साहित्यिक विरासत सहेजने और पितृ ऋण चुकाने की पहल

साहित्यिक रिपोर्ट

साहित्यिक विरासत सहेजने और पितृ ऋण चुकाने की पहल

कर्मयोगी

आज ऐसे दौर में जब साहित्यकारों के अवसान के बाद उनकी उनकी कृतियां उपेक्षित व धूल फांकती नजर आती हैं, और उनकी संताने उन किताबों से मुक्त होने के उपक्रम में लगी रहती हैं, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक प्रेरक व अनुकरणीय एक पहल सामने आई है। राष्ट्रपति व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा बाल साहित्य के लिये सम्मानित व पुरस्कृत स्व. कृष्ण ’शलभ’ को यह मान उनके व्यवसायी पुत्र राजीव सैनी द्वारा प्रदान किया गया है। उनकी जयंती व पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन, साहित्य पुरस्कार की घोषणा तथा देश-विदेश की भाषाओं में उनकी रचनाओं को अनुवादित करने का उपक्रम किया जा रहा है। उनकी पुस्तकों व अन्य सृजन को सहेजने के लिये बकायदा एक पुस्तकालय बनाया गया है।

राजीव सैनी ने पिता की पुस्तकें सहेजने के लिये करीब आठ लाख की लागत से एक पुस्तकालय अपने घर में बनाया है। जिसमें उनकी प्रकाशित पुस्तकें, अन्य रचनाकर्म तथा बाल साहित्य से जुड़े संदर्भ संग्रहीत किए हैं। बकायदा उनकी पुस्तकें उ.प्र. के विभिन्न बाल पुस्तकालय व संस्थानों को भेजी गई हैं। इसके अलावा नवोदित बाल साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने के लिये कीर्तिशेष कृष्ण ‘शलभ’ स्मृति पुरस्कार दिया जा रहा है। जिसकी राशि बढ़ाना प्रस्तावित है।

कविता, गीत, गजल, लोकगीत, समीक्षा,संस्मरण, शोध व बालगीत विधा में लिखने वाले कृष्ण ’शलभ’ को बाल साहित्य के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इसमें उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य भारती सम्मान, हिंदी अकादमी दिल्ली से बाल साहित्य सम्मान, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग,कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर सम्मान,सुमित्रानंदन पंत साहित्य गौरव सम्मान आदि दर्जन भर सम्मान मिले। वे सहारनपुर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था समन्वय के संस्थापक अध्यक्ष रहे।

सहारनपुर जनपद के नकुड़ कस्बे में जन्मे कृष्ण ’शलभ’ का मूल नाम कृष्ण लाल था। बाल साहित्‍य में हस्तक्षेपकारी साहित्यिक अवदान नें उन्हें राष्‍ट्रीय पहचान दी। विडंबना यह कि वे असमय 31 अक्‍टूबर 2017 को सृजन की दुनिया को अलविदा कह गये । मगर बाल पाठकों की कल्पनाशीलता और संवेदना को समृद्ध करने वाले साहित्य के लिये उन्हें आज भी सम्मान सहित याद किया जाता है।

यूं तो उन्होंने विभिन्न विधाओं में विपुल साहित्य रचा। लेकिन उनकी पुस्तक ‘बचपन एक समंदर’ की आज भी खूब चर्चा होती है। जिसमें हिंदी की 666 प्रतिनिधि बाल कविताएँ संकलित हैं। इस संग्रणीय कृति को रचने में लगभग बारह वर्षों का परिश्रम लगा। इसी तरह ‘शिशुगीत सलिला’ में 1008 शिशुगीतों का संकलन भी उनके सृजन समर्पण की याद दिलाता रहेगा। इसके अलावा बाल साहित्यकार कोश’ व अन्य कृतियाँ भी उनकी विशिष्ट पहचान रही हैं। जिसमें ‘चीं-चीं चिड़िया’, ‘सूरज की चिट्ठी’, ‘नाच चिरैया ता-था थैया’ और ‘ओ मेरी मछली’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं।

गत 31 अक्तूबर को उनकी पुण्यतिथि थी। कीर्तिशेष कृष्ण ‘शलभ’ जी की 9वीं पुण्यतिथि पर संस्था “समन्वय” द्वारा राजीव सैनी के पैरामाउंट ट्यूलिप स्थित निवास में ‘स्मरण’ कार्यक्रम आयोजित किया गया । जिसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब के साहित्यकारों ने शिरकत की। अतिथि गीतकार के रूप में उपस्थित रहे हरिद्वार-उत्तराखंड से प्रख्यात गीतकार श्री भूदत्त शर्मा । ‘स्मरण’ कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. ओ.पी. गौड़ ने की । आयोजन का काव्यमय संचालन संस्था के उपाध्यक्ष एवं कार्यक्रम-संयोजक विनोद भृंग द्वारा किया गया ।

गीतकार श्री नरेंद्र मस्ताना की सरस वाणी-वंदना से आरंभ हुए इस अविस्मरणीय कार्यक्रम में ‘शलभ’ जी की पौत्री वृंदा सैनी और पौत्र रक्षित सैनी ने जहाँ ‘शलभ’ जी की बालकविताएँ प्रस्तुत कीं, वहीं सर्वश्री हरिराम ‘पथिक’, डॉ.विजेंद्रपाल शर्मा, रामवीर सिंह ‘राहगीर’, राजेंद्र शर्मा, रामकुमार शर्मा, वीरेश कुमार त्यागी, डॉ. राजीव उपाध्याय ‘यायावर’, चंद्रभान मैनवाल, डॉ. सुमेधा ‘नीरज’, डा.गोकरणदत्त शर्मा, पी.एन ‘मधुकर’, आदेश कुमार, बृजमोहन शर्मा, अरविंद कुमार मित्तल, विजेंद्र सैनी, गुलशन नागपाल, सुभाष वर्मा, सुनीता सैनी, रेखा वर्मा,आशीष कुमार सहित अनेक रचनाकारों ने शलभ जी को अपनी भावपूर्ण काव्यांजलि अर्पित की ।

Comments

Your email address will not be published.

0