहतर होने पर डॉलर में मापी गई आय अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ सकती है। इसलिए केवल जीडीपी वृद्धि की एक दर तय कर देना पर्याप्त नहीं है।
अर्थशास्त्री एम. गोविंदा राव ने 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने की चुनौती पर अपने अध्ययन में अनुमान लगाया था कि भारत को लंबे समय तक लगभग 9 से 10 प्रतिशत सालाना जीडीपी वृद्धि की जरूरत पड़ सकती है। यह एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, जिसके लिए निवेश, बचत, उत्पादकता और रोजगार की गुणवत्ता में व्यापक सुधार करना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि 9 से 10 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल होते ही भारत अपने आप विकसित देश बन जाएगा। यह भी देखना होगा कि आर्थिक वृद्धि किस क्षेत्र में हो रही है, कितने रोजगार पैदा हो रहे हैं और उससे आम नागरिक की वास्तविक आय कितनी बढ़ रही है। भारत की चुनौती केवल तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करना नहीं, बल्कि उसे लगातार दो दशकों तक बनाए रखना है।
जीवन प्रत्याशा में भी बहुत बड़ा अंतर
किसी देश के विकास का मूल्यांकन केवल उसकी आय से नहीं किया जा सकता। नागरिक कितने स्वस्थ हैं और औसतन कितने वर्ष जीवित रहते हैं, यह भी विकास का महत्वपूर्ण संकेतक है। विश्व बैंक के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा लगभग 72.2 वर्ष थी। जापान में यह करीब 84 वर्ष, जर्मनी में 80.8 वर्ष और अमेरिका में 78.9 वर्ष थी।
भारत और जापान के बीच लगभग 12 वर्ष का अंतर है। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन प्रत्याशा में अंतर का एकमात्र कारण स्वास्थ्य व्यवस्था है। पोषण, स्वच्छता, जीवनशैली, दुर्घटनाएं और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां भी इसे प्रभावित करती हैं। फिर भी यह अंतर बताता है कि भारत को नागरिकों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में कितना लंबा रास्ता तय करना है।
विकसित देश बनने के लिए लोगों को बेहतर अस्पताल, सस्ती चिकित्सा, पर्याप्त पोषण, स्वच्छ पेयजल और प्रभावी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करानी होंगी। यदि किसी परिवार की वर्षों की बचत एक गंभीर बीमारी के इलाज में खत्म हो जाती है, तो केवल देश की जीडीपी बढ़ने से उस परिवार को समृद्ध नहीं कहा जा सकता। स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च केवल सामाजिक कल्याण का मामला नहीं है। स्वस्थ नागरिक अधिक उत्पादक होते हैं, काम करने की क्षमता लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं और अर्थव्यवस्था में अधिक प्रभावी योगदान दे सकते हैं। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार भारत के आर्थिक विकास की भी बुनियादी जरूरत है। 2022-2023 के आंकड़ों के अनुसार स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का महज 1.43 फीसदी है। इतने खर्च से सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करना मुश्किल है।
शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन गुणवत्ता का सवाल बाकी है
शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत के सामने गंभीर चुनौती है। स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन नामांकन और वास्तविक सीखने की क्षमता में अंतर बना हुआ है। एएसईआर 2024 के ग्रामीण भारत संबंधी सर्वेक्षण में कक्षा तीन के सरकारी स्कूलों के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ पा रहे थे। हालांकि यह आंकड़ा 2022 के 16.3 प्रतिशत से बेहतर था, फिर भी यह दिखाता है कि स्कूल में मौजूद हर बच्चा अपेक्षित स्तर पर सीख नहीं पा रहा है। यदि बच्चों को बुनियादी पढ़ना, लिखना और गणना करना ही ठीक से नहीं आता, तो आगे चलकर उनके लिए उच्च शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और बेहतर रोजगार हासिल करना कठिन हो जाता है।
आधुनिक अर्थव्यवस्था में केवल श्रमिकों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उनकी दक्षता और उत्पादकता भी मायने रखती है। भारत को यदि उच्च आय वाले देशों की श्रेणी में पहुंचना है, तो उसे ऐसे श्रमिक, तकनीशियन, वैज्ञानिक, इंजीनियर, शिक्षक और उद्यमी तैयार करने होंगे जो अधिक मूल्य पैदा कर सकें। इसके लिए शिक्षा पर खर्च बढ़ाने के साथ-साथ शिक्षण की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, शोध, व्यावसायिक प्रशिक्षण और उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार करना होगा। 2022-2023 के आंकड़ों के अनुसार शिक्षा पर सरकारी खर्च जीडीपी का महज 4.1 फीसदी है। हालांकि सरकार का लक्ष्य छह फीसदी का है। यदि शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियाद कमजोर रहती है, तो तेज आर्थिक वृद्धि को लंबे समय तक बनाए रखना भी कठिन होगा।
आर्थिक असमानता विकास की चमक को फीका कर सकती है
भारत की एक बड़ी चुनौती आर्थिक असमानता भी है। देश में संपत्ति और आय का वितरण समान नहीं है। विश्व असमानता डेटाबेस के शोध के अनुसार, 2022-23 में भारत की कुल आय में शीर्ष एक प्रतिशत लोगों की हिस्सेदारी लगभग 23.3 प्रतिशत थी। कुल संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी लगभग 40.1 प्रतिशत आंकी गई थी। ये शोध-आधारित अनुमान हैं और भारत में असमानता के सटीक मापन की कुछ सीमाएं भी हैं। इन आंकड़ों का महत्व इस बात में है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान गति से नहीं पहुंचता।
मान लीजिए कि देश की औसत प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर नागरिक की आय भी दोगुनी हो गई। कुछ लोगों की आय कई गुना बढ़ सकती है, जबकि बड़ी आबादी की आय बहुत धीमी गति से बढ़े। ऐसी स्थिति में देश की कुल संपदा बढ़ती रहती है, लेकिन गरीब और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों के लिए मकान, शिक्षा और इलाज का खर्च उठाना मुश्किल बना रह सकता है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को कम वेतन, अनिश्चित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
असमानता रहते हुए किसी देश का विकसित होना असंभव नहीं है लेकिन अत्यधिक असमानता विकास के लाभों को व्यापक आबादी तक पहुंचाने में बाधा बन सकती है। इसलिए भारत की आर्थिक सफलता का मूल्यांकन केवल औसत आय से नहीं, बल्कि वास्तविक मजदूरी, रोजगार की गुणवत्ता, ग्रामीण आय, सामाजिक सुरक्षा और निम्न आय वाले परिवारों की आर्थिक स्थिति से भी किया जाना चाहिए। विकसित भारत का अर्थ केवल कुछ लोगों का अत्यधिक अमीर होना नहीं, बल्कि आम नागरिक के लिए बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध होना भी है।
भारत के पास संभावनाएं हैं लेकिन शर्तें भी बड़ी हैं
भारत की आर्थिक क्षमता को नकारा नहीं जा सकता। विशाल घरेलू बाजार, युवा कार्यबल, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, सेवा क्षेत्र, औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे में निवेश की संभावनाएं भारत को आगे बढ़ने का अवसर देती हैं। लेकिन संभावनाओं को परिणाम में बदलने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। सबसे पहले, पर्याप्त और बेहतर वेतन वाले रोजगार पैदा करने होंगे। यदि जीडीपी तेजी से बढ़ती है लेकिन रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ते, तो आर्थिक विकास का लाभ सीमित वर्ग तक सिमट सकता है।
दूसरे, विनिर्माण और उत्पादकता बढ़ानी होगी। कृषि और कम उत्पादकता वाले कामों से निकलने वाले श्रमिकों को अधिक उत्पादक क्षेत्रों में रोजगार देना होगा। इसके लिए उद्योग, आधुनिक तकनीक, कौशल प्रशिक्षण और निवेश आवश्यक हैं। तीसरे, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार करना होगा। योजनाओं की घोषणा और बजट आवंटन से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नागरिकों को उनका लाभ कितना मिलता है।
चौथे, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ानी होगी। महिलाओं को सुरक्षित कार्यस्थल, कौशल, रोजगार और उद्यमिता के अवसर उपलब्ध कराना देश की उत्पादन क्षमता को बढ़ा सकता है। पांचवें, छोटे कारोबारों, किसानों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की आय तथा आर्थिक सुरक्षा पर ध्यान देना होगा। विकास तभी व्यापक होगा, जब समाज के बड़े हिस्से की उत्पादकता और कमाई बढ़ेगी।
इन सबके साथ निजी निवेश, तकनीकी नवाचार, स्थिर नीतियां और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा भी जरूरी हैं। विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि अधिक मूल्य पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था बनना होगा।
तो क्या विकसित भारत 2047 मुंगेरीलाल का सपना है?
मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से तुलना तब उचित लगती है, जब किसी महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ उसे हासिल करने की कठिन शर्तों और संभावित बाधाओं पर पर्याप्त चर्चा न हो। 2047 तक भारत का उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में पहुंचना एक कठिन लक्ष्य है। इसे केवल राजनीतिक नारे के आधार पर न तो असंभव कहा जा सकता है और न ही निश्चित उपलब्धि माना जा सकता है।
समस्या तब पैदा होती है, जब देश की कुल जीडीपी की रैंकिंग को नागरिकों की समृद्धि का प्रमाण बना दिया जाता है। बड़ी अर्थव्यवस्था होना महत्वपूर्ण है लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि एक सामान्य परिवार की वास्तविक आय कितनी बढ़ी, बच्चों को कैसी शिक्षा मिली, बीमारी के समय इलाज कितना सुलभ हुआ और रोजगार कितना सुरक्षित बना।
यदि भारत को 2047 तक विकसित देश बनना है, तो उसे लंबे समय तक तेज आर्थिक वृद्धि बनाए रखनी होगी। साथ ही, उत्पादकता बढ़ानी होगी, बेहतर रोजगार पैदा करने होंगे, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार करना होगा तथा आर्थिक वृद्धि का लाभ व्यापक आबादी तक पहुंचाना होगा। इन लक्ष्यों को हासिल करना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। भारत ने अतीत में उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है और आगे भी तेजी से बढ़ने की क्षमता रखता है। सवाल यह है कि क्या इस क्षमता का इस्तेमाल उन संरचनात्मक समस्याओं को दूर करने में होगा, जो विकास की गति और गुणवत्ता को सीमित करती हैं।
जीडीपी नहीं, नागरिकों का जीवन स्तर बने विकास की कसौटी
साल 2047 तक विकसित भारत बनने का सपना तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ ठोस आर्थिक और सामाजिक बदलाव दिखाई देंगे। आज की उच्च आय सीमा तक पहुंचने के लिए भारत की प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय में लगभग 8.2 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि की जरूरत है। यदि आय की सीमा भी बढ़ती रहती है, तो आवश्यक वृद्धि और अधिक होगी। लेकिन इस आंकड़े को सीधे वास्तविक जीडीपी वृद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि जनसंख्या, मुद्रास्फीति और विनिमय दर भी परिणाम को प्रभावित करती हैं।
भारत को अपनी आर्थिक क्षमता का इस्तेमाल रोजगार पैदा करने, नागरिकों की उत्पादकता बढ़ाने, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता सुधारने तथा असमानता कम करने में करना होगा। केवल कुल जीडीपी का आकार बढ़ जाने से विकसित समाज नहीं बनता। यदि लक्ष्य के अनुरूप आर्थिक और सामाजिक बदलाव नहीं किए गए तो विकसित भारत 2047 को मुंगेरीलाल का सपना कहना एक चेतावनी के रूप में समझा जा सकता है। इसे पहले से असंभव घोषित करना भी अनुचित होगा।
असली सवाल यह नहीं है कि 2047 में भारत की जीडीपी कितने ट्रिलियन डॉलर की होगी। असली सवाल यह है कि उस समय भारत के आम नागरिक की जिंदगी कितनी बेहतर होगी। यदि आम नागरिक को बेहतर रोजगार, पर्याप्त आय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और आर्थिक सुरक्षा मिलती है, तो विकसित भारत का सपना वास्तविकता बन सकता है। लेकिन यदि आर्थिक आंकड़े चमकते रहें और आम लोगों की जिंदगी में अपेक्षित सुधार न आए, तो विकास का दावा अधूरा ही रहेगा। यही 2047 की असली परीक्षा है।
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