लघु कथा
सफ़र और सोच
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, इस बार हम चार देशों की यात्रा करके आए हैं!” रोहन ने उत्साह से कहा।
माँ मुस्कराईं, “अच्छा! वहाँ के लोगों से क्या सीखा?”
“सीखा क्या? वहाँ का खाना महँगा था, लोग अजीब कपड़े पहनते हैं और उनकी जीवनशैली भी हमारी जैसी नहीं है।”
माँ ने पूछा, “तो फिर नया क्या देखा?”
“बहुत कुछ! खूबसूरत इमारतें, समुद्र, पहाड़ और शानदार होटल।”
माँ ने धीरे से कहा, “बेटा, जगहें तो आँखें देखती हैं, लेकिन दुनिया को समझने के लिए नज़रिये की ज़रूरत होती है।”
रोहन हँसा, “अब घूमने में भी दर्शनशास्त्र खोजोगी?”
माँ गंभीर हो गईं, “जिस देश में तुम गए, वहाँ की एक महिला अकेले रहती थी, एक बुज़ुर्ग दंपती बिना बच्चों के खुश था और एक युवक अपनी पसंद का साधारण जीवन जी रहा था। तुमने उन्हें देखा या सिर्फ़ उनके रहन-सहन को जज किया?”
रोहन चुप हो गया।
“माँ, शायद मैंने हर जगह अपने ही संस्कारों के तराज़ू से लोगों को तौला।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा, “सफ़र तब पूरा होता है, जब लौटकर आने वाला इंसान पहले जैसा नहीं रहता।”
रोहन ने पासपोर्ट मेज़ पर रखा और धीमे से कहा, “अगली यात्रा में जगहें कम देखूँगा, माँ… लोगों को थोड़ा ज़्यादा समझूँगा।”
माँ मुस्कराईं, “बस, अब तुम्हारा सफ़र शुरू हुआ है।”

अच्छी लघुकथा।