नौवीं पुण्यतिथि पर विशेष
कृष्ण ‘शलभ’ : बचपन की धड़कनों को शब्द देने वाला साहित्यकार
राजेंद्र शर्मा
बचपन की दुनिया वयस्कों की दुनिया से अलग होती है। वहाँ एक छोटी-सी चिड़िया भी कौतूहल का विषय बन सकती है, रेलगाड़ी की छुक-छुक कल्पना के अनंत रास्ते खोल सकती है और जंगल के जीव अपनी गतिविधियों से उत्सव रच सकते हैं। इस दुनिया को कविता में उतारने के लिए केवल शब्दों का कौशल पर्याप्त नहीं; इसके लिए बालमन की जिज्ञासा, उसकी चंचलता, सहज संवेदना और कल्पनाशीलता को समझना पड़ता है। हिंदी के बाल साहित्यकार कृष्ण ‘शलभ’ ने अपने रचनात्मक जीवन में इसी संसार को अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया। उनकी पहचान केवल बाल कविताएँ लिखने वाले रचनाकार की नहीं, बल्कि बाल साहित्य को संकलित करने, उसकी परंपरा को सहेजने और उसके महत्त्व को रेखांकित करने वाले साहित्यकर्मी की भी है।
18 जुलाई 1945 को सहारनपुर जनपद के नकुड़ में जन्मे कृष्ण ‘शलभ’ का मूल नाम कृष्ण लाल था। 31 अक्टूबर 2017 को उनका निधन हुआ। उनकी नौवीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना हिंदी बाल साहित्य की एक ऐसी रचनात्मक यात्रा को समझना है, जिसमें निजी अनुभवों से शुरू हुआ लेखन धीरे-धीरे व्यापक साहित्यिक दायित्व में बदल गया।
लोक-संस्कारों में पड़ी रचनात्मकता की नींव

कृष्ण ‘शलभ’ के रचनात्मक व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार से मिले संस्काधरों की बडी भूमिका है। उनकी माँ गंगा रानी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और रामचरितमानस का पाठ करती थीं। वे लोकगीत भी गाती थीं। पिता ओमप्रकाश संगीत के अनुरागी थे और रामलीला, संगीत-आयोजनों तथा रंगमंच से जुड़े रहते थे। स्थानीय स्तर पर उन्हें ‘ओपी उस्ताद’ के नाम से भी जाना जाता था।
सहारनपुर जनपद की तहसील नकुड़ और जिला बुलंदशहर के बीच बीता उनका बचपन लोकधुनों, पारिवारिक संस्कारों और ग्रामीण जीवन की स्मृतियों से समृद्ध था। लोकगीतों ने उनके भीतर लय का संस्कार विकसित किया। यह संस्कार आगे चलकर बाल कविता के प्रति उनके अनुराग में सहायक बना। बालगीत और शिशुगीत में लय का विशेष महत्त्व होता है। ध्वनियों की पुनरावृत्ति, शब्दों की सहजता और गति का आकर्षण बच्चे को कविता के निकट लाते हैं। कृष्ण ‘शलभ’ की रचनात्मक पृष्ठभूमि को समझते हुए लोक-संस्कृति और संगीत से उनके जुड़ाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
हालाँकि किसी कवि के साहित्यिक मूल्य का निर्धारण केवल उसके संस्कारों से नहीं होता; यह देखना भी आवश्यक है कि वह उन्हें अपनी मौलिक अभिव्यक्ति में किस तरह रूपांतरित करता है। कृष्ण ‘शलभ’ की साहित्यिक यात्रा इस संबंध को समझने का अवसर देती है।
बच्चों के आग्रह से बाल साहित्य तक

कृष्ण ‘शलभ’ की बाल कविता यात्रा का आरंभ किसी साहित्यिक योजना के तहत नहीं, बल्कि पारिवारिक जीवन के एक सहज प्रसंग से हुआ। उनके बेटे राजीव को विद्यालय में 15 अगस्त के अवसर पर सुनाने के लिए कविता चाहिए थी। उन्होंने उसके लिए ‘जंगल में आज़ादी आई’ और ‘छुक-छुक मेरी रेल चले’ जैसी कविताएँ लिखीं। बच्चों के बीच इन रचनाओं को मिली स्वीकृति ने उन्हें आगे लिखने के लिए प्रेरित किया। जब रचना बच्चे की वास्तविक जरूरत और अनुभव से जुड़ती है, तो उसके साथ संवाद की संभावना बढ़ जाती है। कृष्ण ‘शलभ’ ने बच्चों के संसार में प्रवेश करने के लिए किसी कृत्रिम भाषा या आरोपित बाल-सुलभता का सहारा लेने के बजाय सहज अनुभवों से अपनी यात्रा शुरू की।
उनकी दृष्टि में बाल कविता केवल बच्चों के लिए लिखी गई छोटी या सरल कविता नहीं थी। उन्होंने बाल कविता को बचपन का प्रतिरूप माना-ऐसा बचपन जो कभी चंचल, कभी हठीला, कभी जिज्ञासु और कभी प्रश्नों से भरा होता है। यह विचार उनकी काव्य-दृष्टि का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इसमें बच्चा उपदेश सुनने वाला निष्क्रिय पात्र नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र कल्पना और संवेदना वाला व्यक्तित्व है।
लय, कल्पना और बालमन
‘जंगल में आज़ादी आई’ जैसी कविता में जंगल के जीवों के माध्यम से स्वतंत्रता के उत्सव की कल्पना की गई है। हाथी, सिंह और मोर जैसे परिचित जीव कविता में अपनी गतिविधियों के साथ उपस्थित होते हैं। दूसरी ओर, ‘छुक-छुक मेरी रेल चले’ रेल की गति और यात्रा के रोमांच को बालमन की दुनिया से जोड़ती है। इन रचनाओं के उपलब्ध अंशों में दृश्यात्मकता, गति और लय का मेल दिखाई देता है।

बाल कविता में यह गुण महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बच्चा शब्दों को केवल अर्थ के स्तर पर ग्रहण नहीं करता; वह उनकी ध्वनि, गति और उनसे बनने वाले दृश्यों से भी जुड़ता है। कविता जब उसकी कल्पना को सक्रिय करती है, तभी वह उसके अनुभव का हिस्सा बन पाती है।
फिर भी, बाल कविता का मूल्यांकन केवल तुकबंदी, लय या मनोरंजन के आधार पर नहीं होना चाहिए। उसकी भाषा में सहजता के साथ नवीनता, कल्पना में स्वच्छंदता के साथ आंतरिक संगति और आनंद के साथ संवेदना का विस्तार भी आवश्यक है। कृष्ण ‘शलभ’ के समग्र काव्य-मूल्यांकन के लिए उनकी प्रतिनिधि रचनाओं का इसी दृष्टि से अध्ययन किया जाना चाहिए। उनकी घोषित काव्य-दृष्टि, हालांकि, स्पष्ट करती है कि वे बचपन की विशिष्टता और उसकी स्वतंत्र संवेदना को साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान देना चाहते थे।
‘बचपन एक समंदर’ : संकलन-कर्म का महत्त्व
कृष्ण ‘शलभ’ का साहित्यिक योगदान उनकी मौलिक कविताओं तक सीमित नहीं है। उनकी पुस्तक ‘बचपन एक समंदर’ में हिंदी की 666 प्रतिनिधि बाल कविताएँ संकलित हैं। इस संकलन को तैयार करने में लगभग बारह वर्षों का परिश्रम लगा। ‘शिशुगीत सलिला’ में 1008 शिशुगीतों का संकलन भी उनके दीर्घकालीन श्रम और बाल साहित्य के प्रति समर्पण को रेखांकित करता है।
किसी संकलन की उपलब्धि केवल उसमें शामिल रचनाओं की संख्या से तय नहीं होती। उसका महत्त्व इस बात में निहित है कि वह किसी विधा की विविधता और विकास को समझने के लिए कितनी उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराता है। बाल साहित्य की अनेक रचनाएँ पत्रिकाओं और अलग-अलग पुस्तकों में बिखरी रहती हैं। उन्हें खोजकर एक स्थान पर संकलित करना, चयन करना और पाठकों तक पहुँचाना साहित्यिक स्मृति को सुरक्षित रखने का काम है।
‘बचपन एक समंदर’ की विशेषता को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इतने बड़े संकलन के माध्यम से कृष्ण ‘शलभ’ ने हिंदी बाल कविता की विविध रचनात्मक उपस्थिति को एक साथ देखने की संभावना पैदा की। इस पुस्तक पर शोध-कार्य होने का उल्लेख भी मिलता है, जो इसकी अकादमिक उपयोगिता की ओर संकेत करता है। किसी संकलन का अंतिम मूल्यांकन उसके चयन की गुणवत्ता, प्रतिनिधित्व और साहित्यिक इतिहास में उसकी स्थिति के आलोचनात्मक अध्ययन से ही संभव है; फिर भी, इस दिशा में कृष्ण ‘शलभ’ का परिश्रम उल्लेखनीय है।
उनकी दूसरी कृतियों में ‘चीं-चीं चिड़िया’, ‘सूरज की चिट्ठी’, ‘नाच चिरैया ता-था थैया’, ‘ओ मेरी मछली’, ‘मैना की चिट्ठी’ और ‘देश हमारा’ उल्लेखनीय हैं। ‘बाल साहित्यकार कोश’ उनके संपादकीय कार्य का एक अलग पक्ष सामने लाता है। इन पुस्तकों से स्पष्ट होता है कि उनकी रुचि केवल स्वयं लिखने में नहीं, बल्कि बाल साहित्य की व्यापक परंपरा और उसके रचनाकारों को सामने लाने में भी थी।
रचनाकार के पीछे का मनुष्य
कृष्ण ‘शलभ’ की पत्नी हेम ‘शलभ’ बताती है कि साहित्य कृष्ण ‘शलभ’ के जीवन का अभिन्न हिस्सा था। नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी उनका लेखन जारी रहता था। वे देर रात तक लिखते और साहित्यिक गोष्ठियों तथा मित्रों के बीच सक्रिय रहते थे और उनकी साहित्यिक यात्रा निरंतर अभ्यास और लगन से बनी थी। उनकी पहली बाल कविताओं के प्रकाशन से लेकर बड़े संकलनों की तैयारी तक, लेखन और संपादन उनके जीवन के स्थायी कर्म रहे।
कृष्ण ‘शलभ’ कविता, गीत, ग़ज़ल, लोकगीत, समीक्षा, संस्मरण और शोध जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय रहे। उन्हें विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का बाल साहित्य भारती सम्मान और दिल्ली हिंदी अकादमी का बाल साहित्य सम्मान उल्लेखनीय हैं। किंतु उनकी साहित्यिक पहचान को केवल पुरस्कारों की सूची में सीमित करना उचित नहीं होगा। उनकी वास्तविक विरासत को उनके लेखन, संकलन-कर्म और बाल साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता के संयुक्त संदर्भ में समझना चाहिए।
बदलते समय में बाल साहित्य की प्रासंगिकता
कृष्ण ‘शलभ’ बदलते सामाजिक परिवेश और बचपन की बदलती स्थितियों को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। परिवार, लोक-संस्कृति और मानवीय संबंधों से दूर होते जीवन में उन्हें बच्चों की सहज संवेदना के क्षीण होने का भय था। उनकी यह चिंता आज भी विचारणीय है।
डिजिटल माध्यमों और दृश्य मनोरंजन के विस्तार ने बच्चों के अनुभव संसार को बदला है। यह परिवर्तन अपने आप में न तो पूरी तरह नकारात्मक है और न ही उसे अनदेखा किया जा सकता है। प्रश्न यह है कि बच्चों के जीवन में पढ़ने, कल्पना करने, प्रकृति से जुड़ने और स्वतंत्र प्रश्न उठाने के लिए कितनी जगह बची है। सार्थक बाल साहित्य बच्चों को केवल नैतिक शिक्षा नहीं देता; वह उन्हें दुनिया को अपने ढंग से देखने और समझने की क्षमता भी प्रदान करता है।
यह दुर्भाग्यसपूर्ण है कि कृष्ण ‘शलभ’ बाल साहित्यज मे जिस स्था न के हकदार थे, वह उन्हें् नही मिला । उनकी नौवीं पुण्यतिथि पर सबसे सार्थक श्रद्धांजलि यही होगी कि कृष्ण ‘शलभ’ की साहित्यिक विरासत को व्यापक संदर्भ में देखने और अग्रेत्त र उसका मूल्याहकंन करते हुए उनके वास्तिविक स्थाहन पर उन्हें शोभित करने की आवश्यिकता है ।
बचपन सचमुच एक समंदर है। उसमें उतरने के लिए संवेदना, धैर्य और निरंतर खोज चाहिए। कृष्ण ‘शलभ’ ने अपनी रचनात्मकता और संपादकीय श्रम से इस समंदर को समझने की राह बनाई। उनका अवदान हमें याद दिलाता है कि बच्चों के लिए लिखना साहित्य का छोटा काम नहीं, बल्कि मनुष्य की कल्पना और संवेदना के भविष्य से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी है।
