जसवीर त्यागी की डर और अन्य कविताएं

जसवीर त्यागी की डर और अन्य कविताएं

 

डर

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सभी के अपने-अपने डर हैं
कोई घोड़े से डरता है
कोई डरता है कुत्ते से
तो कोई बिल्ली से

कोई साँप से डरता है
कोई कॉकरोच से

कोई पानी से डरता है
कोई आग से

कोई अंधेरे से डरता है
कोई उजाले से

कोई ऊँचाई से डरता है
कोई तेज गति से

कोई मृत्यु से डरता है
कोई जिंदगी से

कोई महफ़िल से डरता है
कोई तन्हाई से

कोई प्रेम से डरता है
कोई बिछोह से

कोई गरीबी से डरता है
कोई अपमान से

हर इंसान अलग-अलग है
एक-दूसरे से

हर किसी का डर
दूसरे के डर से भिन्न है।

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समय

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समय की
एक खूबी-खामी है

ज्यादा देर
किसी के पास
ठहरता नहीं।

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समय

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समय
किसी पाखी-सा
जा रहा है
अनंत-आकाश में

हम उड़ता हुआ
पाखी देखते हैं

कुछ देर तक
कुछ दूर तक

वह कहाँ पहुँचता है?
यह जान नहीं पाते।

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| काल ||

 

कितनी शीघ्रता से
करवट बदलता है काल

पलक झपकते ही
बगल खड़ा ‘है’

‘था’ रूप में
दूर जाता हुआ दिखता है।

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चिंता

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मंदिर से घर लौटते हुए
वृद्ध माँ
मंदिर की चौखट से टकराकर गिर गयी

माँ के हाथ से
बहता खून देखकर
मेरे आँसू बहने लगे

मुझे रोता देख
बोली माँ-
अरे ज्यादा चोट नहीं आयी
कुछ दिनों में ठीक हो जाऊँगी

माँ अपनी चोट के
बहते खून को अनदेखा कर

मेरी आँखों के
बहते आँसुओं को लेकर चिंता में थी।

 

ताक

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हिरणों का समूह
जंगल में घूम रहा है

पेड़ पर बैठा तेंदुआ
शिकार की ताक में है

कुछ समय बाद
समूह में एक हिरण कम होगा

कौन,कहाँ ?
किसकी ताक में बैठा है
कोई जान नहीं पाता।

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