डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा – “बस दो मिनट, पापा!”

लघुकथा

“बस दो मिनट, पापा!”

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“पापा, आज स्कूल ज़रूर आना। मैं मंच से आपको ढूँढ़ूँगा!”

“बेटा, आज बहुत बड़ी मीटिंग है।”

“पर आपने वादा किया था!”

“समझा करो! तुम्हारे लिए ही तो मेहनत करता हूँ।”

“लेकिन पापा, मुझे तो बस आप चाहिए!”

राजीव बिना जवाब दिए निकल गए।

शाम को भव्य समारोह में घोषणा हुई-

“वर्ष के सर्वश्रेष्ठ उद्योगपति- श्री राजीव मेहरा!”

तालियों के बीच राजीव ने पुरस्कार उठाया।

घर लौटे तो आठ साल का बेटा जाग रहा था।

“पापा, आज आप बहुत बड़े आदमी बन गए?”

“हाँ बेटा!”

“तो फिर स्कूल क्यों नहीं आए?”

“काम था बेटा। नाटक कैसा रहा?”

“मैं पेड़ बना था।”

“अच्छा! फिर?”

“सबके मम्मी-पापा आए थे। मैं आपको ढूँढ़ता रहा।”

राजीव चुप हो गए।

बेटे ने बैग से एक तस्वीर निकाली।

“देखिए, ये मेरा पेड़ है।”

“बहुत सुंदर! लेकिन इसकी एक शाखा खाली क्यों है?”

“वहाँ आपकी जगह थी।”

“मेरी?”

“हाँ। मैडम ने कहा था, पेड़ की शाखाओं पर अपने सबसे प्यारे लोगों के नाम लिखो।”

राजीव ने देखा—बाकी शाखाओं पर माँ, दादी, दादा के नाम थे।

“तो मेरा नाम क्यों नहीं लिखा?”

बेटा धीरे से बोला—

“लिखा था पापा… पर जब आप नहीं आए, तो मैंने मिटा दिया। सोचा, शायद आपको पेड़ पर भी जगह नहीं मिलेगी।”

राजीव देर तक उस मिटाए हुए नाम का निशान देखते रहे।

फिर पेंसिल उठाकर बेटे के पास बैठ गए।

“क्या मैं अपना नाम दोबारा लिख सकता हूँ?”

बेटे ने पेंसिल थाम ली।

“हाँ पापा… लेकिन इस बार मिटने मत देना।”

 

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