हिन्दी आलोचना के युग पुरुष डॉक्टर रामविलास शर्मा के जन्मदिन (10 अक्तूबर) पर विशेष
कविता
बाबा डॉ. रामविलास शर्मा के प्रति
जसवीर त्यागी
मैं आपके लिए फूल लाना चाहता था
पता नहीं क्यों?
मैं फूल को डाल से अलग नहीं कर पाया
और मैंने उसे वहीं डाल पर छोड़ दिया
फिर मैंने सोचा
मैं आपके लिए अपने हाथों से
कागज की नाव बनाऊंगा
नाव और पानी
पानी और समुद्र
समुद्र और तूफान
तूफान में कागज की नाव टिक नहीं पाएगी
मैंने कागज की पतंग बनाकर आकाश में छोड़ दी
एक रोज मेरे मन में
चित्र बनाने का विचार आया
जिसमें पहाड़ नदी हो
आसपास विचरते हुए हिरण व खरगोश के बच्चे
हाँ,यह सब ठीक रहेगा
आपको भी पहाड़-नदी लुभाते होंगे
लेकिन कुछ समय बाद मैं उदास ही रहा
चित्र की जान रंगों में होती है
रंग समय के सामने फीके पड़ जायेंगे
मैंने इस विचार को
दूर पहाड़ों में ही दबा दिया
कई दिनों तक
मैं एक चक्रव्यूह बुनबुनकर तोड़ता रहा
हर उम्दा चीज़ को आपसे जोड़ता रहा
मैंने आपके लिए कविता लिखकर फाड़ दी
यह जानते हुए
सबसे अच्छी कविता आदमी की आँखों में होती है
अगर आदमी उसे पढ़ना जानता है तो
यकायक मुझे ख़्याल आया
क्यों ना मैं आपके लिए एक छड़ी ले आऊं
पर छड़ी से मजबूत तो मेरे कंधे होंगे
वक़्त आने पर
मैं अपने कंधे फैला दूंगा
लम्बे समय तक जूझने के बाद
मुझे कोई भी चीज़
आपके लिए फबी नहीं
मैंने ठान लिया
मैं कुछ भी नहीं ले जाऊंगा आपके लिए
एक दिन चुपचाप चला जाऊंगा अपने आप
जैसे आती है धूप गुम्बदों पर
जैसे दरख़्तों में आती हैं पत्तियां चुपचाप
जम जाती है बर्फ-सी हँसी
शिशु के गाल पर
थिरकने लगता है पोर-पोर
मृदङ्ग की ताल पर
जैसे प्रेम फैल जाता है प्रेमी की शिराओं में
जैसे सहसा आ जाती है कोई चिट्ठी
दूर-दराज के गांवों में
मैं भी चला आऊंगा चुपचाप
आप घर के आँगन में बैठ
पढ़ रहे होंगे कोई किताब
या लिख रहे होंगे किसी हितैषी को ख़त
सोच रहे होंगे घर-गृहस्थी की बातें
माप रहे होंगे मौसम की बारीकियां
और मैं पीछे से आकर चुपचाप
ढांप लूँगा आपकी आँखें
जोर से कहूंगा ‘धप्पा’
आप धक से पूछेंगे
कौन…..?
सम्मुख पाकर मुझे हो जाएंगे मौन
चुपचाप अपने-आप।
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